बंगाल में बीजेपी के अध्यक्ष सहित दीदी और कॉंग्रेस के नेताओं पर हमला , लखनऊ में कश्मीरियों पर हमले, दिल्ली के आसपास किसानों पर सरकार का हमला, किसान पर जवान का हमला, बिहार में नेताओं पर हमला आदि खबरों से अत्यंत व्यथित हूँ। पर क्या हम और आप ने कभी इस बारे में सोचा है की हमारी भावना, संवेदना क्यों उन निजामों के हाथों में है जो कभी भी देश में शांति, अमन और खुशहाली नहीं चाहते।

अब आप देखिये ना क्यों किसी को हिंदुत्व, क्यों किसी को इस्लाम, तो क्यों किसी को ईसाईयत खतरे में लगता है? इन सारे धर्मों से ऊपर जो धर्म है वह है मानवता का जिसकी आज फिक्र हममें से शायद ही किसी को है! आज कहीं धर्म तो कहीं नस्लवाद की लड़ाई जारी है। भारत में धर्म और नक्स्लवाद की लड़ाई को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता। आज देश की जनता की आँखें तरस गई इस बात के लिए कि जिन निजामों को हमने अपना बहुमूल्य वोट देकर सत्ता के शीर्ष पर पहुँचाया। कभी वह जनता से किये गए वादों को पूरा करने हेतु लड़ाई करता दिखा है , कभी अपने क्षेत्र की जनता के लिए सस्ती शिक्षा, बेरोजगारी, स्वास्थ्य, बिजली, पानी जीवन सुरक्षा के मसले के हल न होने के कारण अनशन करता दिखता है ।
हाँ या ना. पर आज के दौर में फिजूल में देश के हर कोने में धर्म और आतंकवाद को लेकर बहस छिड़ी हुई है। धर्मांधता की इस लड़ाई में आज तक अनगिनत जानें जा चुकी हैं और न जाने कितनी आगे भी जाएंगी। आज देश में हर व्यक्ति सोशल मीडिया पर मानवता की बड़ी बड़ी बातें तो करता दिख जाता है, पर क्या कभी किसी ने ईमानदारी से उसी मानवता की सेवा के लिए अपनी सोच बदलने की कोशिश की है ? कभी नहीं, क्योंकि हमारी मानसिकता में विरोधावाद गहराई तक घर कर चुकी है। सनद रहे कि राजनीति का उद्देश्य है जनता की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए उनके हित में काम करना और धर्म का कार्य है . लोगों को सदाचारी और प्रेममय बनाना परंतु जब भी धर्म और राजनीति की घाल-मेल होता है तब हमें कपटी धार्मिक नेता के मायाजाल का दर्शन होते हैं। राजनीति और धर्मय ये दोनों ही विषय समाज के हर वर्ग के जीवन को प्रभावित करने वाले विषय हैं जो कभी भी एक दूसरे से अलग नहीं हो सकते मगर आज अपने निजामों की दशा और दिशा के बारे में सोच बदलने की आवश्यकता है। एक धार्मिक व्यक्ति, जो सदाचारी और स्नेही है, अवश्य ही जनता के हित को ध्यान में रखेगा और एक सच्चा निजाम बनेगा। एक सच्चा निजाम केवल सदाचारी और स्नेही ही हो सकता है, इसीलिए उसमें धार्मिकता का भाव होना ही चाहिए। पर यह भी एक कटु सत्य है कि राजनीतिज्ञों को इतना भी कट्टर धार्मिक नहीं होना चाहिए कि वह अन्य धर्मों को मानने वालों की धार्मिक स्वतंत्रता, उसकी आस्था और उपासना की विधियों पर बंदिश लगा दे। मै मानता हूँ कि धर्म के बिना समर्थ और सार्थक राजनीति नहीं हो सकती पर हमारे राजनीतिज्ञों को राजनीति के धर्म का पालन करना होगा. ऐसा न हो कि सिर्फ धर्म की ही राजनीति की जाय।
भारतीय राजनीति के इतिहास में देश की आजादी के बाद से अब तक जिस तरह से देश में निजामों ने राजनीति की यह अत्यंत सोचनीय है। आज सत्ता पर आसीन राजनेता है या फिर विपक्ष में राजनीति के धर्म और सिद्धान्तों को तिलांजली दे धर्म की राजनीति कर सत्ता पर काबिज होने की जुगात में किसी भी हद तक जाने का जमाना लग रहा है। क्या वे सही मायने में राजनीति के धर्म को निभा रहे हैं? शायद नहीं। वर्तमान दौर में हमारे निजामों ने राजनीति का धर्म भुला दिया व समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को तिलांजली दे दिया है। देश का हर नागरिक चाहे वह किसी भी समुदाय से हो, किसी भी धर्म में आस्था रखता हो, उसे किसी भी तरह का दंगा, फसाद, खून-खराबा अस्वीकार्य है क्योंकि उन्हें पता है की उसमें सिर्फ और सिर्फ मानवता और मासूमियत का ही कत्ल होता है। आज हम एक ऐसे माहौल में जी रहे हैं जहां घिसी पिटी परम्पराओं को तोड़ उससे आगे की सोचना हमारे आचरण में नहीं है या अंधविश्वासों की बंदिशों से आजाद होना हमारे वस में नहीं दिख रहा है । यही कारण है कि कुछ हद तक आज हम अपने मूल धर्म और उसकी परिभाषा को भूल चुके हैं जो ना केवल अशोभनीय है वरण विचारणीय भी!