नेपाल से सटे बिहार के सीतामढ़ी जिले का नाम सुनते ही लोगों के मन में धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व की छवि बनती है, बननी भी चाहिए क्योंकि यह धरती माँ सीता की जन्मभूमि है।

नेपाल से सटे बिहार के सीतामढ़ी जिले का नाम सुनते ही लोगों के मन में धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व की छवि बनती है, बननी भी चाहिए क्योंकि यह धरती माँ सीता की जन्मभूमि है। लेकिन सीतामढ़ी में जब बात स्वास्थ्य व्यवस्था की आती है तो यहाँ की हकीकत किसी अभिशाप से कम नहीं है। सरकारी अस्पताल से लेकर प्राइवेट नर्सिंग होम तक मरीजों के साथ होने वाला व्यवहार, डॉक्टरों की बेरुखी और स्टाफ का गैर-जिम्मेदाराना हरकत यहाँ के स्वास्थ्य ढांचे का काला सच है।
डॉक्टर सिर्फ फीस और कमिशन की भाषा समझते हैं।
सीतामढ़ी के अधिकांश डॉक्टर सिर्फ फीस और कमिशन की भाषा समझते हैं। मरीज चाहे दर्द से कराहता रहे, उनका पहला सवाल यही होता है कि “पैसे कितने देंगे?” कई बार बिना पैसे लिए मरीज को छुआ तक नहीं जाता है। ‘मेडिकल एथिक्स’ के नाम पर यहाँ शून्यता है।
आप सीतामढ़ी के किसी भी क्लिनिक में जाएंगे तो यहाँ के स्टाफ आपके साथ प्रोफेशनलिज्म से ज्यादा दलाल की तरह व्यवहार करेंगे। यहाँ एम्बुलेंस से लेकर दवाइयों तक, हर जगह कमीशनखोरी की संस्कृति बनी हुई है।
वार्डबॉय मरीज़ों की सेवा करने के बजाय उन्हें झंझट समझता है
यहाँ का वार्डबॉय मरीज़ों की सेवा करने के बजाय उन्हें झंझट समझता है। अक्सर देखा गया है कि मरीज को स्ट्रेचर पर छोड़कर स्टाफ मोबाइल चलाता रहता है या आपस में गपशप करता रहता है। मतलब इनके अंदर से ‘सेवा’ की जो भावना है, वो पूरी की पूरी खत्म हो चुकी है। सीतामढ़ी के सभी अस्पतालों में कम्पाउंडर जैसे पद पर भर्ती होने वाले लगभग सभी स्टाफ बिना किसी टेक्निकल डिग्री के ही जॉब कर रहे हैं। अस्पतालों में 8वीं,10वीं पास लड़को को कम सैलरी पर भर्ती किया जाता है और उनसे सुई और पानी चढ़ाने का काम करवाया जाता है।
सीतामढ़ी में ऑक्सीजन की कमी, दवाओं की ब्लैक मार्केटिंग और मशीनों का महीनों तक खराब रहना आम बात है
सीतामढ़ी में कई मामले ऐसे सामने आए हैं, जहाँ समय पर इलाज न मिलने की वजह से मरीजों ने दम तोड़ दिया है। यहाँ समय पर न तो डॉक्टर उपलब्ध होते हैं और न ही जरूरी उपकरण। ऑक्सीजन की कमी, दवाओं की ब्लैक मार्केटिंग और मशीनों का महीनों तक खराब रहना यहाँ आम बात है। यहाँ का जांच घर आपको झूठे रिपोर्ट सबमिट करके आपको सच्चे और अच्छे ईलाज से दूर कर देता है। सरकारी अस्पतालों की दुर्दशा और प्राइवेट अस्पतालों की लूट, दोनों ने मिलकर यहाँ के आम लोगों की जिंदगी को दांव पर लगा रखा है। डॉक्टर और स्टाफ में इंसानियत की कमी इतनी साफ दिखती है कि मरीजों को ग्राहक और मौत को व्यापार बना दिया गया है। सीतामढ़ी में मेडिकल व्यवस्था का स्वरूप ‘स्वास्थ्य सेवा’ नहीं बल्कि ‘स्वास्थ्य बाजार’ है। चिकित्सीय नैतिकता शब्द से यहाँ का अस्पताल, डॉक्टर और स्टॉफ सभी अनभिज्ञ है। यहाँ के डॉक्टर सिर्फ आपका सर्दी-बुखार ठीक कर सकते हैं। गंभीर बीमारी की स्थिति में यहाँ आपसे आठ-दस दिन तक खूब रूपये ठगे जाएंगे, फिर आपको बड़े शहरों में रेफर कर दिया जाएगा। और यहाँ से आपके लिए भटकाव का दौर शुरू हो जाएगा। अगर डॉक्टर्स और अस्पतालों का रवैया ऐसा ही रहा तो आम जनता का छोटे शहरों के स्वास्थ्य व्यवस्था पर से भरोसा उठ जाएगा।
