सियासी हंगामा क्यों है बिहार में–?

हमारे बिहार में एक कहावत है। एक कोस पर लोगों की बोली बदल जाती, रिवाज बदल जाता है. इतनी विविधताओं के बावजूद भी हम एक हैं लेकिन हमारे बिहार में कई बार ऐसे मौके आए हैं जब हमारी एकता पर किसी ने बुरी नजर लगाने की कोशिश की है और वे अपने मकसद में सफल भी हो गए हैं.

किसी ने सत्ता की कुर्सी पाने के लिए तो किसी ने धर्म की आड़ में ये सब किया. आजादी से पहले और आजादी के बाद बिहार में कई दर्दनाक दंगे हुए, जिसमें मानवता ही मरी है. हिंसा किसी भी समस्या का समाधान नहीं है. लेकिन इंसान बहकावे में आकर, धर्म और आस्था की आड़ में एक दूसरे का खून बहाता है. इन सब फसादों के कारण हमारा विकास और देश की प्रगति रूक रही है. बिहार की दशा इस समय बड़ी दयनीय है. एक धर्म के अनुयायी दूसरे धर्म के अनुयायियों के जानी दुश्मन हैं. अब तो एक धर्म का होना ही दूसरे धर्म का कट्टर शत्रु होना है। ऐसी स्थिति में बिहार का भविष्य बहुत अंधकारमय नजर आता है. इन ‘धर्मों’ ने बिहार का बेड़ा गर्क कर दिया है और अभी पता नहीं कि यह धार्मिक दंगे बिहार का पीछा कब छोड़ेंगे. इन दंगों ने संसार की नजरों में बिहार को बदनाम कर दिया है. और हमने देखा है कि इस अंधविश्वास के बहाव में सभी बह जाते हैं. कोई बिरला ही हिंदू, मुसलमान या सिख होता है, जो अपना दिमाग ठंडा रखता है, बाकी सब के सब धर्म के यह नामलेवा अपने नामलेवा धर्म के रौब को कायम रखने के लिए डंडे लाठियां, तलवारें छुरे हाथ में पकड़ लेते हैं और आपस में सिर फोड़ फोड़कर मर जाते हैं. बाकी कुछ तो फांसी चढ़ जाते हैं और कुछ जेलों में फेंक दिए जाते हैं. इतना रक्तपात होने पर इन ‘धर्मजनों’ पर सरकार का डंडा बरसता है और फिर इनके दिमाग का कीड़ा ठिकाने आ जाता है. दंगों के कारण समाज में एक वर्ग दूसरे वर्ग पर आक्रमण करता है और इसी कारण एक वर्ग दूसरे वर्ग से नफरत करने लगता है। हमारे बिहार में आपसी बहस को नफरत में बदला जा रहा है. हम बिहारी इस दंगों की मानसिकता के खिलाफ हैं। इस तमाशे में किसी का भला नहीं है. नेताओं के चक्कर में अपना भाईचारा गंवाई जा रही है।  धर्म के आधार पर भेदभाव का स्पष्ट उदाहरण देखनें को मिल रहा है। भारत के कुछ दूसरे हिस्सों की तरह सांप्रदायिक ताकतों की पैठ बिहारी समाज में अब भी नहीं बन पाई है. ऐसा इस कारण मुमकिन हुआ क्योंकि बिहारी समाज ने भागलपुर के पूर्व दंगों से सीख हासिल की है. सत्ता फेल हो चुकी है. उसके पास पूर्व किए गए वादों को लेकर आंख मिलाने की लाज और हिम्मत नहीं बची है.

