वेश्यावृति को धर्म का सहारा

भारत की पहचान मुख्यतः इसकी संस्कृति से की जाती है. प्राचीन भारतीय ग्रंथों ने पश्चिमी विचारकों को अत्याधिक आकर्षित किया है. वेंडी डोनिगर ऐसी ही एक अमरीकी महिला विचारक है जो संस्कृत की एक नामवर विद्वान है.

मध्यकालीन भारत की देवदासी संस्कृति से हिन्दू धर्म में पुरुष प्रधान समाज की भोगने की प्रवृत्ति का पता चलता है. प्राचीन काल से भारत में नीची जाति के लोगों को ऊँची जाती द्वारा छूना भी पाप था. ऐसा होने पर ऊँची जाति का व्यक्ति स्वयं को अशुद्ध समझने लगता है और धार्मिक कर्मकांड द्वारा स्वयं का शुद्धिकरण करता है. प्राचीन भारत में शीर्ष पर ब्राह्मण थे. किन्तु यह बडा ही विचित्र है कि जिन लोगों को ब्राह्मण छूना भी पाप समझते थे, उन्ही छोटी जाती के लोगों की कन्याओं के साथ वे सम्भोग करते थे. इसमें उन्हें कोई बुराई नहीं दिखती. दरअसल ब्राह्मणों द्वारा ऐसी अछूत कन्याओं के साथ किये जाने वाले संसर्ग को एक बहुत ही ‘पवित्र’ संस्कृति का रूप दिया गया है. इस संस्कृति को हम देवदासी के रूप में पहचानते हैं.

इस संस्कृति के अनुसार नीची जाति के लोग अपनी कन्याओं को मंदिर के पुजारियों को दान कर देते थे. दान की इस संस्कृति को देवदासी कहा जाता है. दान करने के बदले में पुजारी उस कन्या के परिवार को सहायता के रूप में कुछ मासिक राशि देते रहते थे एक बार किसी कन्या के देवदासी बनने पर पुजारी का उस कन्या पर पूरा अधिकार होता है और फिर वह उससे जब मन चाहे शारीरिक सुख प्राप्त करता. कन्याओं के दान की यह सम्पूर्ण परिक्रिया दक्षिण भारत के वेल्लम्मा के मंदिर में सम्पन्न की जाती है. आरम्भ में इस प्रथा का वेश्यावृत्ति से कोई सम्बन्ध नहीं था. उस समय देवदासी केवल शाही महल में वेलम्मा के समर्पण के लिए किया गया केवल एक धार्मिक अनुष्ठान मात्र था, जो अत्यधिक पवित्र माना जाता था. किन्तु धीरे-धीरे नर्तकी देवदासियां पंडितों की शारीरिक भूख मिटाने का जरिया बन गयी इसके एवज में पंडितों को इनके परिवार वालों को कुछ मासिक शुल्क देना पडता था. देवदासियों द्वारा यह अनुष्ठान नृत्य द्वारा सम्पन्न किया जाता था. सेराह हेरिस की एक डॉक्यूमेंट्री प्रॉस्टिट्यूट्स ऑफ गॉड के अनुसार यह संस्कृति 20 वर्षों से अधिक समय से गैरकानूनी घोषित कर दी गयी है,बावजूद इसके प्रतिवर्ष लगभग 3000 लडकियों को गुप्त रूप से देवदासी के रूप में देवी वेलम्मा को समर्पित किया जाता है. डॉक्यूमेंट्री में सेराह हेरिस कई देवदासियों से रूबरू हुई, जिनको अपनी इच्छा के विरुद्ध आर्थिक कठिनाइयों के चलते माता-पिता के कहने पर देवदासी का जीवन स्वीकार करना पडा. किन्तु इससे भी अधिक विस्मय की बात तो यह है कि देवदासी का जीवन जीने वाली लगभग स्त्रियां उस समय नाबालिग थी, जब उन्हे यह जीवन जीने को बाध्य किया गया था. देवदासी संस्कृति प्राचीनकाल से चली आ रही है. इसके प्रथम संकेत हमें कालीदास के मेघदूत में मिलते हैं. चोल साम्राज्य में इस प्रथा का और अधिक विकास हुआ. दूर दराज के क्षेत्रों में आज भी यह प्रथा चलती है. महाराष्ट्र और कर्नाटक के बॉर्डर पर स्थित एक छोटे से गांव सांगली में देवदासी प्रथा आज भी रिवाज में है.

