वैसे आगे बढने से पहले बता दूँ की इस स्टोरी को तैयार करने में मुझे सहायता मिला है मेरे मित्र विनोद कुमार विक्की जी का, शुक्रिया मित्र विनोद कुमार विक्की जी।

बिहार की राजनीति चारपाई चार खंभों पर टिकी हुई हैं। इनमें से एक है सुशासन बाबू और उनका कुनवा दूसरा है राजनीति के ज्योतिष, तीसरा हैं लालटेन पुरूष और उनका कुनवा तथा चौथा जबरदस्त प्रभावी खूंटा हैं प्रशांत किशोर, जो बिहार की नौका को बिना पतवार ही खेने का दंभ भरते हैं। हालाँकि कुछ स्तम्भों का उदय जेपी आंदोलन के समय साथ साथ ही हुआ था। समय के अंतराल में इनमें अपने अपने तरीके से जन सेवा की भूख, कभी.कभी कुर्सी की लालसा भी इनको अलग-अलग या साथ-साथ; काम करने का मौका दिया। बिहार ने उद्धार का मौका दिया, बार बार दिया पर रिजल्ट ढेला। संपूर्ण आर्यावर्त में बिहार ही एकमात्र ऐसा इकलौता प्रदेश है जहाँ हर विधानसभा चुनाव के पश्चात जंगलराज और सुशासन का महागठबंधन का समन्वय साथ साथ दिखा। चाहे वह डायरेक्ट हो या इनडायरेक्ट। बिहार की राजनीति में इन चार पायों की भूमिका काफी महत्वपूर्ण है।

आइए आज के प्रसंग में विकास के वाहक इन चतुर्थ स्तम्भ के बारे में लिटिल लिटिल चर्चा करते हैं। प्रथम सुशासन बाबू (राज्य सभा सदस्य) के बारे में, जहाँ तक गूगल बाबा की पहुंच है उसके अनुसार इनके तीर का एंगल और ऐम हर बार गड़बड़ाता है पर ये समय रहते उसमे सुधार भी कर लेते है पर निशाना पूर्णतः सटीक मुख्यमंत्री कुर्सी तक सफलतम होता है । इस्तीफा और पुनः शपथ ग्रहण इनकी नैतिक नियमितताओ में शुमार रहा है। जिस प्रकार विपक्षी नेता सरकारी नीतियों के विरुद्ध भारत या बिहार बंदी का लक्ष्य रखते हैं ठीक उसी तरह हमारे सुशासन बाबू पर भी बंदी का खुमार चढ़ा रहता है। बिहार में शराबबंदी,पान मसाला,गुटखा बंदी, दहेज बंदी आदि के ये सूत्रधार हैं! होम डिलवरी के महामारी के बीच बंदी का असर बिहार की जनता पर हो या ना हो लेकिन इन बंदी के उपलक्ष्य में प्रति वर्ष मनाया जाने वाला मानव श्रृंखला का असर सरकारी कर्मचारी से आम जनता पर एवं राजकोष खर्च पर जरुर पड़ता है। दशक पूर्व बुझे हुए लालटेन पर इन्होने अपनी सत्ता संभाली थी और सुशासन प्रदेश में विकास को गतिशीलता दी थी। किंतु इनकी अतिमहत्वकांक्षा का साइडइफेक्ट इनके साथ साथ पुरे प्रदेश को झेलना पड़ता है । वर्ष 2014 लोस चुनाव मे जब भाजपा ने अपना पीएम उम्मीदवार मोदी को बनाया तो सुशासन बाबू का ईगो हर्ट हो गया। आखिर हो भी क्यों ना किस मामले मे ये मोदीजी से कम थे। उन्होने गुजरात मे विकास को हवा दी तो ये साहेब भी पुरे देश मे बिहार विकास की आंधी का लोहा मनवा चुके थे साथ ही बेस्ट सीएम के अवार्ड से भी नवाजे गए थे। सबसे बड़ी बात हमेशा मोदीजी ;सुशील मोदी इनके अधीनस्थ उप मुख्यमंत्री रहे थे तो भला कोई अन्य मोदीजी ;नरेन्द्र मोदी इनके शीर्षस्थ हो जाते! ये इनको कैसे गंवारा होता। इन्होनें ऐन वक्त पर अपने अंतरात्मा की आवाज सुन ली और भाजपा के साथ वाली दशकों पुरानी जय.बीरू की दोस्ती तोड़ दी थी।

