सत्ता का अहंकार और विपक्ष का प्रदर्शन, कैमरों की चमक में गुम होती संसदीय गरिमा- रितेश सिन्हा

भारतीय संसद लोकतंत्र का सर्वोच्च मंदिर है। यहां देश की दिशा तय होती है, सरकार से जवाबदेही मांगी जाती है और करोड़ों नागरिकों की आकांक्षाओं को आवाज मिलती है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में संसद के भीतर और परिसर में जो दृश्य देखने को मिल रहे हैं, वे इस गरिमामयी संस्था की बदलती तस्वीर पेश करते हैं। बहस और तर्क की जगह शोर, प्रदर्शन और प्रतीकात्मक राजनीति ने ले ली है। संसद परिसर अब कई बार ऐसा प्रतीत होता है मानो वह गंभीर लोकतांत्रिक विमर्श का मंच नहीं, बल्कि कैमरों के सामने राजनीतिक संदेश देने का रंगमंच बन गया हो। लोकसभा सचिवालय द्वारा संसद परिसर में वेशभूषा आधारित और नाटकीय विरोध प्रदर्शनों पर सख्ती के संकेत इसी बदलते राजनीतिक माहौल की प्रतिक्रिया हैं। राम मंदिर के कथित चढ़ावा चोरी के मुद्दे पर संसद भवन के मकर द्वार के निकट विपक्षी सांसदों द्वारा किया गया प्रदर्शन चर्चा का विषय बन गया। पूर्णिया से निर्दलीय सांसद पप्पू यादव पुजारी के वेश में बैठे, नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी श्रद्धालु की भूमिका में दानपेटी तक पहुंचे और उसके बाद प्रतीकात्मक अभिनय के माध्यम से आरोपों को प्रस्तुत किया गया। कुछ ही मिनटों में यह दृश्य सोशल मीडिया पर छा गया।

लोकतंत्र में विरोध का अधिकार है। विपक्ष का दायित्व ही सरकार से कठिन प्रश्न पूछना और कथित अनियमितताओं को उठाना है। यदि किसी सार्वजनिक संस्था या धार्मिक न्यास में वित्तीय गड़बड़ी के आरोप हैं, तो उनकी निष्पक्ष जांच की मांग करना भी लोकतांत्रिक अधिकार है। प्रश्न यह है कि क्या संसद परिसर इस प्रकार के मंचन का स्थान होना चाहिए? क्या राष्ट्रीय महत्व के प्रश्नों को अभिनय और दृश्यात्मक प्रस्तुति तक सीमित कर देना लोकतांत्रिक विमर्श को मजबूत करता है या उसे सतही बनाता है? यह पहली बार नहीं है जब संसद परिसर विरोध की प्रयोगशाला बना हो। पहले भी तख्तियां, पोस्टर और प्रतीकात्मक प्रदर्शन विवाद का कारण बने हैं। मकर द्वार के निकट प्रदर्शन को लेकर पहले से नियम मौजूद हैं और लोकसभा सचिवालय समय-समय पर उन्हें दोहराता रहा है। ऐसे में यदि नियमों की अवहेलना होती है तो सचिवालय की कार्रवाई स्वाभाविक मानी जाएगी। संसदीय संस्थाओं की गरिमा केवल भवनों से नहीं, बल्कि वहां स्थापित मर्यादाओं से बनती है।
इस पूरे घटनाक्रम का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि विपक्ष प्रदर्शन की राजनीति कर रहा है तो सत्ता पक्ष पर भी यह जिम्मेदारी है कि वह संसद को गंभीर बहस का मंच बनाए। लोकतंत्र केवल बहुमत से नहीं चलता, बल्कि संवाद से चलता है। विपक्ष के प्रश्नों का उत्तर देना, संवेदनशील विषयों पर चर्चा कराना और संसदीय समितियों को प्रभावी बनाना भी सरकार का दायित्व है। यदि संवाद के रास्ते सीमित होंगे तो टकराव की राजनीति स्वाभाविक रूप से बढ़ेगी। दुर्भाग्य यह है कि आज दोनों पक्ष अपनी-अपनी राजनीतिक रणनीतियों में इतने उलझ गए हैं कि संसद का मूल उद्देश्य पीछे छूटता दिखाई देता है। सत्ता पक्ष अक्सर विपक्ष के विरोध को राजनीतिक नाटक कहकर खारिज कर देता है, जबकि विपक्ष कई बार तथ्यों और संसदीय बहस की बजाय प्रतीकों और दृश्यात्मक प्रदर्शनों पर अधिक निर्भर दिखाई देता है। परिणाम यह होता है कि देश की वास्तविक समस्याएं शोर में दब जाती हैं।
