प्रतीक की मौत उनकी दोनों नन्हीं बेटियों के जीवन पर जैसे दुःख का पहाड़ बनकर टूटी है। किसी बच्चे के सिर से पिता का साया उठ जाना सिर्फ एक पारिवारिक क्षति नहीं होती, वह उसके पूरे भावनात्मक संसार का बिखर जाना होता है।

अब जब वे स्कूल से लौटेंगी, कोई दरवाजे पर वैसी मुस्कान लेकर इंतजार नहीं करेगा। कोई उन्हें वैसे दुलार नहीं करेगा उनकी छोटी-छोटी बातों पर वैसे खुलकर नहीं हंसेगा। बचपन की सबसे बड़ी त्रासदी यही होती है कि बच्चे अपने दर्द को शब्दों में ठीक से कह भी नहीं पाते, बस चुपचाप भीतर से बदलने लगते हैं। ईश्वर उन मासूम बच्चियों को यह असहनीय दुःख सहने की शक्ति दे।प्रतीक जिसको जीवन में कुछ भी स्थाई नहीं मिला, न पिता मिले और न ही कृष्ण-वंश। प्रतीक यादव की कहानी सिर्फ एक राजनीतिक परिवार के सदस्य की कहानी नहीं है। ये उस इंसान की कहानी है जो जन्म से ही पहचान के संकट में जीता रहा। 1987 में जन्मे प्रतीक, साधना गुप्ता और चंद्रप्रकाश गुप्ता के बेटे थे।1990 में माता-पिता का तलाक हो गया। फिर 2003 में जब मुलायम सिंह यादव ने साधना गुप्ता से विवाह किया, तब 16 साल की उम्र में प्रतीक को “यादव” नाम मिला लेकिन नाम मिल जाने से समाज अपनाता नहीं। जिम में पसीना बहाने वाले को इटावा और मैनपुरी में घुसने तक नहीं दिया गया, तो वे सिमट हो गये। लखनऊ, जिम और बाराबंकी वाले विशाल फार्महॉउस तक। इश्क किया, लेकिन वह भी टूट गया। तलाक की नोटिस पर मचा हंगामा। ससुराल से भारी कुख्याति मिली। ससुर तो ऐसा मिला कि इतनी प्रॉपर्टी को बेताब रहा जैसे पत्रकार न हो, प्रॉपर्टी डीलर हो। सपा परिवार हो या यादव बिरादरी, प्रतीक को कभी वैसी स्वीकार्यता नहीं मिली, जैसी अखिलेश को मिली। वजह सिर्फ राजनीति नहीं थी, उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि भी थी। वो हमेशा परिवार के भीतर मौजूद होकर भी बाहर वाले व्यक्ति की तरह देखे गए। फिर जीवन में आईं अपर्णा सिंह यादव। लगा कि शायद अब एक स्थिर पहचान बनेगी। लेकिन राजनीति यहां भी पीछा नहीं छोड़ती।

अपर्णा यादव की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं और बीजेपी की रणनीतियां, दोनों ने इस रिश्ते को भी सार्वजनिक चर्चा और दबाव के बीच ला खड़ा किया। बीजेपी ने भी अपर्णा को उतनी ही जगह दी, जितनी अखिलेश यादव को असहज करने के लिए जरूरी थी। प्रतीक शायद जीवन भर दो महत्वाकांक्षाओं के बीच फंसे रहे,पहले माँ की राजनीतिक-सामाजिक स्वीकार्यता की लड़ाई,फिर पत्नी की राजनीतिक पहचान की लड़ाई। सास की हरकतों से जब आम आदमी में छीछालेदर फ़ैल गई, तो एकांतवासी प्रतीक और घुनने लगा और आज 38 बरस के प्रतीक यादव की लखनऊ में मौत हो गयी।
लेकिन मौत को लेकर बेहिसाब चर्चाएं शुरू होने लगी है। यानी शांत जीवन वाले प्रतीक पर मौत के बाद जबरदस्त हंगामा शुरू हो गया है। हाँ, इतना जरूर है कि अखिलेश यादव अस्पताल चले गये, दाह संस्कार में बैठे बावजूद इतना कि अपर्णा ने अखिलेश के जीवन में खासे कांटे बोये। एक ऐसे दांव पांसे फेंके। मगर न तो उनका कोई लाभ मिला, न अखिलेश को कोई नुकसान। हाँ, अब अकेली हो गयी है अपर्णा। अफवाहें जीवन भर धूम्र नृत्य करेंगी । और इस पूरे सफर में, सबसे ज्यादा जो चीज़ अधूरी रह गई…वो थी खुद “प्रतीक” की अपनी पहचान। भगवान प्रतीक को देवतालोक में उसके हिस्से का उचित जगह दें ,,, नमन