तब से आज तक यह संस्कृति तो चलती आई है, किन्तु अब तक इसमें बहुत से बदलाव आ गए हैं. उदाहरण के लिए पहले केवल पुजारी या ब्राह्मण ही ऐसी कन्याओं के शरीर को भोगते थे, किन्तु आधुनिक समय में कोई भी व्यक्ति कुछ धनराशि देकर ऐसी किसी देवदासी के साथ अपनी काली रात को रंग बदल सकता है. अब देवदासी केवल ब्राह्मण तक ही सीमित नहीं रह गयी. आधुनिक समय में देवदासी संस्कृति वेश्यावृत्ति में तब्दील हो गयी है. प्राचीन काल से आधुनिक काल तक यदि इसमें कुछ नहीं बदला है,तो वह है देवदासियों की स्थिति.5 मई 2014 को टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित एक रिपोर्ट से समाज में इनकी स्थिति का पता चलता है. रिपोर्ट के अनुसार एक 35 वर्षीय महिला सुमंगला को स्वंय उसकी माँ देवदासी बनने को बाध्य करती है. यही नहीं, देवदासी जीवन के 8 वर्ष बीत जाने के पश्चात भी उसकी माँ अपनी बेटी को विवाह करने से रोकती है. सुमंगला के प्रेमी वेणुगोपाल को भी बिरादरी से सिर्फ इसलिए बेदखल कर दिया क्योंकि वह समाज और परिवार के विरूद्ध जाकर एक देवदासी के साथ रहने लगा था. देवदासियों का जीवन जितना कठिन अतीत में था उतना ही कठिन आधुनिक समय में भी है.

सामाज में देवदासियों को छूना आज भी अच्छा नहीं समझा जाता. बकौल एक देवदासी माला,

मैं स्कूल जाना चाहती थी. उस समय मेरी आयु 12 वर्ष थी जब खेत में काम करते हुए मुझे एक व्यक्ति ने देखा और देखते ही मेरे पिता को सुझाव दिया कि वह मुझे देवदासी के रूप में समर्पित कर दे, जिससे कि घर में कुछ पैसे आ सके. मैं 12 वर्ष की आयु से ही देवदासी का जीवन व्यतीत कर रही हूँ.”

