डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह,सहज़,हरदा, मध्य प्रदेश

लोग अक्सर यह समझते हैं कि इश्क़ सिर्फ़ वादों की छांव में, क़समें खाने में और साथ उम्र बिताने के लंबे सफ़र में ही ज़िंदा रहता है। पर जो लोग इश्क़ की आग में पूरी तरह जल चुके हैं, वे जानते हैं कि मोहब्बत की असली धड़कन तो उन अनकहे शिक़वों और हक़ भरी शिकायतों में बसती है, जो आशिक़ अपनी माशूका से सिर्फ़ इसलिए करता है क्योंकि वह उसे अपनी दुनिया मानता है। जब एक आशिक़ अपनी माशूका से रूठता है, तो उसके हर एक शिक़वे के पीछे एक ही दुआ होती है,कि वह उसे मना ले। क्योंकि जिस रिश्ते में शिकायतें ज़िंदा रहती हैं, समझो वहां रूहें अब भी एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। लेकिन, क़यामत तो तब आती है जब शिकायतों का सिलसिला थम जाता है, जब दिल के सारे ग़िले-शिक़वे दम तोड़ देते हैं। उस ख़ामोशी से भयानक मौत किसी रिश्ते की नहीं हो सकती। जिस दिन माशूक़ ख़ामोश हो जाए और आशिक़ के किसी भी शिक़वे का जवाब न दे, समझ लेना चाहिए कि अब मोहब्बत की क़ब्र पर ख़ामोशी की पहली मिट्टी डाली जा चुकी है। वह ख़ामोशी दिलों के बीच हमेशा के लिए दीवार बन जाती है।

और फ़िर ज़िंदगी के इस सफ़र में कुछ पल ऐसे आते हैं, जो तमाम उम्र का मरहम या नासूर बन जाते हैं। यूं तो लोग पहली मुलाक़ात को पूरी ज़िंदगी याद रखते हैं, जब नज़रें पहली बार मिली थीं, नाम ज़ेहन में उतरे थे और एक-दूसरे के लहज़े को परखने की कोशिश हो रही थी। लेकिन आशिक़ और माशूक़ की ‘आखिरी मुलाक़ात’ का दर्द कुछ और ही होता है। उस आख़िरी मुलाकात से ज़्यादा गहरा और दर्दनाक कुछ नहीं होता। शायद उस वक्त दोनों के दिलों को पहले से ही इस बात की ख़बर होती है कि यह हसीन मंज़र, यह आमने-सामने बैठकर एक-दूसरे को जी भर के देखना अब इस जन्म में दोबारा नसीब नहीं होगा। तभी तो विदाई के उन चंद लम्हों को, माशूक़ के मुड़कर आखिरी बार देखने को, जाते-जाते उस भीगे हुए हाथ हिलाने को, और किसी पुरानी बात पर बेवजह मुस्कुरा देने वाले पलों को आशिक अपने सीने में हमेशा के लिए दफ़ना लेता है।

और सबसे ज़्यादा टीस तो वो मामूली सी ख़ामोशी देती है, जिसे उस वक्त दोनों ने महज़ एक इत्तेफ़ाक़ या मामूली बात समझकर छोड़ दिया था, पर वही ख़ामोशी आगे चलकर पूरी ज़िंदगी का सबसे बड़ा दर्द बन जाती है। माशूक़ की जुदाई का यह ग़म एक ऐसे मर्ज़ की तरह है, जिसकी दवा सिर्फ़ वही ख़ामोश लम्हे हैं, जो अब कभी लौटकर नहीं आएंगे।




