तमिलनाडु में ‘विजय’ राज , टीवीके ने रचा सियासी इतिहास, दक्षिण की सत्ता राजनीति में नए युग का उदय -रितेश सिन्हा

दक्षिण भारत की राजनीति ने एक बार फिर ऐसा ऐतिहासिक मोड़ लिया है जिसने राष्ट्रीय सियासत के समीकरणों को झकझोर दिया है। फिल्मों के पर्दे पर अन्याय और भ्रष्ट व्यवस्था के विरुद्ध लड़ने वाले “थलपति” विजय जोसेफ अब वास्तविक सत्ता के केंद्र में पहुंच चुके हैं। तमिलनाडु में उनकी पार्टी तमिलगा वेत्री कड़गम की सरकार बनना केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि दक्षिण भारतीय राजनीति में उभरते नए जनादेश, नए राजनीतिक विमर्श और पारंपरिक दलों के क्षरण का प्रतीक बन गया है। आंध्र प्रदेश में एनटी रामाराव के राजनीतिक उदय के बाद पहली बार ऐसा हुआ है, जब किसी अभिनेता ने अपनी पहली ही राजनीतिक पारी में इतनी बड़ी और निर्णायक सफलता हासिल की हो। दक्षिण भारत में फिल्मों के नायक और नायिकाएं लंबे समय से राजनीति का हिस्सा रहे हैं, लेकिन विजय का उभार अलग है। एमजीआर और जयललिता को भी वर्षों तक राजनीतिक संघर्ष और संगठनात्मक विस्तार की प्रक्रिया से गुजरना पड़ा था, जबकि विजय ने महज दो वर्षों में अपनी पार्टी को सत्ता के शीर्ष तक पहुंचाकर तमिलनाडु की राजनीति में भूचाल ला दिया।

यह केवल लोकप्रियता नहीं, बल्कि सत्ता विरोधी जनभावना, युवा ध्रुवीकरण और राजनीतिक शून्यता का विस्फोट था, मुख्यमंत्री पद की शपथ से पहले तमिलनाडु में जबरदस्त राजनीतिक नाट्यक्रम देखने को मिला। राजभवन और सत्ता पक्ष के बीच कई चरणों तक चली संवैधानिक रस्साकशी, समर्थन पत्रों की पड़ताल, बहुमत परीक्षण की रणनीति और सहयोगी दलों के साथ सत्ता-साझेदारी को लेकर चली गहन वार्ताओं ने पूरे घटनाक्रम को अत्यंत संवेदनशील बना दिया था। अंततः विजय ने बहुमत का आवश्यक आंकड़ा जुटाकर मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और तमिलनाडु में द्रविड़ राजनीति के पुराने सत्ता चक्र को चुनौती दे दी। दरअसल तमिलनाडु लंबे समय से राजनीतिक संक्रमण के दौर से गुजर रहा था। करुणानिधि और जयललिता जैसे विराट जनाधार वाले नेताओं के निधन के बाद द्रमुक और अन्नाद्रमुक दोनों दल वैचारिक और सांगठनिक संकट में फंस गए थे। द्रमुक सत्ता में रहते हुए भी परिवारवाद, सत्ता केंद्रीकरण, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक थकान के आरोपों से घिरी रही। वहीं अन्नाद्रमुक नेतृत्व संकट, गुटीय संघर्ष और राजनीतिक दिशाहीनता में उलझती चली गई। जनता के भीतर धीरे-धीरे यह धारणा बनने लगी कि तमिल राजनीति में एक नए चेहरे और नए राजनीतिक आख्यान की आवश्यकता है। विजय ने उसी शून्य को भरा।

