आज देश मे हर जगह केवल समानता और आरक्षण की बाते की जा रही है उस समानता की जो पिछले 68 सालों मे भी नही आई

लेकिन हर दिन समाज का कोई न कोई वर्ग उसके लिए मांगे करता रहा है और उसे सरकार देती भी रही है। लेकिन आज भी समानता नही है, आखिर क्यों ये बड़ी चुनौती है व्यक्ति, समाज और सरकार के लिए!
समानता लाने और असमानता को मिटाने के लिए आरक्षण को सीढ़ी बनाया जाता रहा है। ये कितना सही है आप बखुबी समझ सकते है। मेरी समझ मे समानता की पहली सीढ़ी शिक्षा मात्र है जो की समाज के हर व्यक्ति को शिक्षित कर ही लाई जा सकती है और जिसक लिए एक इमानदार पहल की जरूरत है। आज जँहा देश की आधी से ज्यादा आबादी गाँवो मे रहती है और वहां की ज्यादातर आबादी शिक्षा के लिए सरकारी स्कूल पे निर्भर है,या शायद उन सबो की मज़बूरी है सरकारी स्कूलों में अपने बच्चे पढाने की। क्योंकि हम सभी से न तो सरकारी स्कूलो की हालात छुपी है और न समाज मे दीमक की तरह हर दिन बढ़ने वाली असमानता। यही नही अगर हम आल इंडिया स्कूल एजुकेशन सर्वे 2009 पर नजर डाले तो हमे सरकारी स्कूल की सच्चाई साफ साफ नजर आती है, इन आँकड़ो मे जहाँ, मान्यता प्राप्त स्कूलों मे 84 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों मे है, और केवल 16 प्रतिशत शहरी क्षेत्रों मे वही ग्रामीण क्षेत्रों के 84 प्रतिशत स्कूलों मंे ज्यादातर लगभग 66 प्रतिशत सरकारी स्कूल है, जहाँ लगभग 64 प्रतिशत प्राथमिक विद्यालयो में बिजली कनेक्शन भी नही है,12 प्रतिशत प्राथमिक विद्यालयो मे तो फुल टाइम टीचर भी नही है।बात यही खत्म नहीं होती 11,000 प्राथमिक विद्यालय तो बिना भवन के ही चलाये जा रहे हैं, मतलब या तो टेंट मे या खुली आसमानो के नीचे। मतलब साफ है अगर ग्रामीण क्षेत्रों मे चलने वाली 66 प्रतिशत स्कूल सरकारी और वहाँ की व्यवस्था ऐसी जहां व्यक्ति न शिक्षित होगा और न हमारा समाज में समानता आएगी। इन्ही अप्रयाप्त सुविधाओ की वजह से बच्चे वहाँ जाते तो बड़ी संख्या मे है पर ठहराव बहुत कम होता है और फिर आम लोग प्राइवेट स्कूल पे निर्भर होने को मजबूर हो जाते हैय जंहा गरीबो के लिए कोई जगह नही है और यही से शुरू होती है असली असमानता।
पिछले साल ही बिहार की शिक्षा व्यवस्था देश मे खूब चर्चा मे रही इसकी वजह थी बिहार स्कूल एग्जामिनेशन बोर्ड में नकल करते तस्वीर परीक्षा केंद्र के ऊची-ऊची भवनों पे चढ़े लोग। केवल ये तस्वीर ही नही कम्पोजिट एजुकेशन डेवलपमेंट इंडेक्स 2007-08 की रिपोर्ट भी बिहार मे शिक्षा की तस्वीर को साफ साफ बयान करती है।जहां बिहार का नंबर 35वें पायदान पे है और हो भी क्यों नही जहाँ लगभग हर गाँव मे सरकारी स्कूल है पर ज्यादातर स्कूल में पर्याप्त टीचर नही बिजली कनेक्शन नही कंप्यूटर लैब नही यहाँ तक जो टीचर इन सरकारी स्कूलों में है उनके शिक्षा को लेकर भी आये दिन वहाँ की मीडिया में चर्चाऐं होती रही है। फिर कैसे कोई राजनेता सामाज के ठेकेदार इन आधी और अपर्याप्त शिक्षा व्यवस्था के बावजूद समानता की बाते कर सकते है ऐसे विपरीत स्थितियो और वातावरण मे अगर कोई सरकारी स्कूल किसी अच्छी और प्रतिष्ठित निजी स्कूल को मात देती हुई नजर आती है तो यकीन करना मुश्किल है।पर हाल ही में एक समाचार पत्रिका में प्रकाशित खबर पे यक़ीन करना मुश्किल था पर पढ़ के ख़ुशी भी हुई।राजस्थान के बांसवाड़ा जिले के वाजवाना गाँव का उच्चमाध्यमिक विद्यालय सचमुच किसी आशचर्य से कम नही है। यह स्कूल न केवल साधन-सुविधाओ के मामले मे बल्कि पढ़ाई मे भी निजी स्कूल को पीछे छोड़ देता है। यहाँ हर क्लास मे सी.सी.टीवी कैमरो के साथ छात्रों की बायोमैट्रिक्स उपस्थिति दर्ज की जाती है। यहाँ आर.ओ का ठंढा पानी, साफ सुथरे टॉयलेट,कंप्यूटर लैब यही नही इस स्कूल का गत साल बोर्ड का परिणाम भी शत प्रतिशत रहा। यह सरकारी स्कूल एक आदर्श है सभी सरकारी स्कूलो के लिए।
यह एक उदाहरण भी प्रस्तुत करता है कि सरकारी संरक्षण में चलने वाले स्कूल निजी स्कूलों को मात दे सकते है। इससे केंद्र और सभी राज्य सरकारों को सबक लेनी चाहिए ताकि समाज के हर व्यक्ति के लिए एक बेहतर शिक्षा व्यवस्था की जा सके और हर लोग शिक्षित हो सके ताकि समाज मे समानता आ सके। और असमानता जैसे शब्दो से देश और समाज को मुक्त किया जा सके। यह सरकारी स्कूल एक उम्मीद है देश में समानता लाने की। यह सरकारी स्कूल एक उम्मीद है, जहां एक साथ हमारे समाज का हर वर्ग चाहे राजनेता हो या उद्योगपति हो या गरीब किसान का बच्चा सभी एक साथ एक अच्छी और आधुनिक शिक्षा प्राप्त कर सके, और समाज और देश में समानता लायी जा सके और आने वाले समय में देश को हरियाणा जैसे विकट परिस्थितिओं से बचाया जा सके. जहां आरक्षण और समानता के नाम पे पूरी हरियाणा को जलाया गया, कई माओं की गोद सुनी की गई यहीं नहीं औरतो के साथ र्दुव्यवहार तक किये गए।सोचिये ऐसा क्यों और जिस समानता के लिए हम अपनों से लड़ रहे है उसे कैसे लाया जा सकता है।
