मुसीबतें लाख आऐंगी जिंदगी की राहों में रखना तू सबर,
मिल जाऐगी तुझे मंजिल इक दिन बस जारी रखना तू सफर।

जीवन में यात्रा का एक अलग ही अनुभव होता है। यात्रा करने से हर किसी व्यक्ति को देश-दुनिया के विषय में बहुत कुछ सीखने को मिलता है। इससे व्यक्ति एक सीमा के अंदर बंधे रहने से मुक्त होता और जीवन में नई चीजों के बारे में जानता है और अपनेां से जुडता हैं। मैं यात्रा को एक महान सीखने की प्रक्रिया के रूप में देख रहा हूं, एक अच्छे यात्री की कोई निश्चित योजना नहीं होती है, और यह पहुँचने का इरादा नहीं है। हम इस दुनिया के जंगल में सभी यात्री हैं और हमारी यात्रा में सबसे अच्छा जो हम पाते हैं वह एक ईमानदार दोस्त है। बिहार 3000 साल के इतिहास के साथ दुनिया का सबसे पुराना स्थान है। बिहार की विरासत और समृद्ध संस्कृति पूर्व भारत के सभी राज्यों में बिखरे हुऐ असंख्य प्राचीन स्मारकों से स्पष्ट होती है।‘मठ’ के अर्थ बाला ‘विहारा’ से बना ‘बिहार’ भारत का दूसरा सबसे बड़ा राज्य है और भौगोलिक दृष्टि से बारहवां। खूबसूरत फिजाऐं, अनगिनत चमकती पर्वत श्रेणियां, हरे-भरे जंगल, नदियां, झीलें, झरने और सजी-धजी हरियाली बरबस ही पर्यटकों को अपनी ओर लुभा लेती है। यहां पर कुदरत हर शय पर मेहरबान है, जिससे यहां के हसीन नजारें हर किसी को मोह लेते हैं। कुदरती खूबसूरती का दीदार होने पर हर नजारा दिल को तरोताजा कर देता है। यहां की अच्छी जलवायु ने पिछले कुछ वर्षो में दुनिया भर के लोगों को अपनें ओर आकर्षित किया है। यह ग्रेट अशोक, महावीर, आर्यभट्ट, गुरु गोबिंद सिंह, चंद्रगुप्त मौर्य, वात्स्यायन, चाणक्य, शेर शाह सूरी, मां तारा चंडी मंदिर और कई अन्य महापुरुषों और महान ऐतिहासिक निर्माणों की जगह है। हम हिंदुओं, जैनियों विशेषतः बौद्ध धर्म के लोगों के लिए धार्मिक केंद्र भी हैं। वह बोधगया ही था जहां भगवान बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ। भगवान महावीर, जो जैन धर्म के प्रतिस्थापक थे, वे भी यहीं पैदा हुए और उन्हें निर्वाण भी यहीं प्राप्त हुआ। बिहार राज्य, पश्चिम में उत्तर प्रदेश, उत्तर में नेपाल, पूर्व में पश्चिम बंगाल का उत्तरी भाग और दक्षिण में झारखंड की सीमाओं से लगा हुआ है। बिहार को झील, झरने और हॉट स्प्रिंग्स के रूप में प्राकृतिक सुंदरता के क्षेत्र प्रदान करता है। प्राचीनकाल के क्लासिक भारत में प्राचीन बिहार ताकत, शिक्षा और संस्कृति का केंद्र था।

नालंदा और विक्रमशिला शिक्षा के केंद्र थे, जो कि 5 वीं और 8 वीं शताब्दी में स्थापित किये गए थे और उस समय के सबसे पुराने माने जाने वाले अंतर्राष्ट्रीय विश्विद्यालयों में गिने जाते हैं। बिहार हिंदू, बौद्ध, जैन, सिख और इस्लाम जैसे विभिन्न धर्मों के सबसे पवित्र स्थानों में से एक है। यूनेस्को का विश्व विरासत स्थल ‘महाबोधि मंदिर’, भी बिहार में ही है। 