बिहार के मुख्यमंत्री का एक मतलब बाप, बेटा, पोता, पोती स्थल, वहीं चुनाव बोले तो लोकतंत्र का फेस्टिवल। नेताओं एवं कार्यकर्ताओं के आस्था का महापर्व। पार्टी-पालिटिशयन के जयकारा और जयघोष का व्रत। चुनाव प्रचार में करोड़ों लुटाकर जन सेवा की उत्कंठा, जान दाव पर लगा कर सत्ता तृप्ति की लालसा, जननायक बनने की ललक आदि स्थिति अच्छे दिन काल के दौरान बिहार चुनाव में परवान पर रहा।

बाल की खाल मीडिया मार्ट इंडिया के संपादक कन्फ्यूज शास्त्री ने आज के बिहार मुख्यमंत्री कुर्सी का जो विश्लेषण किया वो हमारे पाठकों के लिए कुछ इस तरह का है। अच्छे दिन की विभिषिका के कारण बिहार में आध्यात्मिक भक्त पर राजनीतिक भक्त तथा माता पर नेता हावी रहा। राज्यसभा शपथ के दौरान विभिन्न स्थानों पर लगे पंडालों से माता दुर्गा के प्रतिमा पूजन या आरती गीत की बजाय नेताओं के रैली उद्घोष एवं माता के जय की जगह नेता का जयघोष सुनने को मिला। पिछली बार की तरह इस बार भी बिहार में एग्जिट पोल सुतली बम साबित हुआ। हालाँकि एग्जिट पोल ज्योतिष विद्या से किसी एक पार्टी विशेष में दो दिनों तक खुशफहमी के कारण परिवार और पार्टी के हीमोग्लोबिन का लेबल बढ़ा रहा जबकि दूसरी पार्टी में घोर निराशा के कारण इम्यून सिस्टम कमजोर सा नजर आया। ये और बात है कि मतगणना के पश्चात एक बार फिर से बेवफा ईवीएम के चाल चरित्र पर ऊंगली उठ गई ! टेस्ट मैच की तरह लंबे समय तक चलने वाले अमेरिकी प्रेसिडेंट चुनाव परिणाम की काऊंटिंग के दौरान ट्रंप चचा और जो बाईडेन का बी पी और हर्ट बीट जितना फलक्चुएट नहीं किया होगा उससे कहीं ज्यादा बिहार चुनाव मतगणना के दौरान कार्यकर्ता और प्रत्याशियों का कलेजा देर रात तक धुकधुकियाता रहा। मतगणना वाले दिन टीवी से चिपके और मोबाइल को छाती से चिपकाए भक्त, चम्मच, कार्यकर्ता, जनता आदि अहले सुबह से देर रात तक टीवी-मोबाइल से फेविकोल रिलेशन में बने रहे। आचार संहिता के लागू होने के बाद बिहार में अच्छे दिनभी त्राहिमाम दिखा। चुनावी तापमान में निष्क्रिय होने वाला कोविड सरकार गठन के बाद फिर से जग गया! अब अच्छे दिन और कुमार दोनों ही जोश में है। ज्यादा सीट जीतने वाली पार्टी की अपेक्षा कम सीट वालों की चांदी रही है। चार और पांच सीट जीतने वाली पार्टी के साथ सरकार बनाने वाली कंपनी को अगले पांच साल तक नई सरकार में दामाद की तरह मान सम्मान मिलना तय है क्योंकि सरकार के नैया की पतवार इनके ही हाथों में होगी ये चाहे तो पार लगा दे या बीच में डुबा दे। मैदान में उतरे क्षेत्रीय पार्टी से निर्दलीय पार्टी तक का हर बंदा सीएम का मुंगेरिया स्वप्न देख रहा था। उस मोहतरमा ने भी सीएम बनने का दावा ठोका जिसकी पार्टी तक चुनाव आयोग द्वारा रजिस्टर्ड नहीं हो पाई। भारी भरकम शरीर वाले बिहार के लोकल नेताजी चारो खाने चित्त हुुए जबकि हैदराबादी मियां जी बिहार के सियासी पीच पर चैका मार गए। सत्तू, चाय, गुटखा पर चुनाव में फलाँ भैया की जय, ढिमकाना भैया जिंदाबाद का नारा लगाने वाला कार्यकर्ता प्रत्याशी से ज्यादा स्ट्रांग इम्यूनिटी से लबरेज दिखा। मजे की बात है कि कार्यकर्ताओं के जोश और होप के सामने अच्छे दिन हेल्पलेस और होपलेस नजर आने लगा। आत्मनिर्भर बिहारियों ने दस लाख नौकरी के प्रपोजल को ठुकरा कर मुफ्त में अच्छे दिनवैक्सीन (जिसका टीका अभी तक ईजाद नहीं हो पाया है ) बांटने वाली सरकार के प्रति आस्था दिखाई और मल्टी इंजन की बजाय इस बार ट्रिपल इंजन वाली सरकार बिहार में बन गई। युवा नेता के रैली में अप्रत्याशित भीड़ नेताजी की बजाय हेलीकाप्टर देखने के लिए जुटी (ऐसा चुनाव परिणाम की स्थिति और रैली में भीड़ की उपस्थिति से स्पष्ट होता है) बहरहाल परिणाम कुछ भी हो खुश हर कोई रहा। दर्जनों सीट गंवाने के बाद भी सुशासन बाबू को ताज मिल गया। कम सीट लाने वाली सहयोगी दलों का दबदबा और जमाई रुतबा सरकार में संपूर्ण कार्यकाल तक बना रहेगा। बागी घटक दल शीर्ष वोटकटवा पार्टी बनकर उभरी। घर के चिराग ने अपने घर को तो खाक किया ही साथ ही अधिकांश जगहों पर विरोधी का लालटेन भभका कर रोशन कर दिया। अंधियार विधायक मार्ग पर लालटेन की बजाय चिराग की तेज लौ ने ही तेज बंधुओं का मार्ग प्रशस्त करने में अहम् भूमिका निभाई। इसी तरह सीमांचल में सुरक्षित सीटों पर हैदराबादी बिरयानी ने रायता फैलाया और बड़ी पार्टी के हाथों में सुरक्षित पांच ऊंगली (सीट) पर कब्जा जमा लिया तो कुछ सीटों पर विपक्षी को प्रोमोट किया। कुल मिला कर अलादीन और चिराग के वोटकटवा जिन्न ने विपक्ष को फलने फूलने का मौका दे दिया।

