शिक्षा का अधिकार कानून 2009 को लागू हुए 15 साल हो गए हैं। इन सालों में बिहार के शासकीय पाठशालाओं में कई तरह के सकारात्मक परिवर्तन हुए हैं।

इस कानून की सबसे बड़ी उपलब्धि पाठशालाओं में 6 से 14 वर्ष के बच्चों का लगभग सौ फीसदी नामांकन हैं, सघन व दूर-दराज के टोलों गांवों से लेकर शहर की बस्तियों तक लगभग हर बसाहट या उसके करीब स्कूल खुल गए हैं। मगर कानून के 15 साल होने के बाद भी शिक्षा को लेकर जितना परिवर्तन होना चाहिए था, वो देखने को नहीं मिल रहा है। कानून के उद्देश्यों को प्राप्त करने में अनेकों चुनौतिया और रुकावटें हैं। इन्हीं चुनौतियों और रुकावटों पर भारत के नियंत्रक महालेखापरीक्षक (कैग) की 2018 में जारी रिपोर्ट प्रकाश डालती है। सबसे पहले नामांकन की स्थिति क्या है देखें। शिक्षा अधिकार कानून के अनुसार 6 से 14 साल के प्रत्येक बच्चों को निशुल्क और अनिवार्य रूप से शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार देता है। बिहार सरकार द्वारा बच्चों को पाठशाला में दाखिला के लिए ‘स्कूल चलो अभियान’ चलाया जा रहा है, जिसके चलते वैसे तो नामांकन की दर बढ़ी है, लेकिन यह 2010-11 की तुलना में कम हुई है। बीच में ही पाठशाला छोड़ने वालों बच्चों की आंकड़े देखें तो 2010-16 में 18.25 लाख बच्चों ने 5वीं कक्षा के बाद पाठशाला छोड़ दिया, जबकि 9.09 लाख बच्चों ने 7वीं के बाद 8वीं कक्षा में नामांकन किये बिना पाठशाला छोड़ दिया था।
सरकार द्वारा अनेकों योजनाओं जैसे निःशुल्क पाठ्यपुस्तक, मध्याह्न भोजन, निशुल्क ड्रेस, सायकिल प्रदान करने के बावजूद भी परिवारों का रुझान बच्चों को सरकारी स्कूलों के बदले निजी पाठशालाओं में भेजने की रही है। इसका प्रमुख कारण गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, शिक्षकों, आधारभूत सुविधाओं की कमी है। इसी तरह इस कानून के अनुसार विद्यालय से बाहर बच्चे को अपने आयु के अनुसार कक्षा में प्रवेश दिया जाएगा, जिसके लिए बच्चे को विशेष प्रशिक्षण (कम से कम 3 माह व अधिकतम दो वर्ष) दिया जाएगा, लेकिन रिपोर्ट के अनुसार 2013-16 के दौरान प्रशिक्षण के लिए नामांकित विद्यार्थियों की संख्या निर्धारित लक्ष्य से कम थी जिसके कारण विद्यालय से बाहर बच्चों को मुख्यधारा में लाया नहीं जा सका। रिपोर्ट में बच्चों के पुनरावृत्ति रोकने की भी स्थिति सामने आई है। शिक्षा अधिकार कानून के अनुसार बच्चों को किसी भी कक्षा में रोका नहीं जा सकता पर प्रदेश में 2010-16 के दौरान कक्षा एक से पांच में 35 लाख और कक्षा छह से आठ में 18.10 लाख विद्यार्थियों को पुनरावृत्ति रोका गया था।
