लाठी चार्ज , आँसू गैस , पुलिस के भेष में गुंडे –क्यों, क्यों,क्यों ? देश गुस्से में —

लोकतंत्र की बुनियाद जनता के भरोसे और नागरिक अधिकारों पर टिकी होती है। जब इसी लोकतंत्र में नागरिकों की आवाज को लाठियों के दम पर दबाया जाने लगे, जब हवा में संवाद की जगह आँसू गैस का धुआँ तैरने लगे, और जब वर्दी की आड़ में छिपे असामाजिक तत्व शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर टूट पड़ें, तो समाज का अंतरात्मा कराह उठता है। आज देश के कोने-कोने से यही चीख सुनाई दे रही है क्यों? आखिर क्यों देश के अन्नदाताओं, युवाओं, छात्रों और नागरिकों को अपने ही अधिकारों की मांग करने पर अपराधी की तरह प्रताड़ित किया जा रहा है? यह गुस्सा किसी एक घटना का नहीं है। यह उस संचित आक्रोश की अभिव्यक्ति है जो सत्ता के अहंकार और पुलिसिया बर्बरता के खिलाफ देश के आम नागरिक के दिल में सुलग रहा है।

ज़ुल्म जब भी हद से आगे बढ़ने लगता है,
वहीं से बदलाव का सूरज निकलने लगता है।

आज जंतर-मंतर पर बच्चों और बच्चियों के साथ जिस प्रकार का बर्बरतापूर्ण व्यवहार किया गया, उसने मन को गहराई तक झकझोर दिया। मैंने जलियांवाला बाग का वह दौर नहीं देखा, लेकिन आज जो दृश्य सामने आए, उन्होंने इतिहास के उस काले अध्याय की याद अवश्य दिला दी। लोकतंत्र में अपनी बात शांतिपूर्ण ढंग से रखना हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। यदि उस अधिकार का उत्तर बल प्रयोग से दिया जाए, तो यह केवल कुछ लोगों पर नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों पर भी आघात है। इस घटना के लिए जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध उचित कार्रवाई होनी चाहिए । भारतीय संविधान ने हर नागरिक को शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखने, विरोध प्रदर्शन करने और असहमति जताने का मौलिक अधिकार दिया है।

विरोध कोई अपराध नहीं है, बल्कि यह एक जीवंत लोकतंत्र की पहचान है। लेकिन हाल के वर्षों में एक खतरनाक प्रवृत्ति देखने को मिली है। जैसे ही समाज का कोई वर्ग सरकार की किसी नीति के खिलाफ सड़क पर उतरता है, प्रशासनिक अमला संवाद का रास्ता चुनने के बजाय दमन का रास्ता अख्तियार कर लेता है। जब देश का युवा रोजगार मांगता है, जब देश का किसान फसलों के सही दाम मांगता है, जब महिलाएं सुरक्षा की गुहार लगाती हैं, तो उन्हें टेबल पर बिठाकर सुनने के बजाय सड़कों पर बैरिकेड्स, कटीले तार और पुलिस की भारी संकरी कतारें मिलती हैं। क्या एक लोककल्याणकारी राज्य में अपने ही नागरिकों को दुश्मन देश की सेना की तरह रोकना जायज है? यह सवाल आज हर संवेदनशील नागरिक पूछ रहा है।

आज जंतर मंतर पर अपना हक माँगते नौनिहालों को मारते पीटते नराधम पिशाचों को शर्म नहीं आई। सत्ता मद में ये सिर से पैर तक सने हैं। इनके दिमाग़ में इतना मल है कि ये मक्कार, विवेकहीन लोग कुछ सुनना नहीं चाहते। जंतर-मंतर पर आज जब छात्र आंदोलन में बोल पाने में असमर्थ छात्रों की उपस्थिति की ये तस्वीर (आप http://www.youtube.com/@mediamenzindia पर देख सकते हैं) नज़रों के सामने आई तो रुलाई ही आ गई। इन दिव्यांग बच्चों का इस लड़ाई में शरीक होना इस बात का सशक्त प्रमाण है कि अन्याय की गूंज इतनी तेज है कि उसके विरोध के लिए सचमुच अब शब्दों की ज़रूरत नहीं है। वैसे भी अपढ़ ‘भगेन्दर’को भागने के अलावा कुछ नहीं आता। सुखद बात ये है कि ये सब संवेदनशील नए बच्चे भविष्य के नायकों की क़तार में हैं जो देश को निस्संदेह सुंदर बनाएँगे। इन बच्चों को बहुत मुहब्बत ।