बीजेपी समेत राजनीतिक दल एक दूसरे के साथ अपने वोट पर कब्जा करने के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। हर कोई इसे पाने के लिए उत्सुक है लेकिन हमारे समाज के साथ न्याय करने के लिए कोई भी तैयार नहीं है। सामाजिक इंजीनियरिंग और जाति एकमात्र मानदंड हैं। विकास और पैकेज सिर्फ नारे हैं, वास्तविक खेल जाति पर खेला जाता है। जब भी चुनाव होता है, सांप्रदायिक संगठन सक्रिय हो जाते हैं और धर्म के साथ लोगों को विभाजित करने के लिए सक्रिय हो जाते हैं और जातियां हालांकि यह मुख्य रूप से आर एस एस, बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद जैसे हिंदू फासीवादी शक्तियों द्वारा किया जाता है, कुछ मुस्लिम नेता भी भ्रामक बयानों को लेकर अपनी भूमिका निभाते हैं। वे मुस्लिम वर्चस्व वाले निर्वाचन क्षेत्रों में भी उम्मीदवार बन जाते हैं। वास्तव में हिंदू और मुस्लिम राजनेता छाया मुक्केबाजी में शामिल होते हैं। जातिगत राजनीति ने मुस्लिमों को हाशिए पर डाल दिया है। सुशासन बाबू नीतीश कुमार के राज में फिलहाल सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है. दंगों की आग में झुलस रहे बिहार पर राजनीति भारी पड़ रही है. मगर सरकार विपक्ष एक दूसरे से बकझक करने में ही परेशान हैं. आम चुनाव सामने हैं तो इनका राजनीतिक कनेक्शन अपने आप जुड़ जाता है. क्या ये अब कोई नया राजनीतिक मॉडल है, ये सवाल भी जेहन में घूमता है. चलिए हम आपको अभी अभी भरके दंगों के बीच ले चलता हूं। भागलपुर जिले में एक धार्मिक यात्रा के दौरान जोर जोर से पाकिस्तान मुर्दाबाद और आस्तीन के सांप जैसे नारे लगाने और डीजे बजाने पर दूसरे समुदाय को आपत्ति हुई। फिर पथराव और गोलियां चलीं लगभग एक दर्जन लोग घायल हुए। केंद्रीय राज्य मंत्री अश्विनी चौबे के बेटे अर्जित चौबे समेत 9 लोगों पर केस दर्ज हुआ। बिहार में नवमी के पहले ही नफरत की जो चिंगारी फैली थी, उसकी लपटें अब भी आसमान छूती जा रही हैं। दंगाईयों की जो हुड़दंग भागलपुर से होते हुए सीवान, औरंगाबाद, समस्तीपुर, मुंगेर, नालंदा और शेखपुरा पहुंच गई थी, उसने नवादा की तरफ भी कूच कर लिया है। औरंगाबाद में रामनवमी के मौके पर निकाली गई शोभा यात्रा के दौरान दो गुटों में जमकर मारपीट और पथराव हुआ। घटना के बाद इलाके में तनाव की स्थिति बनी हुई थी। बिहार के मुसलमानों को हमेशा वोट बैंक के रूप में देखा जाता है।यह चुनाव समय के दौरान का विशेष रूप का फसल मात्र है। 2011 की जनगणना रिपोर्ट के अनुसार मुसलमानों की संख्या बिहार की जनसंख्या 16.87 प्रतिशत है। पिछले 10 सालों में, राज्य में मुस्लिमों की आबादी बढ़ी है। राज्य में 80 सीटें हैं जहां मुस्लिम परिणाम को सीधे प्रभावित करने की स्थिति में हैं,2013 के एक आंकडे के अनुसार हमारा बिहार दंगें में नम्बर 1 था। 