स्कूल ठीक करो सरकार, बनने वाला है नागरिक पुकार

स्कूल ठीक करो सरकार, नागरिकों की यह पुकार लोकतंत्र की मजबूती का संकेत है। अब जनता जाग चुकी है और वह सरकारों की प्राथमिकताएं तय कर रही है। जो सरकार स्कूलों को ठीक करेगी, जो बच्चों के भविष्य को संवारेगी, वही जनता के दिलों पर राज करेगी। चुनावी वादों के जाल से निकलकर अब ज़मीनी काम करने का वक्त आ गया है।

शिक्षा किसी भी राष्ट्र की आत्मा होती है। यदि किसी देश का भविष्य देखना हो, तो वहाँ के स्कूलों और कक्षाओं की स्थिति को देखना चाहिए। आज भारत का जागरूक नागरिक जाग चुका है। वह केवल मुफ्त के वादों या नारों से संतुष्ट होने वाला नहीं है। आज आम जनता, माता-पिता और युवा वर्ग मिलकर एक ही सुर में आवाज़ उठा रहे हैं—”स्कूल ठीक करो सरकार, बनने वाला है नागरिक पुकार।” यह केवल एक नारा नहीं है, बल्कि देश के नीति-निर्माताओं के लिए एक गंभीर चेतावनी और चेतावनी है।

गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पांय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो मिलाय॥

जब गुरु और शिक्षा का स्थान ईश्वर से भी ऊपर है, तो उस शिक्षा को देने वाले स्थान यानी ‘स्कूल’ की हालत दयनीय कैसे हो सकती है? स्कूलों को ठीक किए बिना एक सुदृढ़ और समृद्ध समाज की कल्पना करना असंभव है।

आज हमारे देश में शिक्षा व्यवस्था दो भागों में बँट चुकी है—एक अमीरों के लिए महंगे प्राइवेट स्कूल और दूसरी गरीबों के लिए बुनियादी सुविधाओं से जूझते सरकारी स्कूल। ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों के अधिकांश सरकारी स्कूलों की स्थिति चिंताजनक है। कई स्कूलों की छतें टपकती हैं, दीवारों में दरारें हैं और बैठने के लिए बेंच तक नहीं हैं। छात्राओं के लिए अलग और साफ शौचालय न होना एक कड़वी सच्चाई है, जिसके कारण कई लड़कियाँ पढ़ाई बीच में ही छोड़ देती हैं। पीने के साफ पानी की किल्लत हर दूसरे स्कूल की कहानी है। हज़ारों पद खाली पड़े हैं। जहाँ शिक्षक हैं, वहाँ एक ही शिक्षक पर कई कक्षाओं को संभालने की ज़िम्मेदारी है। संत कबीरदास जी का यह दोहा जो दर्शाता है कि बिना सही साधन और सही मार्गदर्शन के ज्ञान का प्रसार नहीं हो सकता।

जाका गुरु भी अंधला, चेला खरा निरंध।
अंधा अंधे ठेलिया, दून्यू कूप पड़ंत॥

यदि हमारी शिक्षा व्यवस्था ही संसाधनों के अभाव में ‘अंधी’ रहेगी, तो वह आने वाली पीढ़ी को उजाला कैसे दिखाएगी? सरकार को इस व्यवस्था को तुरंत दुरुस्त करना होगा।

अब समय बदल चुका है। नागरिक अब जाति, धर्म और मुफ्त के उपहारों के आधार पर वोट देने की बजाय बुनियादी अधिकारों पर सवाल पूछ रहे हैं। “नागरिक पुकार” का सीधा अर्थ है कि जनता अपनी प्राथमिकताओं को बदल रही है। नागरिकों की सरकार से कुछ स्पष्ट माँगें हैं। हर सरकारी स्कूल की इमारत सुरक्षित और आधुनिक होनी चाहिए। कक्षाओं में ब्लैकबोर्ड की जगह स्मार्ट क्लास और कंप्यूटर लैब होनी चाहिए ताकि गरीब का बच्चा भी डिजिटल युग में पीछे न छूटे। केवल स्कूल की इमारत खड़ी कर देना काफी नहीं है। योग्य शिक्षकों की भर्ती पारदर्शी तरीके से होनी चाहिए। शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों (जैसे चुनाव ड्यूटी, जनगणना) से मुक्त रखकर केवल शिक्षण पर ध्यान केंद्रित करने देना चाहिए। आज की शिक्षा केवल किताबी कीड़ा बनाने वाली नहीं होनी चाहिए। स्कूलों में शुरुआत से ही व्यावसायिक शिक्षा और कोडिंग, आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस जैसे आधुनिक विषयों को शामिल किया जाना चाहिए।