इनको बहुत बल मिले। पुलिस मैनुअल कहता है कि लाठी चार्ज या आँसू गैस का प्रयोग केवल और केवल उग्र भीड़ को नियंत्रित करने और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए अंतिम विकल्प के रूप में किया जाना चाहिए। लेकिन हालिया घटनाओं के वीडियो और तस्वीरें कुछ और ही कहानी बयां करती हैं। शांति से बैठे प्रदर्शनकारियों पर बिना किसी पूर्व चेतावनी के लाठियां भांजी जाती हैं। बुजुर्गों के सिर से खून बहता है, युवाओं की हड्डियां टूटती हैं और महिलाओं को सड़कों पर घसीटा जाता है। आँसू गैस के गोलों का अंधाधुंध इस्तेमाल भीड़ को तितर-बितर करने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें सजा देने के लिए किया जाता प्रतीत होता है। दम घोटने वाली यह गैस कई बार बुजुर्गों और बच्चों के लिए जानलेवा साबित हो जाती है।

जल तोप (वॉटर कैनन) का इस्तेमाल कड़ाके की ठंड में प्रदर्शनकारियों का मनोबल तोड़ने के लिए किया जाता है। क्या यह बल प्रयोग कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए है या नागरिकों के आत्मसम्मान को कुचलने के लिए? जब रक्षक ही भक्षक की भूमिका में नजर आने लगे, तो जनता का कानून और व्यवस्था पर से विश्वास उठने लगता है। यही अविश्वास आज देशव्यापी गुस्से का सबसे बड़ा कारण है। बच्चों की मौत की भी बात हो रही है, पिटाई के वीडियो वायरल हैं. सरकार ने जो एक दशक से खौफ बना रखा था वह आज भरभराकर गिर गया. बैरिकेडिंग टूटना, पुलिस और पैरा मिलिट्री फोर्स की ह्यूमन चेन टूटना तो आम रहा. जिन्हे रील वाले, काक्रोच कहा गया, वह काक्रोच आज संसद की दीवारों पर चढ़ गए. नरेंद्र मोदी के खौफ से उनके चार सौ सांसद, हजार से ऊपर विधायक, केंद्र के दर्जनों मन्त्री, राज्यों के मुख्यमन्त्री थर थर कांपते है और आज लोगों ने वीडियो देखा कि किस तरह से छप्पन इंची मोदी संसद से जान बचाकर भागे हैं. यह नेहरू बनने चले थे कि नेहरू का रिकॉर्ड तोड़ दिया.

नेहरू प्रधानमन्त्री थे तो चांदनी चौक पर दँगा हो गया. अपने उसी आवास से खुद जीप चलाते नेहरू चांदनी चौक गए, जिसके पुस्तकालय का मोदी ने नाम बदला है. चांदनी चौक पर खड़े हो गए नेहरू. जीप पर खड़े होकर चिल्लाने लगे कि बेशर्मो मुझे मार डालो पहले. इसी आजादी के लिए हम दशकों से लगे थे. लोग चाकू तलवार लाठी डंडे छिपाकर भागने लगे और नेहरू अकेले चिल्लाते रहे कि मुझे मार डालो… भाग क्यों रहे हो बेहुदों, मुझे मार डालो. आज नरेंद्र मोदी की हिम्मत नहीं हुई कि वह अपनी फोर्स और बुलेट फ्रूफ गाड़ी लेकर निहत्थे टीन एज बच्चों के बीच जाएं उनकी बात सुने. जान बचाकर भागे. इस तरह के फट्टू लोग नेहरू की बराबरी करने चले हैं!

‘पुलिस के भेष में गुंडे’ यह साजिश? हाल के आंदोलनों में एक बेहद डरावना और चिंताजनक ट्रेंड देखा गया है। प्रदर्शन स्थलों से ऐसे कई वीडियो सामने आए हैं जहाँ सादे कपड़ों में या पुलिस की अधूरी वर्दी पहने कुछ नकाबपोश लोग प्रदर्शनकारियों पर पत्थरबाजी करते हैं, वाहनों को आग लगाते हैं और महिलाओं के साथ बदसलूकी करते हैं। बाद में पता चलता है कि ये पुलिस बल के आधिकारिक हिस्से नहीं थे, या फिर इन्हें जानबूझकर आंदोलन को हिंसक बनाने के लिए घुसाया गया था।

इस प्रवृत्ति ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बिना नेमप्लेट और बिना पहचान पत्र के पुलिसिया कार्रवाई करने वाले ये लोग कौन हैं? क्या किसी शांतिपूर्ण आंदोलन को बदनाम करने के लिए सत्ता प्रायोजित उपद्रवियों का सहारा लिया जा रहा है? अगर आपराधिक छवि के लोग पुलिस की आड़ में हिंसा फैला रहे हैं, तो यह पूरी खाकी वर्दी की साख पर एक गहरा धब्बा है। जब कानून लागू करने वाली एजेंसियां खुद संदिग्ध तत्वों को अपने साथ शामिल कर लेती हैं, तो न्याय की उम्मीद पूरी तरह खत्म हो जाती है। जनता का यह पूछना बिल्कुल जायज है कि “पुलिस के भेष में ये गुंडे क्यों और किसके इशारे पर काम कर रहे हैं?”

