न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण केवल संविधान के अनुच्छेद 21, 48(क) और 51(क)(g) के अंतर्गत अनिवार्य कर्तव्य ही नहीं, बल्कि साझा नैतिक जिम्मेदारी भी है। उन्होंने बताया कि NGT की भूमिका केवल विवादों के निपटारे तक सीमित नहीं है; यह जागरूकता पैदा करने और संस्थानों को सतत पर्यावरणीय प्रथाओं की ओर मार्गदर्शन देने का भी प्रयास करता है।

राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT), दक्षिणी क्षेत्र पीठ, चेन्नई ने दक्षिणी राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों और समितियों के सहयोग से आयोजित किया, 6 दिसम्बर 2025 को चेन्नई के कलाैइवनार अरंगम में संपन्न हुआ। यह कार्यक्रम NGT के अध्यक्ष माननीय न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव के नेतृत्व में तथा NGT दक्षिणी क्षेत्र पीठ की न्यायिक सदस्य माननीय न्यायमूर्ति पुष्पा सत्यनारायण के मार्गदर्शन में आयोजित हुआ। सम्मेलन का औपचारिक उद्घाटन माननीय न्यायमूर्ति एम. एम. सुन्दरेश, न्यायाधीश, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा किया गया। उद्घाटन सत्र की शुरुआत न्यायमूर्ति पुष्पा सत्यनारायण द्वारा अतिथियों और प्रतिभागियों के स्वागत से हुई। अपने संबोधन में न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण केवल संविधान के अनुच्छेद 21, 48(क) और 51(क)(g) के अंतर्गत अनिवार्य कर्तव्य ही नहीं, बल्कि साझा नैतिक जिम्मेदारी भी है। उन्होंने बताया कि NGT की भूमिका केवल विवादों के निपटारे तक सीमित नहीं है; यह जागरूकता पैदा करने और संस्थानों को सतत पर्यावरणीय प्रथाओं की ओर मार्गदर्शन देने का भी प्रयास करता है। मुख्य अतिथि श्री पी. एस. रमण, महाधिवक्ता, तमिलनाडु, ने पर्यावरणीय सुशासन को मजबूत बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने ह्यूबर्ट रीव्स को उद्धृत करते हुए मानव गतिविधियों की असंतुलित प्रवृत्तियों और सतत विकास की अनिवार्यता पर चर्चा की।

तमिलनाडु सरकार के मंत्री माननीय थंगम थेनारासु ने राज्य की साक्ष्य-आधारित पर्यावरणीय यात्रा, उसकी विशिष्ट भौगोलिक पहचान, सांस्कृतिक धरोहर और पर्यावरण संरक्षण की पारंपरिक जड़ों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि तमिलनाडु में पर्यावरण संरक्षण सामाजिक परंपराओं और विकास नीतियों में गहराई से निहित है। माननीय न्यायमूर्ति मनीन्द्र मोहन श्रीवास्तव, मुख्य न्यायाधीश, मद्रास उच्च न्यायालय, ने एक WWF रिपोर्ट का हवाला देते हुए वैश्विक वन्यजीव आबादी में लगभग 69% की गिरावट पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि केवल न्यायिक उपचार पर निर्भर रहने के बजाय, मानवता को स्वयं को ‘संकटग्रस्त प्रजाति’ बनने से बचाने के लिए रोकथामात्मक उपाय आवश्यक हैं। विशिष्ट अतिथि माननीय न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, न्यायाधीश, सर्वोच्च न्यायालय, ने “कानून कागज़ पर और जीवन ज़मीन पर” के बीच अंतर की चर्चा की और दक्षिणी राज्यों के बीच “सहकारी पर्यावरणीय संघवाद” (Cooperative Ecological Federalism) तथा “साउदर्न एनवायरनमेंटल कॉम्पैक्ट” जैसे विचार प्रस्तुत किए। माननीय न्यायमूर्ति एम.एम. सुन्दरेश ने पारंपरिक ज्ञान एवं अनुभवों का महत्व बताते हुए डाईंग उद्योग से प्रभावित समुदायों के उदाहरण साझा किए और कहा कि “जब पर्यावरण प्रभावित होता है, तो पूरा विश्व प्रभावित होता है।” उन्होंने तटीय क्षेत्रों की रक्षा की तत्काल आवश्यकता पर भी बल दिया।