रहीम दास जी ने सही कहा है कि बिना योग्यता और सही हुनर के व्यक्ति का कोई मूल्य नहीं होता।

विद्या धन उद्यम बिना, कहूं जु पावै कौन।
बिना डुलाए ना मिलै, ज्यों पंखा की पौन॥

बिना मेहनत और सही व्यावहारिक शिक्षा के कोई भी युवा आत्मनिर्भर नहीं बन सकता। सरकार को ऐसी शिक्षा व्यवस्था तैयार करनी होगी जो रोज़गार की गारंटी दे। सब जानता है कोई भी देश तब तक महाशक्ति नहीं बन सकता, जब तक उसकी आधी आबादी बुनियादी शिक्षा से वंचित या अधूरी शिक्षा के सहारे जी रही हो। जब एक गरीब का बच्चा पढ़-लिखकर डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक या उद्यमी बनता है, तो वह केवल अपने परिवार को ही गरीबी से नहीं निकालता, बल्कि पूरे देश की जीडीपी और प्रतिष्ठा को बढ़ाता है। यदि हम शिक्षा पर निवेश नहीं करेंगे, तो हमारी ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ (युवा आबादी) देश के लिए ताकत बनने के बजाय एक बोझ बन जाएगी। बेरोज़गारी और अकुशलता समाज में अपराध और असंतोष को जन्म देती है।

महाकवि तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में ज्ञान और विद्या के प्रकाश के बारे में लिखा है।

हिय की फूटि नयन की जाही।
जिन्ह कें निरखत राम पद नाही॥
(अर्थात: विद्या और ज्ञान से आंतरिक आँखें खुलती हैं, जिससे अज्ञानता का नाश होता है।)

जब तक सरकारें शिक्षा के इस उजाले को हर गरीब के घर तक नहीं पहुँचाएंगी, तब तक देश से गरीबी और असमानता का अंधकार नहीं मिट सकता। “स्कूल ठीक करो सरकार” केवल एक आलोचना नहीं है, यह सुधार का एक आमंत्रण है। सरकारों को निम्नलिखित कदम युद्ध स्तर पर उठाने होंगे। शिक्षा पर जीडीपी का कम से कम ६% हिस्सा खर्च किया जाना चाहिए, जो वर्तमान में बहुत कम है। स्कूल प्रिंसिपलों और स्थानीय प्रशासन की जवाबदेही तय हो। हर स्कूल की रैंकिंग और सोशल ऑडिट होना चाहिए जहाँ सरकारें अक्षम हैं, वहाँ कॉर्पोरेट जगत के सीएसआर (CSR) फंड की मदद से स्कूलों को गोद लिया जाना चाहिए और उनका आधुनिकीकरण होना चाहिए। ऐसी व्यवस्था हो जहाँ एक आईएएस (IAS) अधिकारी का बच्चा और एक दिहाड़ी मजदूर का बच्चा एक ही डेस्क पर बैठकर पढ़ सकें। तभी वास्तविक समानता आएगी।

नागरिकों की यह पुकार लोकतंत्र की मजबूती का संकेत है। अब जनता जाग चुकी है और वह सरकारों की प्राथमिकताएं तय कर रही है। जो सरकार स्कूलों को ठीक करेगी, जो बच्चों के भविष्य को संवारेगी, वही जनता के दिलों पर राज करेगी। चुनावी वादों के जाल से निकलकर अब ज़मीनी काम करने का वक्त आ गया है। आने वाला चुनाव और आने वाला समय केवल उसी सरकार का होगा जो शिक्षा को अपनी पहली प्राथमिकता बनाएगी। कबीरदास जी के शब्दों में कहें तो।

कल करे सो आज कर, आज करे सो अब।
पल में परलय होएगी, बहुरी करेगा कब॥

सरकार को अब और देर नहीं करनी चाहिए। नागरिकों की पुकार साफ है—”स्कूल ठीक करो सरकार, तभी बनेगी तुम्हारी सरकार।” देश के बच्चों का भविष्य संवारना ही सच्ची राष्ट्रसेवा है।

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