लोकतंत्र और तंत्र पर सवाल ही सवाल फिर कैसी जीत ,कैसी हार और कैसा लोकतंत्र? बंगाल का खेल

बंगाल की जीत निश्चित तौर पर भाजपा की बड़ी जीत है। बंगाल चुनाव भी बीजेपी के उस कौशल का नमूना है जिसके जरिए एक राज्य का चुनाव जीतने के लिए वह अपनी हर वैध – अवैध शक्ति को दाव पर लगा देती है। इसमें सही गलत का जिक्र अलग से होगा। क्योंकि आखिरी मकसद सत्ता है और सत्ता के जरिए उन बड़ी आर्थिक शक्तियों को लाभ पहुंचाना है जो चुनाव में आपकी मदद करते हैं। हजारों करोड़ का आपका खर्चा संभालते हैं।

भारत में गणतंत्र की यही विडंबना है। हर बड़े दल को आखिर में कांग्रेस बन जाना है। और फिर हर नए कांग्रेस को अपने अंतर्विरोध का शिकार हो जाना है। एक भी जनता से साजिशतन वोट का खेल होता है तो इसे लोकतंत्र नहीं कहा जा सकता है , इसे संविधान परत तो नहीं ही कहा जा सकता है । लोकतंत्र का मतलब लोगों के द्वारा चुनी गई तंत्र की सरकार और अगर इसपर सवाल है तो मानो लोकतंत्र पर सवाल है । अब पश्चिम बंगाल पर नजर डालते हैं ,पश्चिम बंगाल में बीजेपी और टीएमसी के बीच वोट प्रतिशत में 5 फीसदी का फर्क है. लेकिन सीटों में 125 का फर्क है। निश्चित तौर पर यह बात चौंकाती है कि क्या 5 प्रतिशत के स्विंग से 125 सीटों का फर्क हो सकता है? यह बहुत चौंकाने वाला तथ्य है ऐसा हरियाणा विधानसभा चुनावों में देखा गया था अब अगर इस अंतर को दोनों पार्टियों को मिले कुल वोट के संदर्भ में देखा जाये तो अंतर आता है 32 लाख का। दूसरे शब्दों में 32 लाख वोट के अंतर ने 125 सीटों का फर्क पैदा किया. आपको याद हो कि बंगाल चुनाव में SIR में 27 लाख वोट काटे गये और 5 लाख नये वोटर जोड़े गये। इस आंकड़े को हम कुछ देर के लिये अलग रख देते हैं। असली खेल किया है अन्य ने. चुनाव आयोग के मुताबिक बंगाल चुनाव में अन्य को 27 लाख से ऊपर वोट मिले हैं. ये अन्य कौन हैं? चुनाव विश्लेषक और बीजेपी समर्थक गला फाड़कर चिल्ला रहे हैं कि चुनाव में बहुत ध्रुवीकरण हुआ तभी 5 प्रतिशत का स्विंग हुआ तभी टीएमसी 81 सीटों पर सिमट गई और बीजेपी 206 तक चली गई। यहां तक ठीक है, समस्या इसके आगे है। सवाल है कि अगर इतना ध्रुवीकरण था तो 27 लाख वोट अन्य को कैसे मिल गये?

बीजेपी और टीएमसी के बीच 32 लाख वोट का फर्क है। चूंकि बीजेपी की सीट कम नहीं हुई तो यह माना का सकता है कि 27 लाख वोट जो अन्य को मिले हैं उनमें से ज्यादातर टीएमसी के ही थे। या तो ध्रुवीकरण की थ्योरी गलत है या तो 27 लाख अन्य को मिलने वाला वोट किसी फर्जीवाड़े का नतीजा है पश्चिम बंगाल का चुनाव बहुत करीने से चुराया ग्राउंड लेवल पर ममता बनर्जी के खिलाफ और भाजपा के पक्ष में कोई बड़ा माहौल कहीं नजर नहीं आया, 206 सीट जैसा बहुमत बिना जमीनी माहौल के संदेह पैदा करता है। यह ठीक है कि बीजेपी ने अपने कौशल से बंगाल का चुनाव जीत लिया है। मगर क्या इसका मतलब यह है कि चुनाव बिल्कुल फेयर हुए?

इस देश के नागरिकों को खुद से ये सवाल पूछने चाहिए कि

  1. क्या SIR की प्रक्रिया निष्पक्ष थी? चुनाव आयोग ने निष्पक्ष अंपायर की भूमिका निभाई? क्यों 27 लाख वोटरों के दावों को अधर में छोड़कर चुनाव हुए?
  2. क्या यह उचित है कि किसी राज्य के चुनाव में केंद्र सरकार अपने पूरे दल बल के साथ उतर जाए, एक ही लक्ष्य हो, बंगाल जीतना।
  3. सरकार हमारी है, पूरे देश की है, किसी पार्टी की नहीं।
  4. क्या यह पार्टी स्वायत्त कही जाने वाली केंद्रीय एजेंसियों का अपने पक्ष में खुला इस्तेमाल नहीं करती?
  5. क्या चुनाव के वक्त केंद्र सरकार अपने हिसाब से उस राज्य के लिए नीतियां और कार्यक्रम नहीं बनाती? क्यों आचार संहिता लागू होने से पहले केंद्रीय मंत्रियों के सरकारी दौरों की भरमार होने लगती है?
  6. आखिर में क्या यह चुनाव बराबरी का मुकाबला था?

असम में भाजपा के पक्ष में महौल था केरल में कांग्रेस के पक्ष में महौल था लेकिन बंगाल में आखिरी समय भी ऐसा कुछ नहीं था। देश में चुनाव की ईमानदारी निष्पक्षता और पारदर्शिता पर सवालिया प्रश्नचिन्ह विपक्ष द्वारा लगाया जा रहा है? जिसे नकारा नहीं जा सकता है। जवाब मत दीजिए, मगर सोचिए। क्योंकि हमारे लोकतंत्र का भविष्य इन्हीं सवालों पर है। यह किसी एक पार्टी या सरकार की बात नहीं है। सरकारें बदलती रहेंगी, मगर बुरी परंपराएं जारी रहेंगी, यह कहते हुए कि फलां ने किया तो हम क्यों न करें। इसलिए एक सजग नागरिक के तौर पर यह सोचना हमारा काम है। जीते हुए दल को खुदा बना लेने से पहले यह सोचना हमारा काम है।

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