किसी भी देश का भविष्य उसके विश्वविद्यालयों और युवा शक्ति में बसता है। लेकिन आज देश के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों से लेकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले केंद्रों तक, हर जगह युवाओं की आवाज को बलपूर्वक दबाया जा रहा है। परीक्षाओं में धांधली, पेपर लीक और बेरोजगारी के खिलाफ जब युवा शांतिपूर्वक मार्च निकालते हैं, तो उन्हें पुलिसिया बूटों और लाठियों का सामना करना पड़ता है। एक युवा जो सालों तक रात-दिन जागकर पढ़ाई करता है, जब वह अपने हक के लिए सड़क पर उतरता है और उसे लहूलुहान कर दिया जाता है, तो सिर्फ उसका शरीर नहीं टूटता, बल्कि इस व्यवस्था पर उसका भरोसा भी टूट जाता है। जब देश की मेधावी बेटियों और पदक विजेता खिलाड़ियों को न्याय मांगने पर सड़कों पर घसीटा जाता है, तो पूरा देश शर्मसार होता है और जनता का गुस्सा उबलने लगता है। इस पूरे घटनाक्रम में मुख्यधारा के मीडिया (Mainstream Media) के एक बड़े हिस्से का रवैया भी जनता के गुस्से को भड़काने का काम कर रहा है।

जब पुलिस निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर बर्बरता कर रही होती है, तब मीडिया का एक वर्ग पीड़ितों को ही ‘दंगाई’, ‘अराजक तत्व’ या ‘देशद्रोही’ साबित करने में जुट जाता है। सच्चाई को तोड़-मरोड़ कर पेश करने की इस कोशिश ने सोशल मीडिया को एक वैकल्पिक मंच बना दिया है। आज जब मुख्यधारा का मीडिया आंखें मूंद लेता है, तब आम नागरिक अपने मोबाइल कैमरों से पुलिसिया बर्बरता के सीधे विजुअल्स दुनिया के सामने ला रहे हैं। इन वीडियो ने सत्ता के दावों की पोल खोल कर रख दी है, जिससे जनता का आक्रोश और अधिक बढ़ गया है। नागरिकों पर होने वाले इस दमन के पीछे अक्सर गहरी राजनीतिक गोटियां खेली जाती हैं। जब भी कोई आंदोलन सरकार की विफलताओं को उजागर करने लगता है, तो राज्य तंत्र और सत्ताधारी दल उसे जाति, धर्म या क्षेत्र के चश्मे से देखने लगते हैं। आंदोलनकारियों को विभाजित करने और समाज में ध्रुवीकरण पैदा करने के लिए बल प्रयोग को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।

यह रणनीति तात्कालिक रूप से किसी राजनीतिक दल को फायदा पहुँचा सकती है, लेकिन दीर्घकालिक रूप से यह देश के सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर देती है। लोग अब इस खेल को समझने लगे हैं, और यही कारण है कि अब दमन के खिलाफ समाज के विभिन्न वर्ग एक साथ खड़े हो रहे हैं। लाठी, गोली और आँसू गैस से अस्थाई रूप से भीड़ को तो हटाया जा सकता है, लेकिन जनता के मन में उपजे विचारों और उनके जायज सवालों को कभी नहीं कुचला जा सकता। इतिहास गवाह है कि जब-जब सत्ताओं ने नागरिक अधिकारों को लाठियों के दम पर दबाने की कोशिश की है, तब-तब जनता का गुस्सा एक ऐसे सैलाब में बदला है जिसने बड़े-बड़े सिंहासनों को हिलाकर रख दिया है। देश आज गुस्से में है क्योंकि वह अपने लोकतंत्र को लहूलुहान होते नहीं देख सकता। समय आ गया है कि सत्ता में बैठे लोग इस गुस्से की गूंज को सुनें, अपनी गलतियों को सुधारें और ‘लाठी तंत्र’ को छोड़कर वापस ‘लोकतंत्र’ के रास्ते पर लौटें।

Change Language