विजय की सबसे बड़ी राजनीतिक सफलता यह रही कि उन्होंने स्वयं को केवल अभिनेता के रूप में नहीं, बल्कि “व्यवस्था परिवर्तन” के प्रतीक के रूप में स्थापित किया। फिल्मों के पर्दे पर गरीबों, युवाओं और आम जनता की लड़ाई लड़ने वाली उनकी छवि को राजनीतिक अभियान में बेहद सुनियोजित ढंग से इस्तेमाल किया गया। सामाजिक माध्यमों, युवा सम्मेलनों और आक्रामक जनसभाओं के जरिए उन्होंने पहली बार वोट देने वाले युवाओं, शहरी मतदाताओं और गैर-पारंपरिक वोट बैंक को अपने पक्ष में संगठित कर लिया। तमिलनाडु के इस चुनाव में कांग्रेस, द्रमुक और अन्नाद्रमुक के बीच चली राजनीतिक कशमकश भी बेहद महत्वपूर्ण रही। कांग्रेस लंबे समय तक द्रमुक के सहारे तमिल राजनीति में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने की कोशिश करती रही, लेकिन धीरे-धीरे उसे यह एहसास होने लगा कि द्रमुक की छाया में रहकर उसका स्वतंत्र जनाधार लगातार कमजोर हो रहा है। यही कारण रहा कि कांग्रेस के भीतर भी एक बड़ा वर्ग विजय के साथ नए राजनीतिक समीकरण बनाने के पक्ष में दिखाई दिया।
द्रमुक के सामने सबसे बड़ी चुनौती सत्ता विरोधी माहौल और संगठन के भीतर बढ़ती असंतुष्टि थी। स्टालिन सरकार पर प्रशासनिक विफलता, भ्रष्टाचार और परिवार आधारित राजनीति के आरोप लगातार गहराते गए। दूसरी ओर अन्नाद्रमुक अपनी ही अंतर्कलह से बाहर नहीं निकल सकी। पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर चल रही खींचतान और विभिन्न गुटों के बीच वर्चस्व की लड़ाई ने उसके जनाधार को कमजोर कर दिया। यही राजनीतिक विखंडन विजय के लिए सबसे बड़ा अवसर साबित हुआ। कांग्रेस ने भी इस पूरे घटनाक्रम में बेहद व्यावहारिक राजनीति अपनाई। दक्षिण भारत में लगातार सिकुड़ते जनाधार और आंतरिक गुटबाजी से जूझ रही कांग्रेस ने तमिलनाडु में सीधे सत्ता संघर्ष के बजाय “साझा मोर्चा राजनीति” का रास्ता चुना। पार्टी नेतृत्व यह समझ चुका था कि यदि भाजपा के विस्तार को रोकना है और द्रमुक-अन्नाद्रमुक के पारंपरिक समीकरणों को तोड़ना है, तो उसे नए क्षेत्रीय नेतृत्व के साथ खड़ा होना पड़ेगा। यही कारण रहा कि कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता विजय के प्रति नरम रुख अपनाते दिखाई दिए।
कांग्रेस की अपनी स्थिति भी दक्षिण भारत में बेहद जटिल बनी हुई है। कर्नाटक में सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के बीच जारी सत्ता संघर्ष लगातार सरकार की स्थिरता पर प्रश्न खड़े कर रहा है। वहीं केरल में केसी वेणुगोपाल, वीडी सतीशन और रमेश चेन्निथला के बीच नेतृत्व वर्चस्व की लड़ाई संगठनात्मक एकता को कमजोर कर रही है। गांधी परिवार के करीबी अलग-अलग शक्ति केंद्र कांग्रेस को एकजुट राजनीतिक शक्ति के बजाय खेमों में विभाजित संगठन के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। इसी राजनीतिक अस्थिरता के बीच भारतीय जनता पार्टी ने दक्षिण भारत में अपनी राजनीतिक घुसपैठ को और आक्रामक बना दिया है। तेलंगाना में बढ़ती राजनीतिक ताकत के बाद भाजपा अब तमिलनाडु, केरल और आंध्र प्रदेश में भी वैकल्पिक राजनीतिक धुरी बनने की रणनीति पर काम कर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा नेतृत्व दक्षिण भारत को अगले दशक की सबसे बड़ी राजनीतिक प्रयोगशाला के रूप में देख रहे हैं। मंदिर राजनीति, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, कल्याणकारी योजनाएं और नए सामाजिक समीकरणों के जरिए भाजपा दक्षिण में वैचारिक जमीन मजबूत करने में जुटी हुई है।
हालांकि विजय के उभार ने भाजपा की दक्षिणी रणनीति को तत्कालिक चुनौती अवश्य दी है, लेकिन भाजपा अब द्रविड़ राजनीति और क्षेत्रीय दलों के समानांतर राष्ट्रवादी राजनीतिक विमर्श खड़ा करने में लगी हुई है। पार्टी यह समझ चुकी है कि दक्षिण भारत में केवल वैचारिक राजनीति नहीं, बल्कि मजबूत स्थानीय नेतृत्व और क्षेत्रीय आकांक्षाओं के साथ तालमेल बनाना भी आवश्यक होगा।
तमिलनाडु की राजनीति में सत्ता की धुरी बदल चुकी है। विजय का मुख्यमंत्री बनना केवल एक अभिनेता की राजनीतिक सफलता नहीं, बल्कि दक्षिण भारत में उभरती नई राजनीतिक चेतना, युवा असंतोष, सत्ता विरोधी लहर और पारंपरिक दलों के क्षरण का परिणाम है। दक्षिण भारत की राजनीति में शुरू हुआ यह “विजय युग” आने वाले वर्षों में राष्ट्रीय राजनीति की दिशा और विपक्षी राजनीति की संरचना दोनों को गहराई से प्रभावित कर सकता है।


