भारत का कृषि निर्यात आज जिस संकट से गुजर रहा है, वह किसी अचानक आई आंधी का नतीजा नहीं, बल्कि लंबे समय से पनप रही उस व्यवस्था का विस्फोट है, जिसमें किसान की मेहनत और कॉरपोरेट का मुनाफा दो अलग-अलग दिशाओं में बंट चुके हैं- रितेश सिन्हा

वित्त वर्ष 2025-26 में चावल निर्यात का 7.5 प्रतिशत गिरकर 11.53 बिलियन डॉलर पर सिमटना केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि उस सच्चाई का खुला बयान है जिसे लगातार दबाया गया—कि नीतियां अब खेत से ज्यादा कॉरिडोर में बन रही हैं। सरकार इस गिरावट को वैश्विक हालात का परिणाम बताकर बच निकलना चाहती है, लेकिन चीन द्वारा भारतीय चावल को ‘जीएमओ’ बताकर खारिज करना उस पूरे तर्क को ध्वस्त कर देता है। यह महज एक तकनीकी विवाद नहीं, बल्कि भारत की साख पर सीधा प्रहार है। और उससे भी बड़ा सवाल यह है कि इस प्रहार के सामने सरकार की आवाज इतनी धीमी क्यों है? जिस देश में जीएमओ चावल की व्यावसायिक खेती तक की अनुमति नहीं, उसी देश के चावल को विदेशी बंदरगाहों पर ‘संदिग्ध’ बना दिया जाता है, जवाब में सिर्फ कागजी सफाई दी जाती है।
यहां मामला केवल चीन की चालाकी का नहीं है, बल्कि भारत की प्रतिक्रिया की कमजोरी का भी है। यदि तथ्य भारत के पक्ष में हैं, तो फिर यह आक्रामकता कहां है, जो इस झूठे नैरेटिव को अंतरराष्ट्रीय मंच पर तोड़ सके? या फिर यह मान लिया गया है कि नुकसान झेलने वाले केवल किसान और छोटे निर्यातक हैं, इसलिए यह मुद्दा राजनीतिक प्राथमिकता नहीं बनता? सरकार की नीतियों का विरोधाभास इस पूरे विवाद को और संदिग्ध बना देता है। एक तरफ यह दावा कि देश में जीएमओ चावल नहीं है, और दूसरी तरफ जीनोम-एडिटेड फसलों को दी गई छूट—यह दोहरा रुख न केवल भ्रम पैदा करता है, बल्कि प्रतिस्पर्धी देशों को भारत के खिलाफ एक सुविधाजनक हथियार भी दे देता है।
यह कूटनीतिक संयम है या असहज चुप्पी, क्या भारत अपने ही दावे पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लड़ने से हिचक रहा है, या फिर यह मान लिया गया है कि इस टकराव की असली कीमत चुकाने वाले किसान और छोटे निर्यातक हैं इसलिए इसे प्राथमिकता नहीं बनाना जरूरी नहीं? सरकार की नीतियों का विरोधाभास इस पूरे विवाद को और विस्फोटक बना देता है। एक तरफ यह दावा कि देश में जीएमओ नहीं है, दूसरी तरफ जीनोम-एडिटेड फसलों को दी गई छूट—यह दोहरा रुख न केवल भ्रम पैदा करता है, बल्कि विरोधियों को हमला करने का खुला मौका भी देता है, अंतरराष्ट्रीय बाजार में यह फर्क तकनीकी नहीं, बल्कि रणनीतिक हथियार बन जाता है और भारत उसी में उलझा हुआ दिखता है।
असली कहानी यहीं से शुरू होती है। इस पूरे संकट के पीछे एक और परत है, जो कहीं ज्यादा असहज है। कृषि निर्यात का ढांचा अब खेत और मंडी से निकलकर बंदरगाह और लॉजिस्टिक्स के उस नेटवर्क में सिमट गया है, जिस पर कुछ चुनिंदा कॉरपोरेट समूहों की मजबूत पकड़ है। अडानी समूह का नाम इस संदर्भ में बार-बार उभरता है और यह उभार केवल व्यापारिक विस्तार नहीं, बल्कि उस बदलते समीकरण का संकेत है, जिसमें नियंत्रण धीरे-धीरे केंद्रीकृत होता जा रहा है। क्या यह महज इत्तेफाक है कि जब छोटे निर्यातक चीन के फैसलों से जूझते हुए डूब रहे हैं, तब बड़े कॉरपोरेट ढांचे पर इसका असर सीमित दिखता है? क्या यह भी संयोग है कि नीतिगत प्रतिक्रियाएं इतनी धीमी हैं कि नुकसान नीचे तक पहुंच चुका होता है, लेकिन ऊपर की संरचना लगभग अप्रभावित रहती है?
सवाल किसी एक समूह का नहीं, बल्कि उस मॉडल का है, जो बनता हुआ नजर आ रहा है जहां जोखिम का बोझ नीचे और मुनाफे की सुरक्षा ऊपर केंद्रित होती जा रही है। और सरकार की चुप्पी इस मॉडल को और मजबूत करती हुई दिखती है। इस पूरे परिदृश्य में सबसे बड़ा नुकसान उस किसान का है, जिसे हर चुनाव में केंद्र में रखा जाता है, लेकिन हर संकट में सबसे पहले किनारे कर दिया जाता है। वह फसल उगाता है, लागत उठाता है, मौसम से लड़ता है, लेकिन जब उसकी उपज अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहुंचती है, तो उसके भाग्य का फैसला किसी और के हाथों में होता है। न्यूनतम समर्थन मूल्य उसकी सुरक्षा नहीं, उसकी सीमा बनकर रह जाता है—क्योंकि असली खेल निर्यात में है, और वही सबसे ज्यादा अस्थिर हो चुका है।
धीरे-धीरे एक ऐसी तस्वीर उभर रही है, जिसमें किसान केवल उत्पादक है, लेकिन बाजार, मूल्य और मुनाफे का पूरा तंत्र उससे दूर जा चुका है। यह केवल आर्थिक असंतुलन नहीं, बल्कि सत्ता, नीति और पूंजी के उस गठजोड़ का परिणाम है, जिसमें प्राथमिकताएं बदल चुकी हैं—और शायद स्वीकार भी नहीं की जा रहीं। सवाल सीधा है और असहज भी—क्या यह पूरा संकट महज एक ‘जीएमओ विवाद’ है, या फिर यह उस बड़े बदलाव का संकेत है, जहां कृषि क्षेत्र पर नियंत्रण धीरे-धीरे कुछ हाथों में सिमटता जा रहा है? अगर यह केवल विवाद नहीं, बल्कि प्रवृत्ति है, तो आने वाला समय और खतरनाक होगा। तब किसान केवल खेत में बचेगा, और खेती का असली नियंत्रण कहीं और चला जाएगा।
अगर ऐसा होता है तो यह केवल कृषि संकट नहीं होगा—यह उस भरोसे का संकट होगा, जिस पर देश की पूरी खाद्य व्यवस्था और लोकतांत्रिक संतुलन टिका हुआ है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि ‘जीएमओ’ का यह विवाद एक चेतावनी नहीं, बल्कि एक विस्फोट है, जिसकी गूंज खेतों से ज्यादा सत्ता के गलियारों में सुनाई दे रही है।