1980 के दशक में महात्मा गांधी सेतु पटना, पूरे विश्व में किसी नदी पर बनाया गया सबसे लंबा पुल माना जाता था। पटना और राजगीर शहर बिहार के दो ऐतिहासिक शहरों के रूप में जाना जाता हैं। बिहार का इतिहास और सांस्कृतिक विरासत हिन्दू,जैन और मुख्यतः बौध धर्म के लिए बिहार एक बड़ा धार्मिक स्थल है। राजगीर बुद्ध और जैन पथप्रदर्शक महावीर, दोनों से जुड़ा हुआ है। यदि कोई व्यक्ति बौद्ध धर्म का अध्ययन करना चाहता है तो ‘बोधगया’ की यात्रा उसके लिए सबसे अच्छी साबित होती है। सासाराम और विशेष रूप से नालंदा, सबसे आकर्षक पर्यटक स्थलों में से एक हैं जो सामान्य पर्यटकों को दूर से लुभाते हैं। बिहार कई वर्षों से संस्कृति और शिक्षा का महत्वपूर्ण स्थान है। गुप्त साम्राज्य जो 240 ई. में मगध से उत्पन्न हुआ था, विज्ञान, गणित, खगोल विज्ञान, वाणिज्य, धर्म और भारतीय दर्शन के क्षेत्र में, भारत के सुनहरे युग के रूप में जाना जाता है। विक्रमशिला और नालंदा विश्वविद्यालय प्राचीन भारत में शिक्षा के सबसे पुराने और सबसे अच्छे केंद्रों में से एक थे। कुछ मानते हैं कि 400 ई. और 1000 ई. के बीच की अवधि में बौद्ध धर्म को बढ़ाने के लिए हिंदू धर्म ने बहुत सहारा दिया। ब्रम्हविहार के निर्माण के लिए हिन्दू राजाओं ने बौद्ध भिक्षुओं को बहुत से अनुदान दिए। बिहार के व्यंजन, मेले और त्यौहार बिहार में व्यंजनों की विविधता बिहार पर्यटन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। बिहार का भोजन मुख्य रूप से शाकाहारी है क्योंकि पारंपरिक बिहारी समाज बौद्ध और हिन्दू धर्म के अहिंसा के मूल्यों से प्रभावित हैं वे अंडे, चिकन, मछली और अन्य पशु उत्पाद नहीं खाते। सत्तू पराठा, इसमें भूने हुए चने के आटे को पराठे के अन्दर भरा जाता है और चोखा मैश किए हुए आलू का मसालेदार व्यंजन है। छठ, बिहार का एक प्राचीन और महत्वपूर्ण त्यौहार है, यह वर्ष में दो बार मनाया जाता है एक बार गर्मियों में, जिसे छठी का छठ कहा जाता है और एक बार दीपावली के बाद के एक सप्ताह के आसपास, जिसे कार्तिक छठ कहा जाता है। छठ में सूर्य भगवान की पूजा की जाती है। इसमें एक बार शाम को और एक बार सूर्योदय के समय बहती हुई नदी के किनारे या किसी भी बड़े जलाशय पर, दो बार पूजा की जाती है। छठ के अलावा भारत के सभी प्रमुख त्योहार जैसे मकर संक्रांति, सरस्वती पूजा और होली पूरी भव्यता के साथ मनाए जाते हैं। सोनपुर पशु मेला एक महीने चलने वाला समारोह है जो दीवाली के लगभग आधा महीने के बाद शुरू होता है। यह एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला माना जाता है। यह सोनपुर की गंडक नदी के किनारे आयोजित किया जाता है। विदेशी और देशी पर्यटकों की नई पसंद है राजगीर। हिमालय से भी पुरानी यहां की पंच पहाड़ियां, शांत झील, बल खाती नदियां, हरा-भरा इलाका, मंदिरों तथा ऐतिहासिक धरोहरों से भरा-पूरा यह मगध की प्राचीन राजधानी अगर पर्यटकों को पसंद आ रहा है। राज्य का सबसे समृद्ध पर्यटन स्थल राजगीर, नालंदा, पावापुरी और तपोवन है। बोधगया में अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा बनने के बाद विदेशी पर्यटकों का अधिक आना हो रहा है। यहां पर्यटन विकास की संभावनाएं बहुत हैं। केंद्रीय