और अकेले दम पर लोस चुनाव लड़ बैठे। लोस चुनाव मे शर्मनाक प्रदर्शन से इनकी अंतरात्मा ने एक बार फिर इन्हें काल किया पर ये भी शायद रांग नंबर था। इन्होने अपना इस्तीफा सौंपते हुए बिहार की पतवार एक ऐसे प्रशांत किशोर; जीतनरामद्ध को सौंप दिया जिनके सदकृत्यों व प्रवचनों ;बयानबाजी ने बिहार को पुनः विकास प्रदेश से हास.विलास प्रदेश में बदलते हुए राज्य को बीच मझधार मे ही डुबने.उतराने लगा। जब विस चुनाव का समय आया तो उस समय इनके अंतरात्मा का संभवतः काल ड्राप हो चुका था जब ये उसी पार्टी से जा मिले जिनके विरोध मे जनता ने इस विकासपुरूष को अपना जनाधार दिया था। बूझ चुके लालटेन मे तेजस्वी तेल और तेजप्रताप वाली नई बाती डाल कर महागठबंधन कर लिया। खैर इनके इस निर्णय से भले ही बिहार मे अपराध, अराजकता और भ्रष्टाचार का सीक्वल आरंभ हो गया हो, बिहार विकास के लिफ्ट से फिसल गया हो पर बिहार की राजनीति मे दो दशकों तक एकक्षत्र राज्य करने के बाद वर्तमान में पुरी तरह से लुप्तप्राय हो रहे त्रिदेवों मे से एक लालटेन पुरूष के परिवार का वेल सेटलमेंट हो गया।
आइए अब जानते हैं बिहार की राजनीति के दूसरे देव लालटेन पुरूष के बारे मे! भले ही आप सीएफएल युग मे क्यों ना हो पर लालटेन को विकास का प्रयाय मानने वाले लालटेन पुरूष का ध्येय हमेशा लालटेन युग की ओर ही रहता है। इनका ये मानना है कि जब तक समोसा मे आलू रहेगा तब तक ये बिहार की राजनीति मे ये सक्रिय रहेंगे। अब साहेब को कौन समझाए कि डायबिटिज का प्रकोप इतना बढ चुका है कि लोग आलू वाले समोसे की अपेक्षा मूंगवाली कचौड़ी की ओर ज्यादा आकर्षित हो रहे है। हालांकि इनके दो लल्ला का राजनीति में प्रवेश रोचक एवं रोमांचक है। पहली बार विधायक इंट्री के साथ छोटे लल्ला डीप्टी सीएम तो बड़े साहबजादे स्वास्थ्य मंत्रालय को स्वस्थ करने का कमान थाम लिया और सुशासन चचा के साथ सुशासन प्रदेश में विकास की हौले हौले हवा उड़ाने लगें! कुछ महीने बाद ही सुशासन बाबू की अंतरात्मा पुनः जगी और चाचा.भतीजा का राजनीतिक रिश्ता रास्ते पर आ गया। महागठबंधन से अलग होकर सुशासन बाबू पुनः नमो.सुमो के कमलासन पर विराजमान हो गए। चाचा के पलटन और नमो.सुमो के रवैया से आहत बड़े लाल देश के पीएम तक की चमड़ी उधेड़ने का जज्बा रख कर चिल्लाने लगे तो छोटा भाई अपने पलटू चचा पर उन्हीं का तीर साधने लगा। बहरहाल द्वितेज लालों के पिताश्री पर अरबों रूपये के चारा गबन से लेकर बेनामी संपत्ति तकए दादागिरी से लट्ठगिरी तक भले ही कई मामले दर्ज हो किंतु राजनीति मे इनका वर्चस्व आज भी दमदार है। सुप्रीमों आज कल उसी कारागार में प्रवास पर है जिसका कभी उन्होंने अपने कर कमलों से उदघाटन किया था। भले ही आजकल ये विधानसभा या लोकसभा जाने की बजाय कोर्ट.