मंडल–कमंडल की आग ने भारतीय राजनीति को हमेशा के लिए बदल दिया था। 90 के दशक में वी.पी. सिंह सरकार द्वारा मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करने से अन्य पिछड़ा वर्ग का मत आधार मज़बूत हुआ, वहीं कमंडल की लहर ने राम मंदिर आंदोलन के माध्यम से हिंदू एकता को नया आयाम दिया। भारतीय जनता पार्टी ने इसी ध्रुवीकरण के सहारे राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता प्राप्त की। लेकिन अब वर्ष 2026 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) से जुड़ा आरक्षण विवाद एक नई राजनीतिक दिशा तय करता दिख रहा है। सवर्ण हिंदुओं की नाराज़गी तेज़ी से बढ़ रही है।

हिंदू–मुस्लिम ध्रुवीकरण के बाद अब राजनीति जातिगत विभाजन की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है। केंद्र सरकार इस उलझन में गहराई तक फंसती जा रही है और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की एकजुटता पर खतरा मंडराने लगा है। विपक्षी दल इस स्थिति को अवसर के रूप में भुनाने को आतुर हैं। यूजीसी का ताज़ा विवाद कोई साधारण नीतिगत निर्णय नहीं है।
सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय के बावजूद
हाल ही में यूजीसी ने प्राध्यापक भर्ती में 50 प्रतिशत आरक्षण सीमा से अधिक जाने की अनुमति दी है, जिससे सवर्ण अभ्यर्थियों के लिए अवसर और सीमित हो गए हैं। सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय के बावजूद, जिसमें आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत तय की गई थी, केंद्र सरकार ने इस सीमा को नज़रअंदाज़ किया है। सवर्ण संगठनों ने सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए हैं। दिल्ली, मुंबई और पटना में सवर्ण महासंघों के धरनों ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। वर्ष 2018 का पटेल आरक्षण आंदोलन और 2020 का मराठा आरक्षण विवाद इस असंतोष के पूर्व संकेत थे। अब यह आक्रोश उच्च शिक्षा तक पहुंच गया है, जहां सवर्ण युवाओं को लग रहा है कि उनकी मेहनत और योग्यता व्यर्थ हो रही है। यह स्थिति राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार के लिए गंभीर संकट बनती जा रही है।
“सबका साथ, सबका विकास” का ज़मीनी हकीकत
भारतीय जनता पार्टी वर्षों से “सबका साथ, सबका विकास” का नारा देती रही है, लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे भिन्न प्रतीत होती है। हिंदू–मुस्लिम ध्रुवीकरण ने 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को बड़ी सफलता दिलाई। अयोध्या में राम मंदिर का शिलान्यास, नागरिकता संशोधन कानून, राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर का मुद्दा और कश्मीर से अनुच्छेद 370 की समाप्ति—ये सभी कदम हिंदू मतदाताओं को एकजुट करने वाले रहे। किंतु अब सवर्ण हिंदू स्वयं को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। जो सवर्ण समाज भाजपा का पारंपरिक मतदाता रहा है, वही अब असंतोष और विद्रोह के भाव में दिखाई दे रहा है।
चुनावों में भाजपा को बड़ा झटका लग सकता है
ब्राह्मण, कायस्थ और भूमिहार जैसे समुदायों में असंतोष की लहर साफ़ दिख रही है। बिहार में जनता दल (यूनाइटेड), जो राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का हिस्सा है, पहले से ही जातीय समीकरणों को लेकर सतर्क रहता है। यदि सवर्ण नाराज़गी और फैली, तो 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में भाजपा को बड़ा झटका लग सकता है। मंडल और कमंडल के बाद जिस तरह राजनीति की दिशा बदली थी, क्या अब आरक्षण आधारित ध्रुवीकरण एक नई लहर लाएगा?