अब आते हैं पड़ोस में स्कूल की व्यवस्था पर। शिक्षा अधिकार कानून के अनुसार प्रत्येक बसाहट के पड़ोस में पाठशाला होनी चाहिए, इनकी संख्या में बढ़ोतरी तो हुई है, पर कैग रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश सरकार अनेक बसाहटों के लिए पड़ोस में शाला प्रदान करने में असमर्थ रही है और 15-16 में प्रदेश में 105,198 बसाहटों के लिए 83,872 प्राथमिक पाठशाला ही थे। राज्य सरकार ने शेष बचे बसाहटों के लिए न तो पड़ोस के शाला की व्यवस्था की और न ही अन्य पाठशालाओं में पहुंच के लिए पर्याप्त व्यवस्था की गयी। अब आते हैं शिक्षकों की स्थिति पर। प्रदेश सरकार शिक्षा अधिकार कानून के निर्धारित मानकों के अनुसार पाठशालाओं में शिक्षकों की उपलब्धता नहीं कर सकी और बड़ी संख्या में इनके पद रिक्त हैं। प्राथमिक पाठशालाओं में इसकी पूर्ति संविदा शिक्षकों और अतिथि शिक्षकों से करने का प्रयास किया गया, लेकिन तब भी मानक पूरा नहीं हो सका।
रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में प्राथमिक शालाओं में 124000 और माध्यमिक शालाओं में लगभग 271000 शिक्षकों की कमी थी। वहीं कई जिलों जैसे मुंगेर, भागलपुर और दरभंगा के प्राथमिक पाठशाला में 1381 शिक्षक मानकों से अधिक थे। 2011-12 में माध्यमिक शाला में जहाँ 2 शिक्षकों वाले 1388 पाठशाला थे, वो 2015-16 में बढ़कर 17937 हो गए। अतिथि शिक्षकों की नियुक्ति एक वैकल्पिक और तात्कालिक व्यवस्था थी, न कि किसी पद के विरुद्ध पदस्थापना परन्तु सरकार ने इसे पूर्णकालिक सेवा का विकल्प बना लिया। इन अतिथि शिक्षकों के चयन की अहर्ता अलग थी जिसके चलते इनसे गुणवत्तापूर्ण शिक्षण की उम्मीद करना बेमानी है। शिक्षकों को शैक्षणिक कार्यों के अलावा अन्य कामों की जिम्मेदारी सौप दी जाती है, जबकि कानून में साफ लिखा है कि जनगणना, आपदा और निर्वाचन से सम्बंधित कार्यों के अलावा किसी अन्य कार्यों में शिक्षकों का उपयोग नहीं किया जा सकता है। निर्वाचन नामावली सुधार से सम्बंधित अन्य काम शिक्षकों को छुटटी के दिन, अशैक्षणिक दिवस और अशैक्षणिक समय के बाद करना है, लेकिन इसके बावजूद शिक्षकों को शैक्षणिक समय में अशैक्षणिक कार्यों की जिम्मेदारी दी जाती है।
राज्य शिक्षा केंद्र ने जून 2011 में निर्देश जारी किया था कि बालक और बालिकाओं को प्रत्येक साल दो जोड़ी ड्रेस की लागत राशि 400 रुपए की सहायता प्रदान की जायेगी, जो हर साल जून माह तक जारी कर दी जायेगी, लेकिन इसमें भी अव्यवस्था रही और समय से सहायता प्रदान नहीं की गयी। कानून में शिकायत और निगरानी तंत्र की व्यवस्था की गयी है, लेकिन ये अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन सही तरीके से नहीं कर रहे हैं। राज्य सलाहकार परिषद् को हर साल 4 बैठक करनी है, लेकिन 2012 से 2016 तक 16 बैठकों में से केवल 5 बैठकें ही की गयी। पाठशाला प्रबंधन समिति के ज्यादातर सदस्यों को उनकी जिम्मेदारी और भूमिका की जानकारी नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार बच्चों की शिक्षा की स्थिति को लेकर सरकार द्वारा राज्य और जिला स्तर पर जारी आकंड़ों में ही विसंगतियां देखने को मिलती हैं। राज्य द्वारा सभी पात्र बच्चों की पहचान न की जा सकी और उनका पता भी नहीं लगाया जा सका। कानून में निर्धारित न्यूनतम अधोसंरचना और शिक्षकों की उपलब्धता के मानकों को अभी भी प्राप्त नहीं किया जा सका है। अगर प्रदेश की सरकार शिक्षा के अधिकार कानून के लक्ष्य को प्राप्त करना चाहती है तो उसे कानून में प्रदान मापकों की जल्द ही पूर्ति करना होगा। शिक्षा विभाग को वंचित तबकों के बच्चों की पहचान कर पाठशाला में दाखिला के लिए सघन प्रयास करना होगा। पाठशालाओं के अधोसंरचना की पूर्ति पर विशेष प्रयास करना होगा।
