भारत की राजनीति किसी भी राष्ट्रीय दल के लिए केवल चुनावी चुनौती नहीं है। यह उसकी जमीनी पकड़, सामाजिक संतुलन और नेतृत्व क्षमता की सच्ची कसौटी भी होती है। बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, हरियाणा और दिल्ली जैसे राज्य न केवल लोकसभा की संख्या तय करते हैं, बल्कि यह भी निर्धारित करते हैं कि कोई दल समाज के विभिन्न वर्गों—अल्पसंख्यक, पिछड़े वर्ग, दलित, आदिवासी, किसान और महिलाओं—के बीच कितना विश्वसनीय है।

वर्तमान समय में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस उत्तर भारत में जिस स्थिति में है, वह केवल चुनावी हार का परिणाम नहीं है। यह संकट वर्षों से चली आ रही संगठनात्मक उपेक्षा, जमीनी असफलताओं और नेतृत्व असंतुलन का प्रतिफल है। कांग्रेस की पहचान लंबे समय तक एक समावेशी पार्टी के रूप में रही है, जिसने समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर चलने का प्रयास किया।
आज कांग्रेस का वास्तविक संगठनात्मक ढांचा कमजोर है। इसके पीछे मुख्य कारण है राहुल गांधी के इर्द-गिर्द सिमटी हुई नीति, जमीनी वास्तविकताओं से दूर बैठे नेता और केवल टीवी/एनजीओ प्लेटफॉर्म पर सक्रिय लेकिन वास्तविक राजनीतिक धरातल पर निष्क्रिय नेता का बोलबाला।
कांग्रेस की ऐतिहासिक पहचान एक ऐसी पार्टी की रही है जो समाज के विविध वर्गों—अल्पसंख्यक, ओबीसी, दलित, आदिवासी, किसान और महिलाओं को साथ लेकर चलती थी। लेकिन आज उत्तर भारत में पार्टी की अधिकांश सामाजिक इकाइयाँ केवल नाम रह गई हैं। इसका सीधा असर पार्टी के जनाधार, कार्यकर्ता मनोबल और राजनीतिक विश्वसनीयता पर पड़ा है।
अल्पसंख्यक समुदाय की राजनीतिक भूमिका ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण रही है। इसके बावजूद कांग्रेस के भीतर अल्पसंख्यक नेताओं को लेकर यह भावना लगातार गहरी होती गई है कि उन्हें निर्णय प्रक्रिया में वास्तविक भागीदारी नहीं मिलती। बिहार में पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. शकील अहमद द्वारा उठाए गए सवाल हों या नसीमुद्दीन सिद्दीकी से जुड़ा घटनाक्रम—ये केवल व्यक्तिगत प्रकरण नहीं हैं। ये उस व्यापक असंतोष को दर्शाते हैं, जो पार्टी के भीतर लंबे समय से पनप रहा है। सामाजिक पकड़, अनुभव और संगठनात्मक योगदान के बावजूद नेताओं को हाशिये पर डाल देना कांग्रेस के समावेशी चरित्र पर प्रश्नचिह्न लगाता है।

राहुल गांधी ने भारतीय राजनीति में नई ऊर्जा और अपेक्षाएं जगाई हैं। भारत जोड़ो यात्रा जैसी पहल ने पार्टी को नैतिक और भावनात्मक समर्थन दिया। लेकिन संगठनात्मक स्तर पर यह ऊर्जा स्थायी नहीं बन पाई। आलाकमान के निर्णयों में उनके आसपास मौजूद अधिकांश नेता जमीनी समस्याओं, सामाजिक समीकरण और चुनावी रणनीति से कटे हुए नजर आए। यह वह वर्ग है जो केवल मीडिया में चर्चा, एनजीओ कार्यक्रमों और प्रतीकात्मक बैठकों में सक्रिय रहता है, लेकिन वास्तविक जनसंवाद, संगठन निर्माण और जमीन पर संघर्ष के लिए तैयार नहीं है।