देश के सामने बेरोजगारी, महंगाई, कृषि संकट, स्वास्थ्य सेवाओं की चुनौतियां, शिक्षा की गुणवत्ता, सीमा सुरक्षा, साइबर अपराध, कृत्रिम बुद्धिमत्ता से बदलती अर्थव्यवस्था और जलवायु परिवर्तन जैसे अनेक गंभीर प्रश्न हैं। जनता चाहती है कि संसद में इन मुद्दों पर ठोस चर्चा हो, नीतियां बनें और जवाबदेही तय हो। लेकिन जब समाचारों की सुर्खियां केवल नारे, पोस्टर और प्रतीकात्मक प्रदर्शन बन जाते हैं तो यह लोकतांत्रिक प्राथमिकताओं पर भी प्रश्न खड़ा करता है। शुक्रवार को विपक्ष ने प्रदर्शनकारी छात्रों पर पुलिस कार्रवाई का मुद्दा भी उठाया और गृह मंत्री के इस्तीफे की मांग करते हुए नारे लगाए। राज्यसभा में भी इस विषय पर हंगामा हुआ। विपक्ष का यह अधिकार है कि वह जनहित से जुड़े प्रश्न उठाए, लेकिन यदि हर मुद्दा केवल हंगामे तक सीमित रह जाए तो समाधान की संभावनाएं कमजोर पड़ जाती हैं। संसद का उद्देश्य केवल विरोध दर्ज कराना नहीं, बल्कि समाधान तलाशना भी है।
आज की राजनीति में एक नई प्रवृत्ति स्पष्ट दिखाई देती है—कैमरे संसद से बड़े हो गए हैं। कई बार ऐसा लगता है कि राजनीतिक संदेश पहले सोशल मीडिया के लिए तैयार किया जाता है और बाद में संसद उसके लिए मंच बनती है। जो दृश्य अधिक वायरल हो जाए, वही सफल राजनीति मान लिया जाता है। इससे गंभीर तर्क, दस्तावेज, संसदीय बहस और विधायी प्रक्रिया धीरे-धीरे हाशिये पर चली जाती है। लोकसभा सचिवालय का हालिया रुख इसीलिए महत्वपूर्ण है। यदि संसद परिसर में नाटकीय मंचन, वेश बदलकर प्रदर्शन और नियमों का उल्लंघन सामान्य बात बन जाए तो भविष्य में संसदीय अनुशासन बनाए रखना कठिन होगा। नियमों का पालन सभी दलों पर समान रूप से लागू होना चाहिए। लोकतंत्र में समानता का अर्थ यही है कि सत्ता और विपक्ष दोनों एक ही कसौटी पर परखे जाएं।
इतिहास गवाह है कि संसद की सबसे प्रभावशाली आवाजें वे थीं जिन्होंने तथ्यों, तर्कों और प्रभावशाली भाषणों के माध्यम से सरकारों को कठघरे में खड़ा किया। संसदीय परंपरा की ताकत अभिनय में नहीं, बल्कि विचार में रही है। विपक्ष यदि मजबूत वैकल्पिक राजनीति प्रस्तुत करना चाहता है तो उसे भी संसद के भीतर अपनी वैचारिक और नीतिगत तैयारी को प्राथमिकता देनी होगी। उसी प्रकार सरकार को भी आलोचना को लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा मानते हुए संवाद का दायरा बढ़ाना होगा। लोकतंत्र में विरोध आवश्यक है, लेकिन विरोध की भी एक मर्यादा होती है। उसी प्रकार सत्ता का अधिकार भी जवाबदेही से बंधा होता है। संसद की प्रतिष्ठा तब बढ़ती है जब वहां मतभेद होते हुए भी संस्थागत मर्यादा कायम रहती है। यदि संसद परिसर लगातार प्रतीकों, मंचनों और राजनीतिक दृश्यों का केंद्र बनता गया तो सबसे बड़ा नुकसान किसी एक दल का नहीं, बल्कि लोकतंत्र की उस संस्कृति का होगा, जिसकी नींव संवाद, संयम और संवैधानिक मर्यादा पर टिकी है।
देश की जनता संसद से अभिनय नहीं, उत्तर चाहती है; नारे नहीं, नीति चाहती है; टकराव नहीं, समाधान चाहती है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति कैमरे की चमक में नहीं, बल्कि उस विश्वास में है कि संसद देश के हर नागरिक की आवाज सुनने और उसके भविष्य का रास्ता तय करने का सर्वोच्च मंच है। उस विश्वास को बनाए रखना सत्ता और विपक्ष—दोनों की समान जिम्मेदारी है।