शिक्षकों के रिक्त पदों को भरने होंगे जिससे छात्र शिक्षक अनुपात मानकों के हिसाब से हो और एकल विद्यालय समाप्त हो सके। माध्यमिक पाठशालाओं में विषयवार शिक्षकों की नियुक्ति करनी होगी। शिक्षकों को अन्य कार्यों में नहीं लगाया जाए, जिससे वो अपना पूरा समय बच्चों को पढ़ने में दे। कानून में तय कार्यदिवस, घंटे को कठोरता से पालन किया जाए और शिक्षा की गुणवत्ता और बच्चों का स्तर में सुधार हो। पाठशाला प्रबंधन समिति एक वैधानिक समिति है, जिसे सक्रिय किये जाने की जरुरत है। विभाग द्वारा बजट कम का तर्क देना एक बहाना है, जबकि आबंटित राशि का उपयोग पूरी तरह नहीं कर पाते हैं। अतः उस राशि का सही व उचित उपयोग किया जाना चाहिए। अब हम आपको बताते हैं राज्य में पंचायती व्यवस्था कि हालत। करीब 60 वर्ष पूर्व गांधी जयंती के शुभ अवसर पर 2 अक्टूबर 1959 को देश के तात्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने राजस्थान के नागौर जिले के बगदरी गांव में पहली बार देश में पंचायती राज व्यवस्था लागू की थी। ग्राम पंचायतों के समुचित विकास के लिए राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने पंचायती राज व्यवस्था की कल्पना की थी। देश में पंचायतों का गठन राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की संकल्पना पर आधारित है। बापू ने इसमें राज्य में सबसे निचले स्तर पर न्याय उपलब्ध कराने के लिए त्रिस्तरीय पंचायतों के गठन की बात कही थी। पुराने जमाने यानी वैदिक काल में भी इसका उल्लेख मिलता है। जिसमें गाँव, प्रशासन की आधारभूत इकाई हुआ करती थी। समिति जो वैदिक लोक विधानसभा थी कुछ मामलों में राजा का चुनाव कर सकती थी और सभा न्यायिक कार्यो में अपना योगदान देती थी।
ब्रिटिश काल में भी इस प्रकार की व्यवस्था हुआ करती थी। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 40 में राज्यों को पंचायतों के गठन का निर्देश दिया गया है। 1991 में संविधान में 73वां संशोधन अधिनियम 1992 करके पंचायत राज संस्था को संवैधानिक मान्यता दे दी गई। इस संशोधन के बाद राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के सपनों का पंचायती राज व्यवस्था अस्तित्व में आया। इसमें ध्यान रखा गया कि आम ग्रामवासियों की लोकतंत्र में पहुंच तथा भागीदारी बनी रहे एवं वह किसी भी रूप में अपने अधिकारों से वंचित ना रह सके। करीब ढाई दशक बाद बिहार में वर्ष 2001 में पंचायत के चुनाव हुए। विभिन्न पदों पर हजारों की संख्या में जन प्रतिनिधि चुने गए। एक उम्मीद जगी कि अब प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों का समुचित विकास होगा और हमारा गांव भी तरक्की के रास्ते पर चल सकेगा। लेकिन यह कल्पना, कल्पना ही बनकर रह गई। ग्राम पंचायत का चुनाव भी राजनीति की भेंट चढ़ गया। प्रदेश के कई पंचायतों के मुखिया