इसका परिणाम साफ दिखाई देता है। कांग्रेस का पारंपरिक आधार—अल्पसंख्यक, पिछड़े वर्ग, दलित और किसान—धीरे-धीरे अन्य दलों की ओर आकर्षित हो रहा है। यह केवल व्यक्तिगत असफलता नहीं है, बल्कि संगठनात्मक विफलता और नेतृत्व चयन में लगातार किए गए गलत फैसलों का परिणाम है। जमीनी हकीकत से दूर बैठे नेता कांग्रेस की विफलता का सबसे बड़ा कारण है, नेताओं का वास्तविक जमीन से कट जाना। कई ऐसे नेता हैं जो केवल कागज़ों और पदों में सक्रिय दिखाई देते हैं। उनके पास क्षेत्रीय सामाजिक मुद्दों को समझने या उनके समाधान के लिए कोई ठोस योजना नहीं होती।
किसान राजनीति का केंद्र रहा है। इसके बावजूद किसान कांग्रेस अपेक्षित भूमिका निभाने में असफल रही। बड़े किसान आंदोलनों के दौरान भी कांग्रेस की किसान इकाई ज़मीनी नेतृत्व देने में पीछे रही।
कई राज्यों में किसान कांग्रेस के अध्यक्ष ऐसे नेताओं को बनाया गया, जिनका कृषि संकट या किसान संगठनों से सीधा जुड़ाव नहीं रहा। इससे किसानों के बीच यह संदेश गया कि कांग्रेस की किसान राजनीति घोषणाओं तक सीमित है।
बिहार और उत्तर प्रदेश में पार्टी के कई अल्पसंख्यक और पिछड़े वर्ग से जुड़े नेता केवल टीवी बहसों, मीडिया बयानबाजी और एनजीओ कार्यक्रमों में दिखाई देते हैं। जमीन पर उनका कार्यकर्ताओं और आम जनता के साथ प्रत्यक्ष संपर्क बहुत सीमित है। पार्टी की योजनाएँ, चाहे वह किसान कल्याण हो या दलित अधिकार, इन्हीं नेताओं की निष्क्रियता की वजह से जमीनी स्तर पर प्रभावहीन रह जाती हैं।
कांग्रेस के प्रकोष्ठ—ओबीसी सेल, महिला कांग्रेस, किसान कांग्रेस और अनुसूचित जाति-जनजाति प्रकोष्ठ के अध्यक्ष और वरिष्ठ नेता अक्सर केवल औपचारिक उपस्थितियों तक सीमित रहते हैं। उनके नेतृत्व में कोई सक्रिय कार्यकर्ता नेटवर्क नहीं बन पाता।
यह नेतृत्व वर्ग संगठन के भीतर केवल पद और प्रतीकात्मक सत्ता के लिए सक्रिय रहता है। वास्तविक राजनीतिक संवाद, जमीनी संघर्ष और सामाजिक मुद्दों की गंभीर समीक्षा का दायरा इन नेताओं के लिए नगण्य है। परिणामस्वरूप पार्टी के कार्यकर्ता और स्थानीय सामाजिक आधार असंतुष्ट और हताश महसूस करते हैं।
कांग्रेस के नेता टीवी चैनलों और एनजीओ कार्यक्रमों के माध्यम से सक्रिय दिखते हैं, लेकिन वास्तविक राजनीति और चुनावी रणनीति के निर्माण में उनका योगदान नगण्य है। ये नेता प्रचार और मीडिया गतिविधियों में समय और ऊर्जा खर्च करते हैं, जबकि संगठनात्मक निर्णय और जमीनी संवाद में योगदान नहीं देते।
इस तरह के नेतृत्व का संकट केवल संगठनात्मक कमजोरियों को उजागर नहीं करता, बल्कि पार्टी के जनाधार और सामाजिक समर्थन को भी कमजोर करता है। मीडिया में सक्रिय रहकर नेता खुद को प्रभावशाली दिखाते हैं, लेकिन असली राजनीतिक असर और जनसमर्थन हासिल करने में विफल रहते हैं।