2012 में पूरे देश में 74683, 2013 में पूरे देश में 72126 और 2015 में पूरे देश में 65255 दंगें हुए। आज से पहले भागलपुर दंगा वही दंगा जिसे भारतीय इतिहास में सबसे अधिक दिनों तक चलने वाला दंगे के रूप में जाना जाता है और जिसमें सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 1000 लोग मारे गए जबकि घायलों की संख्या के बारे में सरकार के पास आज तक कोई ठोस आंकड़ा उपलब्ध नहीं हो पाया। आज भी स्वयंसेवी संगठनों के मुताबिक इन दंगों में कम से पांच हजार लोगों के मारे जाने की बात कही जाती है। सबसे अधिक दिलचस्प यह है कि नीतीश कुमार ने जब इस दंगे की जांच के लिए वर्ष 2006 में जस्टिस एनएन सिंह की अध्यक्षता में एक सदस्यीय आयोग का गठन किया था, तब वे एनडीए के हिस्सा थे और उनकी मंशा भागलपुर दंगा के सहारे सूबे में मुसलमानों के बीच साख बना चुके लालू प्रसाद को कमजोर करने की थी। यही वजह रही कि इस दंगे के लिए कामेश्वर यादव को जिम्मेवार ठहराया गया और कामेश्वर यादव के बहाने लालू प्रसाद पर वार किया गया। वजह यह रही थी कि अपने मुख्यमंत्रित्व काल में एक कार्यक्रम के दौरान लालू प्रसाद ने कामेश्वर यादव के साथ मंच साझा किया था, जबकि तब राजद ने इस तथ्य को उजागर कर भाजपा समर्थित नीतीश कुमार के मंसूबों पर पानी फेर दिया था। अब थोड़ा भागलपुर दंगे के काले इतिहास पर नजर डालते हैं। दंगे की शुरुआत 25 अक्टूबर 1989 को हुई थी। उस समय आरएसएस पूरे देश में अयोध्या विवाद को हवा देने के इरादे से रामशिला पूजन करवा रही थी। भागलपुर में आरएसएस पहले से मजबूत स्थिति में था।

इसकी कई वजहें रही थीं। तनाव पूरे देश में था और भागलपुर भी अपवाद नहीं था। अक्टूबर महीने में शिलापूजन का जुलूस निकाला जाना था और उसके पहले अगस्त में ही जोर शोर से तैयारी शुरू हो गईं थीं। इसी दरम्यान मुहर्रम और विषहरी पूजा का आयोजन होना था। यह आरएसएस की खतरनाक रणनीति का हिस्सा थी कि पारंपरिक विषहरी पूजा व्यापक बन चुकी थी। जब भागलपुर में विषहरी पूजा शुरू हुई तब संघ समर्थकों ने मुसलमानों के इलाके खासकर नाथनगर और चंपानगर में तनाव बढ़ाने का भरसक प्रयास किया। परिणाम यह हुआ कि तत्कालीन एसपी के एस द्विवेदी के नेतृत्व में जिला प्रशासन ने स्थिति को संभाल लिया। शांति समिति की बैठक कराई गई और मुहर्रम के जुलूस को स्थगित करा दिया गया।यह वह दौर था जब कांग्रेस अंतर्कलह से टूटने के कगार पर थी। तत्कालीन मुख्यमंत्री सत्येंद्र नारायण सिंह और पूर्व मुख्यमंत्री भागवत झा आजाद के बीच छत्तीस का आंकड़ा था। इसके अलावा तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष शिवचंद्र झा जो भागलपुर के ही थे, उनका संबंध भी तत्कालीन मुख्यमंत्री से मधुर नहीं था। आपसी राजनीतिक गुटबंदी और अंतर्कलह के बीच जब रामशिला पूजा की तैयारी की खबर तत्कालीन मुख्यमंत्री तक पहुंची तब विचार विमर्श के बाद उन्होंने इसकी इजाजत इस हिदायत के साथ दी कि जुलूस में किसी तरह के हथियार का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा और किसी प्रकार का नारा नहीं लगाया जाएगा। लेकिन स्थानीय राजनीति और आरएसएस के उन्मादी रवैये के कारण ऐसा न हो सका। 