19 वर्षीया देवदासी बेलावा के अनुसार, उन्हें (देवदासियों को) गाँव (मुढोल) से लगभग २० किलोमीटर दूर रहना पडता था चूंकि ऊँची जाति के लोग उन्हें आज तक छूना भी पाप समझते हैं. उन्हें मार्किट या शॉपिंग मॉल में जाने की मनाही है. उनका किसी के घर में प्रवेश वर्जित है. उन्हें अपना जीवन ऊँची जाती के भय में जीना पडता है. मॉडर्न सोच रखने वाले भारत में यह जातिवाद की भीषणता का प्रतीक है, जिसकी जडें आज भी भारतीय समाज के भीतर गहरी पैठ बनाये हुए है. ऐसी ही कहानी एक अन्य देवदासी की है, जो अपने भाई-बहनों के साथ अपने माता-पिता के भरण-पोषण की एकमात्र जिम्मेदार है. एक अन्य देवदासी की कहानी बड़ी ही दयनीय है. इस देवदासी को इसके माता-पिता नें आर्थिक तंगी के चलते देवदासी बनाकर बॉम्बे (आधुनिक मुंबई) भेज दिया ताकि यह परिवार का भरण पोषण कर सके. उस समय यह देवदासी केवल 18 वर्ष की थी. वहाँ इसने एक लड़की को जन्म दिया, जिसको यह वहीं छोड़कर वापस आ गई. घर आने पर इसके भाइयों ने इससे सारे पैसे ले लिए और दुत्कार दिया. अपना पेट पालने के लिए मजबूरन इसको भीख मांगने का पेशा अपनाना पड़ा. देबदासियों को छूना भले ही पाप हो किन्तु ऐसी अछूत देवदासियों के साथ शारीरिक संबन्ध बनाने में किसी को कोई ऐतराज नहीं है. मासूम बच्चियों को वेलम्मा के मंदिर में दान करके उन्हे सार्वजनिक संपत्ति इसी प्रयोजन के तहत बना दिया जाता है. यह वास्तव में और कुछ नहीं बस महिलाओं के शरीर को भोगने की एक संस्कृति मात्र है. हैरानी की बात यह है इस संस्कृति को गैरकानूनी घोषित किये कई दशक हो गये लेकिन आज भी देवदासियों के पर्व सौंदती को बड़े हर्षोल्लास के साथ कर्नाटक में मनाया जाता है. शहर के नाम से जाने जाने वाले इस पर्व में लाखों की संख्या में लोग शिरकत करते हैं. लगभग एक महीने के लंबे इस पर्व में येल्लमा मंदिर में किशोरियों को उनके माता पिता द्वारा दान किया जाता है, जिसके एवज में उन्हे पैसा दिया जाता है. इस पर्व के दौरान क्या-क्या होता है, और दान करने की संपूर्ण परिक्रिया कैसे पूरी की जाती है इसकी विस्तृत जानकारी भूतपूर्व देवदासी और महिला विकास संगठन की सदस्य सितवा देती हैं. बकौल उनके शब्दों में,वे लोग लड़की को येलम्मा के मंदिर में लाये. लड़की को हरी साड़ी, हरी चुडियां, बिछिया  और कमरबंद पहनाया जाता है. उन्हें एक पात्र दिया जाता है, जिसमें नारियल और एक नकाब होता है. लड़की उस पात्र के पास बैठ जाती है. इसके बाद पांच वृद्ध देवदासियां उस लड़की के गले में मोतियों की माला(मुथु) पहनाते हैं. इसके बाद देवदासी बनाने के लिए पवित्र अनुष्ठान किया जाता है. इसके बाद वह देवदासी बन जाती है. इसके बाद वह अपने क्षेत्र में लौट आती है. जब वह लड़की दस, ग्यारह या बारह साल की हो जाती है, तो उसके घर वाले दूसरी देवदासी को इसकी सूचना देते हैं और उसके लिए किसी व्यक्ति को भेजने को बोलते हैं. एक तरह से ग्राहक ढूंढा जाता है. हर ग्राहक उस देवदासी के साथ सोने के लिए पैसा देता है, जिसका इस्तेमाल उसके घर वाले करते हैं.

 इस संस्कृति के निर्मूलन के लिए बहुत प्रयास किये गए.धर्म का प्रचार करने आए मिशनरियों ने इसके खिलाफ आवाज उठाई. बिटिश सरकार ने भी इसको समाप्त करने के भरसक प्रयास किये और कई भारतीय समाज सुधारकों ने इस पैशाचिक संस्कृति के विरूद्ध अपना विरोध दर्ज किया किंतु बच्चियों के यौन शोषण का यह विभत्स धर्म और संस्कृति के नाम पर आज भी जस का तस है. स्कूल जाने की उम्र में इन्हे यौन शोषण का शिकार होना पड़ता है. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से पीएचडी की शोधार्थी संगीता दास के अनुसार,

देवदासी प्रथा के बारे में मेरी निजी राय यही है कि यह महिलाओं के शोषण का दूसरी तरीका मात्र है. देवदासी को पवित्र वेश्या ही कहा जा सकता है. इसके साथ पवित्र शब्द जोड़ देने से इन कम उम्र की लड़कियों के शोषण का स्तर कम नही हो सकता है. धर्म के नाम पर इनका शोषण किया जाता है. देवदासी प्रथा स्पष्ट तौर पर धर्म के पितृसत्तात्मक स्वरूप को दिखाता है.

इस तरह अगर देखा जाए, तो देवदासी प्रथा के माध्यम से वेश्यावृति को बढ़ावा दिया जा रहा है और धर्म को इसका आधार बनाया जाता है. धर्म के नाम पर महिलाओं का शोषण तो प्राचीन काल से होता आ रहा है, लेकिन आधुनिक समय में धर्म के नाम पर गैरकानूनी तरीके से चलाए जा रहे, इस प्रथा को प्रशासनिक स्तर पर कड़ी कार्रवाई करके ही रोका जा सकता है.

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