राहुल गांधी की राजनीतिक छवि के इर्द-गिर्द बना यह नेतृत्व वर्ग मुख्य रूप से तीन प्रकार के नेता हैं: जमीनी हकीकत से कटे नेता – जो अपने क्षेत्र और कार्यकर्ताओं के साथ स्थायी संवाद नहीं रखते। टीवी और मीडिया पर सक्रिय नेता – जो केवल मंच, चैनल और समारोह में दिखाई देते हैं। एनजीओ और कार्यक्रम प्रबंधन वाले नेता – जो संगठन और जनसंवाद के बजाय बाहरी परियोजनाओं में व्यस्त रहते हैं।
इन नेताओं का प्रभाव यह हुआ कि पार्टी का निर्णय प्रक्रिया, सामाजिक संवाद और जनाधार कमजोर हुआ। आलाकमान के फैसले अक्सर इन नेताओं के दबाव या निष्ठा के आधार पर होते हैं, जिससे संगठन के वास्तविक और प्रभावशाली नेताओं का मार्ग अवरुद्ध होता है।
कांग्रेस का साधारण कार्यकर्ता—चाहे वह अल्पसंख्यक हो, पिछड़ा वर्ग, दलित, किसान या महिला—आज स्वयं को संगठन में हाशिये पर खड़ा महसूस करता है। चुनावी समय में उसकी भूमिका महत्वपूर्ण होती है, लेकिन उसके बाद निर्णय प्रक्रिया में उसकी भागीदारी सीमित रह जाती है।
ओबीसी, महिला कांग्रेस, अनुसूचित जाति-जनजाति प्रकोष्ठ और किसान कांग्रेस के नेतृत्व में यह निष्क्रियता सबसे स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। इन प्रकोष्ठों का वास्तविक उद्देश्य संगठन निर्माण, जमीनी समस्याओं का समाधान और समुदाय के मुद्दों को प्रभावी रूप से उठाना होना चाहिए था। किंतु यह प्रकोष्ठ केवल औपचारिक संरचना और प्रतीकात्मक जिम्मेदारियों तक सीमित रह गए हैं, जिससे संगठन का सामाजिक आधार धीरे-धीरे कमजोर होता गया।
कांग्रेस यदि भारत में पुनः प्रभावी भूमिका निभाना चाहती है, तो उसे यह स्वीकार करना होगा कि नेतृत्व केवल पद, मीडिया या एनजीओ गतिविधियों तक सीमित नहीं रह सकता। पार्टी को चाहिए कि वह राहुल गांधी के इर्द-गिर्द बैठे नाकारा और जमीनी असफल नेताओं की पहचान करे।
सभी प्रकोष्ठ—ओबीसी, महिला, किसान और अनुसूचित जाति-जनजाति—में सक्षम और जमीनी नेताओं को अवसर दे।
मीडिया और बाहरी परियोजनाओं से जुड़े नेताओं को संगठनात्मक और चुनावी जिम्मेदारियों के लिए प्रशिक्षित करे। कार्यकर्ताओं और स्थानीय जनता के साथ निरंतर संवाद स्थापित करे। चुनाव और संगठन में वास्तविक प्रदर्शन और परिणाम आधारित मूल्यांकन अपनाए।
जमीनी वास्तविकताओं से कटे हुए नेतृत्व के बिना उसकी राजनीति खोखली है। केवल मीडिया, एनजीओ कार्यक्रम और टीवी प्रचार के सहारे संगठन नहीं चल सकता। अब कांग्रेस नेतृत्व पर निर्भर करता है कि वह केवल संरचनाओं को बचाने में लगा रहता है या संगठन और जमीनी आधार का पुनर्निर्माण करने का साहस दिखाता है। जमीनी संघर्ष, कार्यकर्ताओं के विश्वास और वास्तविक नेतृत्व की उपस्थिति ही कांग्रेस को फिर से स्थापित कर सकती है। इसके बिना राहुल गांधी के नेतृत्व के इर्द-गिर्द सिमटा यह नाकारा और प्रतीकात्मक नेतृत्व केवल पार्टी के पतन को और गति देगा।