मंडल राजनीति ने अन्य पिछड़ा वर्ग को सशक्त किया, जिससे समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल और बहुजन समाज पार्टी जैसे दल मज़बूत हुए। कमंडल राजनीति ने भाजपा को ऊंचाइयों तक पहुंचाया। सवर्ण आरक्षण की मांग के परिणामस्वरूप आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण लागू किया गया, जिसे 103वें संविधान संशोधन के माध्यम से वैधानिक रूप दिया गया। इसके बावजूद उच्च शिक्षा और सरकारी नौकरियों में सवर्णों की भागीदारी लगातार घट रही है। यूजीसी का हालिया निर्णय इस असंतुलन को और बढ़ावा देता है।
आंकड़े,असंतोष को बल
आंकड़े इस असंतोष को बल देते हैं। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन के अनुसार उच्च शिक्षा में सवर्ण छात्रों का नामांकन घटकर 20 प्रतिशत से भी कम रह गया है, जबकि उनकी जनसंख्या 30 प्रतिशत से अधिक है। इससे अन्याय और वंचना की भावना जन्म ले रही है। विपक्षी दल इस मौके को भुनाने में जुट गए हैं। कांग्रेस ने हमेशा की तरह “सामाजिक न्याय” का नारा तेज़ कर दिया है, लेकिन वास्तविक उद्देश्य सवर्ण असंतोष का राजनीतिक लाभ उठाना प्रतीत होता है। राहुल गांधी ने हाल ही में एक जनसभा में कहा कि “आरक्षण का दुरुपयोग हो रहा है और सवर्णों का अधिकार छीना जा रहा है।” यह वही कांग्रेस है, जो कभी मंडल आयोग की मुखर विरोधी रही थी।
समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश और बिहार में सवर्ण–अन्य पिछड़ा वर्ग गठबंधन की बात करने लगे हैं। राष्ट्रीय जनता दल के तेजस्वी यादव बिहार में सवर्ण महासंघों से पर्दे के पीछे संवाद कर रहे हैं। महाराष्ट्र में शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे गुट) मराठा–सवर्ण एकता पर दांव लगा रही है। विपक्ष की रणनीति स्पष्ट है—हिंदू–मुस्लिम राजनीति से ऊब चुके सवर्ण मतदाताओं को अपने पाले में लाना। यदि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में दरार पड़ी, तो 2029 के लोकसभा चुनाव विपक्ष के लिए वरदान साबित हो सकते हैं। गठबंधन के सहयोगी दलों की राजनीति भी नए सिरे से आकार ले रही है।
सवर्ण असंतोष असहज स्थिति
बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जातीय संतुलन साधने के लिए जाने जाते हैं। जनता दल (यूनाइटेड) का झुकाव अन्य पिछड़ा और अत्यंत पिछड़ा वर्ग की ओर रहा है, लेकिन सवर्ण असंतोष उन्हें असहज स्थिति में डाल रहा है। चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) सवर्ण समर्थन की तलाश में है, लेकिन वह पुरानी नीतियों से आगे नहीं बढ़ पा रही। आंध्र प्रदेश में तेलुगु देशम पार्टी के चंद्रबाबू नायडू तेलुगु सवर्णों की आवाज़ बनने का प्रयास कर रहे हैं।
महाराष्ट्र में अजित पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी सवर्ण–मराठा समीकरण पर भरोसा जता रही है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का गणित अब लड़खड़ाता दिखाई दे रहा है। यदि भाजपा ने सवर्ण समर्थन खो दिया, तो “400 पार” का लक्ष्य महज़ सपना बनकर रह जाएगा। यह विवाद केवल आरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि उच्च शिक्षा की गुणवत्ता पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करता है। जब योग्य उम्मीदवारों को अवसर नहीं मिलता, तो विश्वविद्यालयों और संस्थानों का स्तर प्रभावित होता है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान और भारतीय प्रबंधन संस्थान जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में भी योग्यता के ह्रास की चिंता बढ़ रही है।
यूजीसी का निर्णय विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन की उन रिपोर्टों के विपरीत है, जो योग्यता आधारित नियुक्तियों की सिफारिश करती हैं। सरकार को चाहिए कि 50 प्रतिशत आरक्षण सीमा को सख्ती से लागू करे और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के आरक्षण को प्रभावी बनाए। सवर्णों के लिए अलग से प्राध्यापक पद सृजित करने का प्रस्ताव भी विचार योग्य है।अन्यथा, छात्र आंदोलन उग्र रूप ले सकते हैं, जैसा कि 2015 में गुजरात में देखने को मिला था।
राजनीति जाति के इर्द-गिर्द
हिंदू–मुस्लिम ध्रुवीकरण के बाद अब राजनीति जाति के इर्द-गिर्द घूमने लगी है। भाजपा ने हिंदुत्व को मज़बूती दी, लेकिन यदि सवर्णों की उपेक्षा जारी रही तो हिंदू एकता में दरार पड़ सकती है। विपक्ष को अवसर मिला है, पर वे भी जातिवादी राजनीति के जाल में फंस सकते हैं। वास्तविक समाधान समावेशी नीतियों में है, जहां योग्यता और आरक्षण के बीच संतुलन हो। यदि सरकार ने समय रहते कदम नहीं उठाए, तो सवर्ण असंतोष एक बड़ा चुनावी भूचाल ला सकता है।
मंडल–कमंडल के बाद का यह दौर अत्यंत सावधानी की मांग करता है। राजनीति की धारा अब जाति की ओर मुड़ चुकी है—और यदि इसे नहीं रोका गया, तो सत्ता का कमंडल बुझते देर नहीं लगेगी।

