डॉलर युद्ध, भारत को कमजोर करने की साज़िश और सत्ता की खामोशी:-रितेश सिन्हा

यह सिर्फ मुद्रा संकट नहीं है। यह भारत के खिलाफ एक सुनियोजित आर्थिक हमला है। अमेरिकी डॉलर ने भारतीय अर्थव्यवस्था को जकड़ लिया है और रुपया 92 रुपये प्रति डॉलर के पार फिसल चुका है। यह गिरावट नहीं, गिरफ़्त है। आयात महँगा हो गया है, विदेशी पूँजी पलायन कर चुकी है और महँगाई आम आदमी की कमर तोड़ रही है। सवाल यह नहीं कि हालात क्यों बिगड़े—सवाल यह है कि किसकी वजह से बिगड़े और सरकार क्या कर रही है?

ट्रंप प्रशासन ने भारत पर पचास प्रतिशत आयात शुल्क लगाकर साफ़ कर दिया है कि दोस्ती अब काम की नहीं रही। अमेरिका ने डॉलर को हथियार बना लिया है और भारत को निशाने पर रखा है। नतीजा सामने है—विदेशी निवेशक देश छोड़कर भाग चुके हैं। करीब 23 अरब डॉलर की पूँजी बाहर निकल चुकी है।

शेयर बाज़ार लड़खड़ा रहा है।

शेयर बाज़ार लड़खड़ा रहा है। उद्योग दबाव में हैं और रोज़गार पर सीधा हमला हुआ है। आम आदमी इसकी कीमत चुका रहा है। पेट्रोल-डीज़ल महँगा है। रसोई गैस, दवाइयाँ, मोबाइल, लैपटॉप—सब कुछ पहुँच से बाहर होता जा रहा है। विदेश में पढ़ाई अब मध्यम वर्ग के लिए सपना भी नहीं रही। सरकार विकास के आँकड़े दिखा रही है, लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि जेब खाली है और भरोसा टूट चुका है।

डॉलर लगातार मज़बूत और विदेश व्यापार नीति कमज़ोर

भारतीय रिज़र्व बैंक बाज़ार को संभालने की कोशिश कर रहा है, लेकिन सच्चाई यह है कि जब डॉलर लगातार मज़बूत होता जाए और सरकार की विदेश व्यापार नीति कमज़ोर हो, तो रिज़र्व बैंक भी अकेला पड़ जाता है। पूर्व रिज़र्व बैंक गवर्नर रघुराम राजन पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि यह स्थिति उपभोक्ता और निवेशक—दोनों के भरोसे को तोड़ती है। लेकिन चेतावनियाँ सुनने की बजाय सत्ता में बैठे लोग जश्न मनाने में व्यस्त हैं। अमेरिका का पचास प्रतिशत आयात शुल्क भारत के लिए सीधी चोट है। इस्पात, कपड़ा और दवा उद्योग बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। निर्यात घटा है, कारखाने दबाव में हैं और नई नौकरियों की उम्मीदें धुंधली पड़ती जा रही हैं। ऊपर से तेल और गैस जैसी ज़रूरी चीज़ें डॉलर में खरीदने की मजबूरी—यही वह जाल है जिसमें भारत फँसा हुआ है। इसे व्यापार नीति नहीं कहा जा सकता, यह आर्थिक गुलामी है।

सेंसेक्स गिर रहा है, निवेशक घबराए हुए हैं

शेयर बाज़ार का हाल देख लीजिए। सेंसेक्स गिर रहा है, निवेशक घबराए हुए हैं। यूरोप के साथ समझौते की सकारात्मक खबर भी बाज़ार को संभाल नहीं पाई। सरकार सात प्रतिशत विकास का ढोल पीट रही है, लेकिन महँगाई छह प्रतिशत के पार जा चुकी है। विकास अगर काग़ज़ पर हो और ज़िंदगी में न दिखे, तो उसे छलावा ही कहा जाएगा। सवाल यह है—क्या भारत के पास कोई और रास्ता है? यूरोपीय संघ भारत के लिए एक बड़ा अवसर हो सकता है। भारत और यूरोप के बीच व्यापार 120 अरब यूरो तक पहुँच चुका है। मुक्त व्यापार समझौते पर बातचीत अंतिम चरण में है। अगर यह समझौता लागू होता है, तो वाहन, दवा, सूचना प्रौद्योगिकी और कृषि क्षेत्रों में भारत को बड़ा लाभ मिल सकता है। निर्यात बढ़ेगा, रोज़गार पैदा होंगे और अमेरिका पर निर्भरता कम होगी। यह तभी संभव है जब सरकार अपने उद्योगों के हित में सख़्त रुख अपनाए, न कि सिर्फ कूटनीतिक भाषण दे।

ब्रिक्स भारत के लिए इससे भी बड़ा मंच है। 2026 से भारत इसकी अध्यक्षता कर रहा है। यह समूह दुनिया की लगभग आधी आबादी और एक-तिहाई से ज़्यादा वैश्विक उत्पादन का प्रतिनिधित्व करता है। भारत पहले ही रूस से तेल रुपये में खरीद रहा है। स्थानीय मुद्रा में व्यापार बढ़ रहा है। ब्रिक्स देश साझा भुगतान प्रणाली और डिजिटल मुद्रा की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, ताकि डॉलर की पकड़ ढीली की जा सके।
यह वही मौका है जहाँ भारत नेतृत्व दिखा सकता है। लेकिन खतरा भी उतना ही बड़ा है—चीन का दबदबा। अगर भारत बिना रणनीति के आगे बढ़ा, तो वह डॉलर की गुलामी से निकलकर युआन की परछाईं में जा सकता है। इसलिए ब्रिक्स में भारत को सिर्फ सदस्य नहीं, नेता बनना होगा।

सच्चाई कड़वी है, लेकिन साफ़ है—अमेरिका अब भरोसेमंद साझेदार नहीं रहा। डॉलर आधारित व्यवस्था विकासशील देशों को दबाने का औज़ार बन चुकी है। अगर भारत को सच में मज़बूत बनना है, तो उसे अपनी व्यापार नीति, मुद्रा नीति और कूटनीति—तीनों में साहस दिखाना होगा। यह वक्त आधे फैसलों का नहीं है। यह वक्त है साफ़ कहने का—भारत किसी का पिछलग्गू नहीं बनेगा। या तो हम डॉलर की बेड़ियों में जकड़े रहेंगे, या फिर यूरोप और ब्रिक्स के साथ खड़े होकर अपनी शर्तों पर दुनिया से व्यापार करेंगे। अगर अब भी सरकार ने निर्णायक कदम नहीं उठाए, तो इतिहास माफ़ नहीं करेगा। तब ‘अमृत काल’ एक सपना नहीं, एक धोखा कहलाएगा। यह संकट चेतावनी है, चेतावनियाँ वही देश अनदेखी करता है जो बाद में पछताता है।

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