शख्सियत का निख़ार और ज़िंदगी का हसीन फ़लसफ़ा–

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह, हरदा, मध्य प्रदेश

​इंसान का वज़ूद अपने आप में एक कायनात की तरह है, जिसकी सजावट और संवारने के लिए बाहरी और अंदरूनी दोनों तरह के संतुलन की ज़रूरत होती है।

ज़िंदगी को ख़ुबसूरत और आकर्षक बनाने का सफ़र हमेशा छोटी-छोटी आदतों से शुरू होता है। जब इंसान अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में नफ़ासत और सादगी को अपनाता है, तो उसकी शख्सियत में एक अलग ही आकर्षण पैदा हो जाता है। ज़िंदगी को मो’तबर (सम्मानजनक) बनाने के लिए सबसे पहले अपने दायरे को सीमित करना और मिकदार (मात्रा) के मुक़ाबले कैफ़ियत (गुणवत्ता) को तरजीह देना ज़रूरी है। चुने हुए लोगों से ताल्लुक़ रखना इंसान को ग़ैर-ज़रूरी मानसिक उलझन से महफूज़ रखता है। इसके साथ ही, अपने हुलिए और बाहरी नफ़ासत पर ध्यान देना, साफ-सुथरा लिबास पहनना और ख़ुद को बवक़ार अंदाज़ में पेश करना इस बात का सबूत है कि इंसान अपनी इज़्ज़त ख़ुद करता है। सहतमंद जिस्म में ही सेहतमंद रूह बसती है,इसलिए संतुलित खुराक़ का चुनाव और जिस्मानी साफ़-सफ़ाई पर ध्यान देना रोज़मर्रा के लाज़मी कामों में शामिल होना चाहिए। जिस्मानी ऊर्जा के साथ-साथ अंदरूनी सुकून भी उतना ही अहम है। दिन भर की मशरूफ़ियत (व्यस्तता) से हटकर, तन्हाई के चंद लम्हे ख़ालिके हक़ीक़ी (ईश्वर) के हुज़ूर गुज़ारना दिल को इत्मीनान बख़्शता है और रूह को ताज़गी देता है।


​मामलाते ज़िंदगी (जीवन के लेन-देन व व्यवहार) में इख़लास (ईमानदारी) का होना और दिली रिश्तों में पारदर्शिता इंसान को मुनाफ़क़त (कपट) से पाक रखती है। या तो रिश्ता निभाएं तो पूरे दिल से, वर्ना ख़ुद को बेवजह की उलझनों से आज़ाद रखें। ज़िंदगी बहुत मुख़्तसर (छोटी) है, इसलिए इसे नफ़रत, कीना (द्वेष), हसद (ईर्ष्या), इंतक़ाम (बदला) और बेकार बहसों में  बर्बाद करने के बजाय सुकून और मोहब्बत के नाम करना चाहिए। इन तमाम मनफ़ी (नकारात्मक) रवैयों और उन चीज़ों से परहेज़ करना जो जिस्मानी और मानसिक सुकून को मुतास्सिर (प्रभावित) करती हैं, एक कामयाब और पुरसुकून इंसान की सबसे बड़ी पहचान है।
​जब कोई शख़्स अपनी सोच, अपने रवैयों और अपने मामूलात (नियमों/दिनचर्या) में इस तसंतुल को पा लेता है, तो उसकी शख्सियत से एक पुरसुकून और दिलकश ऊर्जा निकलती है जो न सिर्फ़ ख़ुद उसके लिए इत्मीनान का सबब बनती है बल्कि दूसरों के लिए भी तारीफ़ का मरकज़ होती है।

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