पर्यटन मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2009-10 में गोवा की तुलना में बिहार में अधिक पर्यटक आए हैं। बिहार में इस अवधि में 4 लाख 2 हजार विदेशी सैलानियों ने सैर की जबकि गोवा में केवल 3 लाख 2 हजार विदेशी पर्यटक आए। गोवा पहले से ही देश के टॉप 10 पर्यटन स्थल के रूप में स्थापित रहा है लेकिन अब यह जगह बिहार को मिल गई है जिसमें बोधगया, राजगीर और नालंदा आगे हैं। जैन धर्मावलंबियों के लिए भी राजगीर पवित्र तीर्थस्थल हैं। जैन धर्म के 20वें तीर्थंकर मुनि सुब्रत नाथ की यह जन्मभूमि और 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी की कर्मभूमि है। राजगीर के विपुलगिरि पहाड़ी की चोटी पर से तीर्थंकर महावीर ने जनकल्याण के लिए पहला उपदेश दिया था। राजगीर के समीप पावापुरी है जहां महावीर को निर्वाण की प्राप्ति हुई थी। यहीं, गृद्धकूट पहाड़ी है जहां भगवान बुद्ध नितदिन उपदेश देते थे। रत्नागिरि की चोटी पर जापान की धर्मगुरु भिक्षु निचिदात्सु फुजीई गुरुजी द्वारा विश्व शांति स्तूप की स्थापना की गई है। राजगीर के वैभारगिरि पहाड़ी पर सप्तवर्णी गुफा है, जहां महात्मा बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद पहली बौद्ध संगत हुई थी। सम्राट जरासंघ का अखाड़ा विख्यात है। राजगीर से महज 13 किलोमीटर उत्तर नालंदा है। वहां नालंदा विश्वविद्यालय था जिसके अवशेष अब भी मौजूद हैं। राजगीर कई नामों से जाना जाता है इनमें बसुमतिपुर, कुशाड़ापुर, वृहद्रथपुर, राजगृह और राजगीर प्रमुख हैं। यहां पांच पहाड़ियां विपुलगिरि, रत्नागिरि, उदयगिरि, स्वर्णगिरि और वैभारगिरि हैं। सभी पहाड़ियों के अपने महत्व हैं। पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए यहां हर साल खजुराहो की तर्ज पर राजगीर महोत्सव का आयोजन किया जाता है। राज्य के विभिन्न पर्यटन स्थलों में बोधगया, राजगीर, नालंदा, पटना, वैशाली, बेतला, विक्रमशिला, गया, सासाराम, बक्सर, पारसनाथ, पावापुरी, सुल्तानगंज, तोपचांची, मसानजोर, मधुबनी, सीतामढी, हाजीपुर, मुंगेर, रोहतास आदि।

अरेराज मन्दिर, पूर्वी चम्पारण, बोधगया मन्दिर, विष्णुपद मन्दिर (गया), महावीर मन्दिर (पटना), ब्रहमापुर मन्दिर (भोजपुर), अरण्य मन्दिर (आरा) तख्त श्री हरमिन्दर सिंह (पटना सिटी), गुरु तेगबहादुर गुरुद्वारा ( पटना सिटी ), गुरु का बाग, सासाराम मन्दिर, सेंट जोसेफ चर्च, बांकीपुर, पत्थर की मस्जिद, शेरशाह सूरी का मकबरा आदि पटना के अन्य दर्शनीय स्थल हैं। पश्चिमी चंपारण जिले में स्थित 335.65 वर्ग किमी. में फैला वाल्मीकि राष्ट्रीय उद्यान राज्य का एक मात्र राष्ट्रीय उद्यान हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि प्रियदर्शी अशोक के शासन काल में मगध साम्राज्य ने भारत को दिशा दी। बौद्ध धर्म में दीक्षित होने के बाद प्रियदर्शी अशोक ने अनेक ऐसे कार्य किए, जो आज भी अनुकरणीय हैं। भारत सरकार द्वारा ज्योग्राफिकल इंडिकेशन जर्नल में बिहार के कतरनी धान, भागलपुरी जर्दालु तथा मगही पान को राज्य के बौद्धिक