24 अक्टूबर 1989  को भागलपुर के परवती इलाके से रामशिला पूजन का एक जुलूस तातरपुर मोहल्ले की ओर बढ़ा। यह जुलूस किसी तरह गुजर गया, लेकिन तभी एक विशाल जुलूस नाथनगर की ओर से आ गया। जुलूस मुस्लिम मोहल्ले के बीचो बीच चौराहे पर पहुंचा था कि तभी भीड़ में शामिल लोगों ने मुसलमानों के खिलाफ नारेबाजी शुरू कर दी। जब यह सब हो रहा था, तब भागलपुर के तत्कालीन एसपी के एस द्विवेदी और जिलाधिकारी अरुण झा वहां मौजूद थे। जुलूस के नारे बढ़ते गए, आवाज भी तेज होती गई। इसकी प्रतिक्रिया में दूसरी ओर से पत्थरबाजी शुरू हो गई। अभी डीएम कुछ समझने या संभालने की कोशिश करते कि तभी वहां बम का धमाका हो गया। हालांकि इससे किसी की जान हानि नहीं हुई, लेकिन पुलिस ने फायरिंग शुरू कर दी। बताया जाता है कि पुलिस के द्वारा इसी फायरिंग ने दंगे की शुरुआत कर दी। इसकी वजह यह है कि इसमें मारे गए दोनों लोग मुसलमान थे। उधर, शिलापूजन का जुलूस उन्मादी भीड़ में बदल गया। जंगल में आग की तरह अफवाहें फैलने लगीं कि संस्कृत विद्यालय में 40 हिंदू छात्रों को मुसलमानों ने मार दिया है। ऐसी ही अफवाह शहर के हर कोने से आने लगीं। इन अफवाहों का परिणाम यह हुआ कि समूचा भागलपुर दंगे की चपेट में आ गया। एक ऐसा दंगा जो आजाद भारत में चलने वाला सबसे बड़ा दंगा था।इसके बाद भागलपुर मुर्दों के शहर में बदल गया। अकेले परवती में 40 मुसलमानों की हत्या कर दी गई। आसानंदपुर में भी दंगा जोर पकड़ चुका था। इस दंगे की सबसे बड़ी त्रासदी यह रही कि यह केवल शहर तक ही सीमित नहीं रहा। गांवों तक दंगे की आग में जलने लग गए थे। हालांकि उस दौरान भी हिन्दू मुस्लिम एकता की मिसाल गढ़ने वाले लोग थे। सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक भागलपुर के जमुना कोठी में हिन्दुओं ने करीब चालीस मुसलमानों को शरण दे रखी थी। लेकिन दंगाइयों ने जमुना कोठी पर हमला बोलकर 18 मुसलमानों को मौत के घाट उतार दिया। इनमें 11 मासूम बच्चे थे।भागलपुर के स्थानीय लोगों से बात करने पर पता चलता है कि कामेश्वर यादव, महादेव सिंह, सल्लन मियां और अंसारी जैसे लोग राजनीतिक पार्टियों के मोहरे थे और वे ही पूरे दंगे को आगे बढ़ा रहे थे। इसके लंबा खिंचने के पीछे इन्हीं अपराधियों-राजनेताओं का गठजोड़ था। इसके अलावा तत्कालीन एसपी के एस द्विवेदी की भूमिका भी संदिग्ध थी। बताया जाता है कि वे आरएसएस के एजेंट के रूप में काम कर थे और उनके इशारे पर पूरी भागलपुर पुलिस भी हिन्दू मुसलमान में बंट चुकी थी। इस क्रम में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने केएस द्विवेदी को हटाने का निर्देश दिया। इसका प्रतिरोध भागलपुर में पुलिस के जवानों ने इस कदर किया कि जब राजीव गांधी दंगे का जायजा लेने पहुंचे तब उन्हें भागलपुर शहर में घुसने तक नहीं दिया गया।