कचहरी जा रहे हो किंतु इन्होने अपने सूझ.बूझए अदम्य शौर्य व महत्वाकांक्षा से पुरे परिवार को राजनीति मे सेटल जरूर कर दिया है। प्रसंग के आगे थोड़ी सी चर्चा त्रिदेवों मे एक बंगला स्वामी की लाजिमी हो जाती है। इन्हें राजनीति का ज्योतिष कहे तो कोई अतिश्योक्ति ना होगी क्योंकि आप इनका इतिहास उलट कर देख ले चाहे सरकार किसी भी पार्टी की क्यों ना हो पर एक मंत्रालय इनके लिए हमेशा आरक्षित रहता है! कांग्रेस और भाजपा के साथ अलग अलग सत्रों मे ये रेलए सेलए कोयलाए संचारए खाद्य आदि मंत्रालयो मे ये योगदान दे चुके है। अब तो राजनीति के जानकार ये पूर्वानुमान लगा लेते है कि ये बंदा जिस गठबंधन के साथ चुनाव लड़ रहा है तय है सरकार उसी की बनने वाली है भले ही परिस्थितयां कुछ भी हो। इनका ना तो कोई अपना मेनिफेस्टो है ना कोई सिद्धान्त। इन्हे तो अपनी जीत और अपने मंत्री पद से मतलब है चाहे सरकार किसी की हो। संभवतः इनके परिवार का शायद ही कोई व्यस्क पुरूष बचा हो जिसने राजनीतिक सुख का भोग ना किया हो! ये और इनके परिवार के पुत्र एवं बंधु.बांधव बाहरी जनसेवा में इतने मशगूल हैं कि इनके खगड़िया वाले पैतृक गाँव में सड़क बिजली है या नहीं! इसकी सुध भी इसके परिवार के राजनेताओं को नहीं है। यदि अपने गाँव में सड़क बिजली ला दे तो इन पर क्षेत्रवाद का भी आरोप लग सकता है संभवतः इसी उधेड़बुन में बंगला पुरूष पैतृक गाँव के झोपड़ी वालों पर दशकों से ध्यान नहीं दे पाएं! सुशासन के अहम् और कुर्सी के वहम की विवाद के समय ही हम का उद्भव हुआ। घोंघा खाने, शराब पीने, कभी.कभी रिश्वत देने और नौजवानों के मौज मस्ती के पैरोकार प्रशांत किशोर साहब धुर बुरबक प्रशांत किशोर, बिहार की नैया को हम के दम पर पार लगाने का जोड़ जुगाड़ में लगे हैं! हालांकि बिहारी त्रिदेव के सामने इनका राजनीतिक अस्तित्व मिस्टर इंडिया वाली है फिर भी ये अपने शिक्षाप्रद एवं प्रेरक उदबोधन के लिए जनता के बीच नायक द रियल हीरो की तरह जाने जाते हैं! बहरहाल राजनीति के इन चार पायों की डांवाडोल स्थिति के बीच बिहार की राजनीति में अपना रिमोट लेकर पीके का पदार्पण भी हो चुका था ! हमने ये भी देखा कि पीके का रिमोट विधानसभा चुनाव में सही सही काम नहीं किया और रांग नम्बर पकड़ लिया ! सुशासन और अंतरात्मा के काल बेल के बीच अहम, वहम, हम और भ्रम के भंवर में हिचकोले खाता दिल्ली दरबार राज्यसभा होते पहुँच गया है और बिहार को निशांत का तोफा दे रखा है , बिहार लालटेन की धार,प्रशांत किशोर की पतवार, तीर के वार एवं पीके के रिमोट प्रहार अब अगले 4 साल कमल के आस पास और तीर का बार चलता रहेगा ऐसा मुझे लगता है । संभवतः ये परमपिता ब्रह्माजी को भी नहीं मालूम! ये तो बिहार है। हमें विकास नहीं 10000 और दारू चाहिए