तकनीकी सत्र-
पहला सत्र: पर्यावरणीय कानून प्रवर्तन एवं जैव विविधता संरक्षण
अध्यक्षता: माननीय न्यायमूर्ति ए. मुहम्मद मुस्तफा, न्यायाधीश, केरल उच्च न्यायालय
न्यायमूर्ति मुस्तफा ने पूछा कि क्या वर्तमान कानून ई-कचरा प्रदूषण जैसी समस्याओं को पर्याप्त रूप से संबोधित करते हैं। उन्होंने कहा कि “जो कुछ वैध है वह अनिवार्य रूप से हानिरहित नहीं होता,” यह इंगित करते हुए कि कानूनी गतिविधियाँ भी पर्यावरण को हानि पहुँच सकती हैं। डॉ. आर. नागेंद्रन, पूर्व विशेषज्ञ सदस्य, NGT, ने जैव विविधता-विशिष्ट EIA की आवश्यकता और एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय पर बल दिया। श्री रघुराम ने जैव विविधता अधिनियम, 2002 के कार्यान्वयन तथा स्थानीय समुदायों के लिए लाभ-साझाकरण बढ़ाने हेतु NBA की पहलों पर प्रकाश डाला। डॉ. इंदुमाठी एम. नम्बी, IIT मद्रास, ने एनोर और कांचीपुरम तेल रिसाव मामलों के अपने अनुभव साझा किए तथा विशेषज्ञ समिति रिपोर्टों को बार-बार पुनर्विचार के लिए लौटाने से उत्पन्न चुनौतियों का उल्लेख किया।
दूसरा सत्र: ठोस कचरा एवं जैव-चिकित्सा कचरा प्रबंधन
अध्यक्षता: माननीय न्यायमूर्ति डी. भारत चक्रवर्ती, न्यायाधीश, मद्रास उच्च न्यायालय
न्यायमूर्ति चक्रवर्ती ने न्यायमूर्ति सूरज गोविंदराज के एक निर्णय (WP 27475/2025) का उल्लेख किया, जिसमें निगरानी प्रणालियाँ, प्रदर्शन स्कोरकार्ड, GIS आधारित मार्ग-मानचित्रण और रोबोटिक कचरा पृथक्करण जैसी तकनीकों को अपनाने का सुझाव दिया गया था। उन्होंने कहा कि शहरों को “रीसायकल एंड रिकम्पोज़” मॉडल में बदलना होगा। उन्होंने कोयंबटूर की एक अध्ययन रिपोर्ट का उल्लेख किया जिसमें मानव प्लेसेंटा में माइक्रोप्लास्टिक पाए गए। माननीय डॉ. न्यायमूर्ति पी. ज्योथिमणि ने पूछा कि क्या भारत में विधि आधारित कचरा प्रबंधन लक्ष्यों को वास्तव में हासिल किया गया है। उनका कहना था कि जनता की नीयत के अभाव और नियमों के कमजोर प्रवर्तन के कारण प्रगति धीमी है। उन्होंने यह भी जोर दिया कि समाधान केवल कानून से नहीं, बल्कि नागरिकों की भागीदारी और जिम्मेदारी से आएंगे। डॉ. डी. कार्तिकेयन, IAS, प्रमुख सचिव, नगर प्रशासन एवं जल आपूर्ति विभाग, तमिलनाडु, ने राज्य में ठोस और जैव-चिकित्सा कचरा प्रबंधन की जटिलताओं पर चर्चा की तथा ड्राफ्ट Solid Waste Management Rules, 2024 के अंतर्गत तकनीकी सुधारों का उल्लेख किया। श्री अरुण कृष्णमूर्ति, संस्थापक, EFI, ने बताया कि नगर निगमों के स्तर पर कचरा प्रबंधन तो सुधर रहा है, लेकिन नगरपालिका और पंचायत क्षेत्रों में उपेक्षा बनी हुई है। सितालपक्कम झील के उदाहरण से उन्होंने बताया कि साफ-सफाई के बावजूद अनियंत्रित कचरा डंपिंग से हालात फिर बिगड़ जाते हैं। उन्होंने अरसंकडाली झील की स्थिति और क्षतिग्रस्त बाड़ के कारण उसके डंपिंग साइट बन जाने का भी उल्लेख किया।
समापन
सम्मेलन के पहले दिन का समापन इस सामूहिक संकल्प के साथ हुआ कि पर्यावरणीय सुशासन को मजबूत किया जाएगा, नियामक समन्वय बढ़ाया जाएगा, और सतत विकास की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएंगे। सभी हितधारकों ने भविष्य की पीढ़ियों के लिए पर्यावरण संरक्षण की साझा जिम्मेदारी को दोहराया।