बहरहाल, दंगे के शांत होने में करीब छह महीने लगे और इस छह महीने में पूरा भागलपुर तबाह हो चुका था। इसके बाद जब 1990 में लालू प्रसाद मुख्यमंत्री बने तब उन्होंने अपने स्तर से पूरे मामले की जांच कराने का निर्देश दिया और पीड़ितों को मुआवजा दिया गया। लेकिन यह बेहद दिलचस्प रहा कि दंगों के लिए जिम्मेवार एसपी के एस द्विवेदी को लालू प्रसाद ने सजा देने की बजाय विभागीय प्रोन्नति दे दी। बाद में जब लालू प्रसाद का राज खत्म हुआ और नीतीश कुमार सत्तासीन हुए तब उन्होंने लालू प्रसाद को सत्ता से उखाड़ फेंकने के लिए भाजपा के साथ मिलकर ब्रह्मास्त्र चलाया। इस दंगे ने पुराने राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक ताने बाने को झकझोर दिया. अगर यह दंगा नहीं होता तो शायद लालू प्रसाद यादव बिहार में यादव मुस्लिम समीकरण नहीं बनाते. शायद तत्कालीन प्रधानमंत्री मंडल आयोग की सिफारिशें लागू नहीं करते.पिछले दिनों केंद्रीय स्तर पर भारतीय जनता पार्टी की जीत ने यह साबित कर दिया है कि अल्पसंख्यकों के समर्थन के बिना भी सत्ता हासिल की जा सकती है. ऐसी राजनीति की नींव भागलपुर दंगे के दौरान रखी गई थी और आज उसे विस्तार मिला है.कांग्रेस ने इन दंगों की बड़ी राजनीतिक कीमत चुकाई है.1989 के भागलपुर दंगे के बाद भारत की बड़ी राजनीतिक घटनाओं में भाजपा द्वारा राम मंदिर अंदोलन चलाना और बाबरी मस्जिद का ध्वंस शामिल है.कांग्रेस ने इन घटनाओं के प्रति जैसा राजनीतिक रुख अपनाया, उसने भागलुपर दंगे की पृष्ठभूमि में बिहार में मुसलमानों को बड़े पैमाने पर कांग्रेस से दूर कर दिया। उस समय जिन राजनीतिक दलों ने धर्मनिरपेक्षता को अपना प्रमुख राजनीतिक एजेंडा बनाया उन्हें मुसलमानों का व्यापक समर्थन मिला.तब लालू प्रसाद यादव ऐसी राजनीतिक और सामाजिक पहल करने में सबसे आगे रहे थे. सवाल ये भी है कि क्या अब नीतीश कुमार से सत्ता नहीं संभल रही है. हाल ही में नीतीश ने एक बयान में कहा था कि जो भी सद्भावना और सांप्रदायिक सौहार्द को बिगाड़ने की कोशिश करेगा तो उसको बर्दाश्त नहीं किया जायेगा. तो क्या अब तक नीतीश कुमार को ये पता नहीं चल सका कि कौन ये जिसे इन दंगों से फायदा मिल रहा है. नीतीश के ही साझेदार की पार्टी के नेताओं पर आरोप लग रहे हैं उनका क्या? जहां एक ओर भाजपा नेता अधिकांश जगहों पर हिंसा के आरोप में गिरफ्तार किए जा रहे हैं। वहीं लालू के लोग आरएसएस को डायरेक्ट गुनाहगार ठहरा रहे हैं। राम के नाम पर निकाले गये रामनवमी के जुलूस को हथियार बनाकर बिहार में दंगे कराए गये जिसमें कहीं केन्द्रीय मंत्री अश्वनी चौबे का बेटा अर्जीत साश्वत शामिल है।हम बीजेपी की कुछ नीतियों से असहमत हो सकते हैं, लेकिन विकास के एजेंडे पर प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ कोई भी नहीं है निचली जाति मुस्लिम भाजपा के समर्थन में हैं क्योंकि वे ने अपने विकास के लिए सरकार की नीतियां देखी हैं ये भी एक नेता जी का ही वयान है। बिहार की राजनीति अभी बंद और बयानों के इर्द गिर्द घूम रही है. एक तरफ लालू बंद, बालू बंद, दारू बंद, किरासन