ईयू–भारत मुक्त व्यापार समझौता, लाभ के दावे और छिपे जोखिम:-रितेश सिन्हा

भारत और यूरोपीय संघ के बीच 27 जनवरी 2026 को घोषित मुक्त व्यापार समझौते को सरकार एक ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत कर रही है। 16 वर्षों की लंबी बातचीत के बाद यह समझौता ऐसे समय सामने आया है, जब वैश्विक व्यापार व्यवस्था अनिश्चितता और संरक्षणवाद के दौर से गुजर रही है। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या यह समझौता वास्तव में भारत के दीर्घकालिक आर्थिक हितों को मज़बूत करेगा या फिर तात्कालिक लाभ के नाम पर भविष्य के लिए जोखिम खड़े करेगा।

सरकार का दावा है कि इस समझौते से वस्त्र, चमड़ा, आभूषण, समुद्री उत्पाद और औषधि जैसे क्षेत्रों को यूरोपीय बाजार में लगभग पूर्ण शुल्क-मुक्त पहुंच मिलेगी। द्विपक्षीय व्यापार के दोगुना होने की संभावना जताई जा रही है, जिससे गुजरात, महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे औद्योगिक राज्यों को लाभ हो सकता है। परंतु यह आशावाद उस समय कमजोर पड़ जाता है, जब यूरोपीय संघ के गैर-शुल्क अवरोधों पर ध्यान दिया जाए।

कार्बन सीमा समायोजन तंत्र जैसे प्रावधान भारतीय निर्यातकों, विशेषकर लघु एवं मध्यम उद्योगों, के लिए गंभीर चुनौती बन सकते हैं। कार्बन लेखांकन, पर्यावरण प्रमाणन और जटिल अनुपालन प्रक्रियाएं बड़ी कंपनियों के लिए तो प्रबंधनीय हैं, लेकिन सीमित संसाधनों वाले छोटे उद्योगों के लिए ये निर्यात के रास्ते में नई दीवार खड़ी कर सकती हैं। ऐसे में शुल्क-मुक्त पहुंच का लाभ व्यवहार में सीमित रह जाने की आशंका है।

आयात उदारीकरण का प्रभाव अधिक प्रत्यक्ष और तत्काल दिखाई देगा। मोटर वाहनों पर शुल्क में भारी कटौती और शराब पर करों में कमी से यूरोपीय कंपनियों को भारतीय बाजार में बढ़त मिलेगी। इससे स्वदेशी वाहन निर्माता और उनसे जुड़े कलपुर्जा उद्योग पर दबाव बढ़ेगा। मशीनरी, रसायन और औषधि क्षेत्रों में सस्ते यूरोपीय आयात से छोटी फैक्ट्रियों के बंद होने और रोजगार घटने का खतरा भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह स्थिति उस समय और चिंताजनक हो जाती है, जब देश की अर्थव्यवस्था में लघु एवं मध्यम उद्योगों की भूमिका को ध्यान में रखा जाए।

कृषि क्षेत्र को लेकर सरकार यह तर्क देती है कि बासमती चावल, चाय और मसालों को भौगोलिक संकेतक का संरक्षण मिला है तथा डेयरी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को सुरक्षा दी गई है। फिर भी, यूरोपीय कृषि उत्पादों पर औसत शुल्क में कटौती से आयात बढ़ना तय है। यूरोपीय संघ की भारी कृषि सब्सिडी के सामने भारतीय किसान किस हद तक प्रतिस्पर्धा कर पाएंगे, यह अब भी स्पष्ट नहीं है। यह स्थिति किसानों की आय और खाद्य सुरक्षा दोनों के लिए चुनौती बन सकती है।

सेवाओं और निवेश के क्षेत्र में भी तस्वीर मिश्रित है। सूचना प्रौद्योगिकी और वित्तीय सेवाओं को प्राथमिक पहुंच मिलना सकारात्मक कदम है, लेकिन यूरोपीय संघ के सख्त डेटा संरक्षण नियम भारतीय कंपनियों की लागत बढ़ाएंगे। निवेश संरक्षण से जुड़े प्रावधानों के चलते विदेशी कंपनियों को कानूनी बढ़त मिलने और सरकार की नीति स्वायत्तता सीमित होने की आशंका भी व्यक्त की जा रही है।

पर्यावरण, श्रम अधिकार और महिला सशक्तिकरण जैसे अध्याय सिद्धांततः महत्वपूर्ण हैं, किंतु इनके अनुपालन की आर्थिक कीमत भारत जैसे विकासशील देश के लिए अधिक होगी। इस्पात और एल्युमिनियम जैसे क्षेत्रों पर कार्बन कर का प्रभाव सीधे लघु उद्योगों और रोजगार पर पड़ेगा। इसे वैश्विक व्यापार को नए रूप में नियंत्रित करने के प्रयास के रूप में भी देखा जा सकता है।
कुल मिलाकर, यूरोपीय संघ के साथ यह मुक्त व्यापार समझौता अवसरों के साथ-साथ गंभीर जोखिम भी लेकर आया है।

वैश्विक व्यापार तनाव के दौर में रणनीतिक संतुलन आवश्यक था, लेकिन बिना पर्याप्त सुरक्षा तंत्र के दी गई रियायतें भविष्य में भारी पड़ सकती हैं। सरकार को चाहिए कि वह लघु उद्योगों, किसानों और संवेदनशील क्षेत्रों के लिए ठोस संरक्षण उपाय, चरणबद्ध क्रियान्वयन और प्रभावी निगरानी व्यवस्था सुनिश्चित करे।

मुक्त व्यापार न तो अपने आप में वरदान है और न अभिशाप। उसका परिणाम इस बात पर निर्भर करता है कि देश अपने हितों की रक्षा कितनी दूरदर्शिता से करता है। यह समझौता भारत के लिए समृद्धि का मार्ग बनेगा या आर्थिक संप्रभुता पर प्रश्नचिह्न लगाएगा—इसका निर्णय समय करेगा। फिलहाल, उत्साह से अधिक विवेक और सतर्कता की आवश्यकता है।

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