सम्पदा अधिकार के अन्तर्गत रखा गया है। जर्दालु आम को भागलपुर का अद्वितीय उत्पाद माना गया है। माना जाता है कि जर्दालु आम को सर्वप्रथम अली खान बहादुर द्वारा इस क्षेत्र में लगाया गया था। विशेष सुगन्ध वाला यह आम हल्के पीले रंग का होता है। कतरनी धान उत्पादक संघ ग्राम-जगदीशपुर, भागलपुर के आवेदन पर कतरनी धान को भी पत्रिका द्वारा पंजीकृत किया गया है। कतरनी धान अपने आकार तथा सुगन्ध के लिए मशहूर है। नवादा जिला के देवडी गांव स्थित मगही पान उत्पादक कल्याण समिति के आवेदन को भी पत्रिका ने स्वीकार कर लिया। नवादा जिले के किसानों द्वारा परम्परागत रूप से मगही पान का उत्पादन किया जाता है। नवादा के अलावा औरंगाबाद और गया के भी किसान मगही पान की खेती करते हैं। मगही पान अपनी कोमलता एवं स्वाद के लिए प्रसिद्ध है। शाही लीची एवं मखाना को भी इस सूची में सम्मिलित कराने के प्रयास हैे। हम अपने अतीत के अवशेषों का संरक्षण नहीं करके अपने भविष्य की बुनियाद कमजोर कर रहे हैं। हम क्या होंगे के बारे में सोचने के पहले यह जानना जरूरी है कि हम क्या थे और क्या हैं? बिहार पर्यटन प्राचीन सभ्यता, धर्म, इतिहास और संस्कृति का अनूठा मेल है, जो भारत की पहचान है। यह राज्य भारत के कुछ महान साम्राज्यों जैसे मौर्य, गुप्त और पलस के उदय और उनके पतन का गवाह रहा है। 5वीं से 11वीं सदी के बीच यहां विश्व का प्रारंभिक विश्वविद्यालय विकसित हुआ। उसके अवशेष आज भी बिहार पर्यटन के आकर्षणों में से एक हैं। बौद्ध धर्म के पवित्र स्थल भी इसी राज्य में हैं। हिंदू धर्म, सिख धर्म और जैन धर्म के कुछ महत्वपूर्ण स्थान भी यहां हैं। बिहार की यात्रा और उसके पर्यटन में राज्य के विभिन्न हिस्सों में फैले कई पर्यटन स्थल शामिल हैं। भारत के उत्तरी भाग में पूर्वी गंगा मैदानों के साथ यह स्थित है। बौद्ध और जैन धर्म का उद्गम स्थल होने के कारण भारत के सांस्कृतिक इतिहास में बिहार का महत्वपूर्ण स्थान है। यहां आकर सैलानियों को मुगल और हिंदू वास्तुकला के शानदार नमूने देखने को मिल सकते हैं। बिहार में एक संपन्न प्राचीन सभ्यता का पोषण हुआ है और भारत के कुछ प्रमुख धर्मों जैसे बौद्ध और जैन धर्म का जन्म यहीं हुआ और साथ ही हिंदू धर्म का यहां प्रसार हुआ। इस राज्य का नाम ‘विहार’ शब्द से आया है। इसका अर्थ बौद्ध मठ होता है क्योंकि यह स्थान बौद्ध धर्म का प्रमुख अध्ययन केंद्र था। बिहार का इतिहास छह शताब्दी ईसा पूर्व तक जाता है। यहीं पर वैशाली में भगवान महावीर का जन्म हुआ था और भगवान बुद्ध को बोधगया में बोधि वृक्ष के नीचे ‘आत्मज्ञान’ मिला था। इस क्षेत्र ने कई साम्राज्यों का उदय और पतन देखा है गुप्त, पलस और उसके बाद मुस्लिम शासन। पवित्र गंगा नदी पूरे राज्य से दो हिस्सों में बहती है। इस वजह से राज्य की धरती बहुत उपजाउ है। बिहार भूमिगत खनिजों के मामले में बहुत समृद्ध है और यह राष्ट्रीय आय में बहुत महत्वपूर्ण योगदान देता है। बिहार को एक तीर्थस्थल के तौर पर भी जाना जाता है। राज्य में कई बौद्ध स्थल हैं जो तीर्थस्थलों