बंद, दहेज बंद, बाल विवाह बंद पर ‘जीवंत’ चर्चा चल रही है. दूसरी तरफ केंद्रीय राज्य मंत्री गिरिराज सिंह, अश्वनी कुमार चौबे और उनके बेटे के ‘भड़काऊ’ बयान पर उठापटक जारी है. वैसे बंद के मामले में हकीकत ये है कि लालू प्रसाद यादव को छोड़कर बाकी सब कुछ थोक के भाव में चलता है भागलपुर पुलिस ने केंद्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री अश्वनी कुमार चौबे के बेटे अर्जित शाश्वत को दंगा भड़काने का आरोपी बनाया है और उनके खिलाफ स्थानीय कोर्ट ने वारंट भी इश्यू कर दिया है. लेकिन बाप और बेटा दोनों अपने-अपने हिसाब से कानून को ठेंगा दिखाने पर आमदा हैं बहरहाल, दोनों बयान बहादुरों के तेवर नरम पड़े हैं. शायद वे लोग समझ गए हैं कि सीएम नीतीश कुमार किसी भी सूरत मे दंगा का माहौल बर्दास्त नहीं कर सकते हैं. इस सवाल पर डिप्टी सुशील कुमार मोदी भी उनके साथ हैं।सियासत की इस नूराकुश्ती का हर किसी को अपने तरीके से फायदा मिला. मगर बहुसंख्यक हिंदू हों या अल्पसंख्यक मुस्लिम, ईसाई या सिख, हर कौम के लोग न्याय के लिए दर दर भटक रहे हैं. मौजूदा व्यवस्था में न्याय कानून से मिलता है और कानून बनाने का काम सियासतदानों का है. कुल मिलाकर कानून की गेंद फिर उसी सियासी अखाड़े में आ जाती है जिसके इस्तेमाल का मकसद दंगा पीडितों को न्याय दिलाना नहीं बल्कि दंगाई राजनीति की फसल को बारहमासी बनाना है. सांप्रदायिक हिंसा से निपटने के लिए फिलहाल देश में कोई अलग कानून नहीं है. हालांकि जानकारों की राय में इसके लिए कोई अलग से कानून होना भी नहीं चाहिए. कानून के शासन वाले राज्य में धर्म के नाम पर हिंसा फैलाने का काम बिना सियासी प्रश्रय के मुमकिन नहीं है. इसके लिए छोटी बड़ी कौम में बंटे समाज की अशिक्षा ही जिम्मेदार है और इसका फायदा उठाकर ही राजनीतिक बिरादरी अपने हित साधती है. ऐसे नेताओं से किसी सख्त कानून बनाने की उम्मीद किए बिना न्यायपालिका आईपीसी में वर्णित दंगा फैलाने वाली चंद धाराओं से ही काम चला रही है. इन नाकाफी प्रावधानों से जुड़ी प्रक्रियागत जटिलताओं की वजह से आज भी भागलपुर दंगा पीड़ितों को न्याय नहीं मिल पाया है. बताता चलूं बहुत चालाकी से ये नेता आपको हिन्दू मुसलमान में उलझा चुके हैं. आपको दंगाई बना रहे है. आप चाहे हिन्दू हों या मुसलमान हों. दंगाई बनने से रोकिए खुद को. मुकदमे वापस लीजिए और गले मिल जाइये.आप एक अच्छे नागरिक हैं. अब भी वक्त है कि अपने गुस्से से वापस लौट आने का. वहीं छोड़ कर गले मिलने का. नेता आपका घर जला रहा है तो आप कहां हैं. बिहार कहां हैं. आप लोग बाहर निकलिए. इस राज्य को बचा लीजिए. नेताओं को अब सशक्त वोटर नहीं चाहिए, उन्हें दंगों में उलझा हुआ वोटर चाहिए जो उनसे वादों का हिसाब न पूछे बल्कि अपनी किसी अनजान सुरक्षा के लिए निर्भर हो जाए. उम्मीद है आप खुद को समझाने का एक मौका देंगे. खुद को दंगाई बनाने का कोई मौका नहीं देंगे.

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