राजा दानी सेवक कैसा हो?

सकल मुनिन्ह के आश्रमन्हि जाइ जाइ सुख दीन्ह:
यानी राजा केवल महल में बैठेगा और प्रोटोकॉल में रहेगा तो कहीं से भी अपने राज्य शासन सत्ता व्यवस्था को ना वह समझ पाएगा और ना उसके अनुकूल वह व्यवस्था दे पाएगा। इसीलिए राजा को प्रवास और वह भी नितांत,एकांकी जैसा होना चाहिए क्योंकि राम जी का जीवन भीड़ के साथ नहीं राम,लखन, जानकी के साथ समाज निर्माण में लगा! यही तो कारण है कि भगवान राम आज भी प्रासंगिक है।

ऊपर लिखे प्रश्न का उत्तर अगर हम देंगे तो इसका आधार भगवान राम और कृष्णा को लेकर चलते हैं जैसे ही भगवान राम और कृष्ण का नाम आता है तो तुलसीदास कृत रामचरितमानस की यह चौपाई राजा के संदर्भ में बहुत सुंदर बैठी है ऐसा ध्यान आता है

सकल मुनिन्ह के आश्रमन्हि जाइ जाइ सुख दीन्ह:
यानी राजा केवल महल में बैठेगा और प्रोटोकॉल में रहेगा तो कहीं से भी अपने राज्य शासन सत्ता व्यवस्था को ना वह समझ पाएगा और ना उसके अनुकूल वह व्यवस्था दे पाएगा। इसीलिए राजा को प्रवास और वह भी नितांत,एकांकी जैसा होना चाहिए क्योंकि राम जी का जीवन भीड़ के साथ नहीं राम,लखन, जानकी के साथ समाज निर्माण में लगा! यही तो कारण है कि भगवान राम आज भी प्रासंगिक है। कुछ लोग कहेंगे कि भगवान राम केवल विजेता रहे इसलिए प्रासंगिक हैं नहीं तो बाली और रावण भी प्रासंगिक होते तो उन्हें ध्यान रखना चाहिए की राम जी के जीवन में अपने पुत्रों के हाथों पूरे परिवार को भी विवश होते देखा है? लेकिन अगर सही से विवेचना करने वाले करते तो राजा के रूप में पुत्र निर्माण कैसे किया जाता है यह ध्यान में आता है और वहां भी आपको मिलगा की राम जी ने सभी गुरुओं से आशीर्वाद लिया था वाल्मीकि जी से उनका ज्ञान प्राप्ति,शक्ति प्राप्ति छूट गया था तो उनके पुत्र वाल्मीकि ऋषि के आश्रम में ज्ञान, बुद्धि,बल सभी विद्द्यानुकूल ज्ञान प्राप्त किया! इसलिए एक राजा के रूप में परिवार का निर्माण करना हो तो वहां परिवार के साथ अपने बच्चों के साथ क्या व्यवहार करना चाहिए वह भी प्रभु श्रीराम से आपको ध्यान में आएगा।
लेकिन होता क्या है कि व्यक्ति सोचता ही नहीं है? थोड़ा सा अमीर हुआ नहीं तो अपने आसपास भीण जुटाने लगता है?अपने घर पर दरबार लगने लगता है? और यहीं पर वह गलत समाज का निर्माण प्रारम्भ करता है! इसीलिए तो कहा गया है की दान भी योग्य को करना चाहिए अयोग्य को नहीं!

सुक्षेत्रे वापयेद्बीजं सुपात्रे निक्षिपेत् धनम् ।
सुक्षेत्रे च सुपात्रे च ह्युप्तं दत्तं न नश्यति ॥
( अच्छे खेत में बीज बोना चाहिए और सुपात्र,योग्य व्यक्ति को धन देना चाहिए। अच्छे खेत में बोया गया बीज और सुपात्र को दिया गया धन कभी नष्ट नहीं होता) आज दान भी चापलूसी, चाटुकारिता और दरबार लगाने वाले को किया जा रहा है! जिससे समाज निर्माण नहीं हो रहा है! अपितु समाज का पतन हो रहा है। आज हर कोई के पास धन होते हुए भी उससे अगर पूछिए कहता है महाराज जी बड़े परेशान है?क्योंकि! जो निर्माण की प्रक्रिया है वह गलत तरीके से हो रही है। और जब समाज में राजा और दान देने की प्रक्रियाओं में इतनी त्रुटि है तो सेवक कहां से अच्छा होगा और जब सेवक ही नहीं होगा तो फिर समाज में किसी भी संबंध में निश्चिंत्यता,समर्पण, त्याग की भावना कहां से आएगी बात बहुत सीधी है या तो राजा से सुधार हो या सेवक से सुधार हो अगर समाज में एक स्वस्थ समाज हम चाहते हैं!बाकी जो जैसे चल रहा है वह चलता रहेगा ना उसको मैं बदल सकता हूं ना आप?जब तक कि हमारे अंतःकरण में परिवर्तन की आग न प्रचलित हो!

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