की एक लंबी कतार बनाते हैं और बिहार की यात्रा करने वाला प्राचीन खंडहरों और पुरानी धार्मिक लिपियों के आकर्षण में खो जाता है। बड़ी संख्या में लोग बिहार की यात्रा करते हैं क्योंकि यह जैन और हिंदू धर्मों का पवित्र स्थल है। चित्रकारी की मधुबनी शैली बिहार की समृद्ध परंपरा है। बिहार अपने हस्तशिल्पों के लिए बहुत मशहूर है। पीढ़ी दर पीढ़ी बिहारी औरतें चित्रकारी की लोक कला को आगे बढ़ाती हैं। इनमें अक्सर पौराणिक कहानियां, स्थानीय देवताओं के चित्र और हिंदू देवी-देवताओं के चित्र बनाए जाते हैं। मानव सभ्यता को कपास की खेती तथा उनसे निर्मित सूती वस्त्र भी बिहार की ही देन है। 5 हजार वर्ष पूर्व हड़प्पा के अवशेषों में चांदी के गमले में कपास, करघना तथा सूत कातना और बुनती का पाया जाना इस कला की पूरी कहानी दर्शाता है। वैदिक साहित्य में भी सूत कातने तथा अन्य प्रकार के साधनों के प्रयोग के उल्लेख मिलते हैं। यूरोपीय लोगों को कपास की जानकारी ईसा से 350 वर्ष पूर्व सिकंदर महान के सैनिकों के माध्यम से हुई थी, तब तक यूरोप के लोग जानवरों की खालों से तन ढांकते थे। कपास का नाम भी बिहार से ही विश्व की अन्य भाषाओं में प्रचलित हुआ, जैसे कि संस्कृत में कर्पस, हिन्दी में कपास,कापस, यूनानी तथा लेटिन भाषा में कार्पोसस। इसलिए यह कहना कि कुछ तरह के परिधानों का आविष्कार बिहार में ही हुआ और बिहारी परिधानों का विकसित रूप ही हैं आज के आधुनिक परिधान तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। बिहारी वस्त्रों के कलात्मक पक्ष और गुणवत्ता के कारण उन्हें अमूल्य उपहार माना जाता था। खादी से लेकर सुवर्ण युक्त रेशमी वस्त्र, रंग-बिरंगे परिधान, कुछ परिधानों का आविष्कार तो बिहार में ही हुआ, लेकिन ग्रीक, रोमन, फारस, हूण, कुषाण, मंगोल, मुगल आदि के काल में भारतीय परिधानों की वेशभूषा में परिवर्तन होते रहे हालांकि परिवर्तन के चलते कई नए वस्त्र में प्रचलन में आए और पहले की अपेक्षा बिहारीयों ने इनमें खुद को ज्यादा आरामदायक महसूस भी किया लेकिन अंग्रेजों के काल में बिहारीयों की वेशभूषा बिलकुल ही बदल गई। पेंट, शर्ट, कोट और जींस को हम आधुनिक परिधान कहते हैं, पाश्चात्य नहीं। आधुनिकता और पाश्चात्यता में फर्क है। औद्योगिक क्रांति के दौर में ऐसे कई परिधान, वस्त्र या ड्रेस विकसित हुए जिन्हें आज हम पश्चिमी सभ्यता की देन कहते हैं। हालांकि हर तरह के परिधान पहनने में किसी भी प्रकार का कोई गुरेज नहीं, लेकिन यह भी समझना जरूरी है कि हम क्यों पहनते हैं वैसे परिधान, जो हमारी संस्कृति से मेल नहीं खाते हैं? भाषा, भूषा, भोजन और भजन से ही हमारी पहचान है। मुगल और अंग्रेजों ने पहले हमारी भाषा बदली, फिर हमारी भूषा बदली और अब हम मुगल, पाश्चात्य संगत, संगीत के दीवाने हैं। पिज्जा-बर्गर, कोला और बीयर पी-खाकर खुद को आधुनिक समझते हैं। बाजार से बिहारी व्यंजन, पेय पदार्थ और देसी तड़का लगभग गायब हो रहा है। प्राकृतिक जीवन के सिद्धांत को देखा जाए तो पोशाक के संबंध में हमारे बिहारी मनीषियों को इसकी गहरी समझ थी। वे इसके मनोविज्ञान को जानते थे। वे प्रकृति के इस नियम को जानते थे कि शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए वायु, सूर्य और प्रकाश का हमारी देह से जितना संपर्क होता रहे, उतना ही अच्छा है। आजकल तो तंग वस्त्र पहनने का प्रचलन है। जब स्त्री अधिक तंग वस्त्र पहनती हैं तो इनके रोम छिद्रों से ऑक्सीजन ग्रहण नहीं की जाती है जिसके परिणामस्वरूप त्वचा में मेलोनिन का स्तर गिरने लगता है। यही नहीं, पुरुषों और स्त्रियों में कई रोगों का कारण ही ये तंग वस्त्र बन सकते हैं। जांघ व बाजू पर अधिक तंग वस्त्र तनाव, अवसाद, अनिद्रा, मोटापा, अल्सर आदि को बुलावा देते हैं। नाभि पर तंग कपड़ों से अफरा, गैस, कोलायटिस, कब्ज, बवासीर आदि हो सकता है। छाती पर तंग वस्त्र हृदयरोग, श्वास फूलना आदि का कारण बन सकते हैं। त्वचा पर अत्यधिक रोम छिद्र होते हैं जिनसे कि त्वचा ऑक्सीजन लेती है। इसी तरह परिधान के संबंध में ऐसी कई बातें हैं, जो आप बिहारीयों से सिख सकते हैं। जीवन बहुत छोटा है, और हमारे पास इस अंधेरे सफर में हमारे साथ यात्रा कर रहे लोगों के दिलों को खुश करने के लिए बहुत अधिक समय नहीं है। तो प्यार करने के लिए जल्दी करे, और दयालू बनने के लिए भी जल्दी करें। लेखन एक यात्रा की तरह है किसी जगह पर जाना अच्छा है, अगर आप रुक कर थक गए हैं । हम वह है, जो हमारे विचारों ने हमें बनाया है इसके बारे में ध्यान रखें आप क्या सोचते हैं । शब्द बाद में आते हैं विचार रहते हैं वे दूर की यात्रा करते हैं ।
राजगीर में टहलते हुए यह अहसास गर्व से भर देता है कि कभी इस भूमि पर बुद्व के पांव पड़े थे। वहां की पहाडियों ने उनका साक्षात्कार किया होगा और आज हम उन पहाडियों को देख रहे हैं। राजगीर में जापान और चीन के सहयोग से काफी विकास हुआ है। जापान और चीन के साथ ही कोरिया, सिंगापुर, थाइलैंड और पूर्व एशिया के अनेक देश नालंदा और राजगीर के विकास में रुचि दिखा रहे हैं। अगर सचमुच उनके सहयोग से नालंदा-राजगीर में आधुनिक सुविधाओं का प्रावधान किया जाए तो मेरी स्पष्ट राय है कि अनेक पर्यटक वहां जाना पसंद करेंगे। बिहार के पास अतीत की अद्भुत थाती है। नालंदा और राजगीर इस थाती के रत्न हैं। बिहार सरकार और पर्यटन विभाग के संबंधित अधिकारियों को अपने गौरवशाली अतीत के संरक्षण के साथ ही उन स्थलों को पर्यटकों के लिए सुविधाजनक बनाने पर ध्यान देना चाहिए। पटना में रेलवे स्टेशन, हवाई अड्डा और अन्य प्रमुख चैराहों पर बिहार के अतीत का उल्लेख होना चाहिए। हवाई अड्डे पर ही अगर किसी को ऐतिहासिक महत्व के स्थलों की जानकारी दी जाए तो वह अवश्य ही इन ऐतिहासिक नगरों को देखने के लिए प्रेरित होगा और अंत में जिन्दगी एक सफर की तरह है जिसकी आखिरी मंजिल मौत है। लेकिन कई लोग इस सफर को शानदार तरीके से जीते हैं और कई लोग एक बोझ समझ कर। इस सफर में सबको बराबर का मौका मिलता है आगे बढ़ने का और खुद को साबित करने का। कुछ अपना मुकाम बना लेते हैं और कुछ गुमनाम रह जाते हैं और सफर जारी रहता है।