के अनुसार पिछले पंचायत चुनाव के बाद सरकार ने पंचायत में जनप्रतिनिधियों के अधिकारों का हनन कर पंचायती राज व्यवस्था को ध्वस्त करने का प्रयास किया है। बिहार के बेगूसराय जिला मुखिया महासंघ के महासचिव और मोसादपुर पंचायत के मुखिया मोहम्मद सलीम खान के अनुसार पंचायती राज व्यवस्था में ग्राम सभा पंचायत की आत्मा हुआ करती थी। सोंच यह थी कि गांव के लोग मिल बैठकर गांव की समस्याओं का निष्पादन करें। परंतु प्रदेश की वर्तमान सरकार ने मुखिया के चुनाव के बाद मुखिया के अधिकारों को बांटने का काम किया। प्रदेश की वर्तमान सरकार ने वार्ड सदस्यों में मुखिया के अधिकारों को बांट दिया, जिससे समस्या शुरू हो गई। प्रदेश के कई पंचायतों के मुखिया ने सरकार के इस फैसले का विरोध किया। पटना जिले के शिवनार पंचायत की मुखिया रंजना देवी, औंटा पंचायत की मुखिया, मालपुर पंचायत की मुखिया वीना देवी, मुंगेर जिले के मय पंचायत की मुखिया अनीता देवी सहित सैकड़ों पंचायत के मुखिया ने सरकार के वर्तमान दिशानिर्देश को पंचायती राज व्यवस्था के विरुद्ध बताया। ऐसा देखा भी जा रहा है कि वार्ड सदस्यों के पास काम जाने से कई पंचायतों में विकास के कार्य करने में समस्या उत्पन्न हो रही है। विकास के कार्यों की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। वार्ड क्रियान्वयन समिति के सदस्यों में आपसी बनाव नहीं होने से कई जगह काम अवरुद्ध है। एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि चुनाव के पूर्व पंचायतों में वार्ड सदस्य का पद महत्वपूर्ण नहीं माना जाता था। जिस वजह से कोई भी योग्य व्यक्ति इस पद हेतु चुनाव मैदान में खड़ा नहीं होता था।
वार्ड सदस्य के कई पद रिक्त रह जाते थे, तो कितने ही वार्ड में निर्विरोध चुनाव होता था। सरकार को यदि कुछ बदलाव लाना ही था तो चुनाव पूर्व ऐसा कर देना चाहिए था, जिससे कि योग्य व्यक्ति वार्ड सदस्य के लिए चुने जाते। कई मुखिया ने यह भी शिकायत की कि वार्ड के विकास के लिए जो सरकार निधि भेजती है उसमें प्राथमिकता के आधार पर किसी पंचायत के किस वार्ड में विकास कार्य हो यह तय करने का अधिकार भी जनप्रतिनिधियों को नहीं है। सरकारी अधिकारी अपनी मर्जी से वार्ड का चयन कर भेजते हैं। ऐसे में समस्या यह होती है यदि उस वार्ड में किसी वजह से कार्य अवरुद्ध हो गया तो वह उसी तरह पड़ा रहता है लेकिन मुखिया या कोई भी अन्य जनप्रतिनिधि अपने विवेक से उस फंड का इस्तेमाल दूसरे वार्ड में नहीं कर सकते। इतना ही नहीं वृद्धा पेंशन, विधवा पेंशन, आवास योजना सहित जितनी भी योजनाएं हैं किसी भी योजना में मुखिया नया नाम जोड़ने का हकदार नहीं है। आज मुखिया का काम केवल और केवल फंड का ट्रांसफर करना और विकास कार्यों की निगरानी करना भर रह गया है। ऐसे भी कई मुखिया हैं जिनकी शिकायत है कि प्रखंड स्तरीय अधिकारी उनकी सुनते ही नहीं हैं, अधिकारी उनका सहयोग नहीं करते हैं। लखीसराय जिले के गंगासराय पंचायत के मुखिया ने बताया कि उनके पंचायत में विकास कार्य पूरी तरह बाधित है। उन्होंने इस संबंध में कई बार प्रखंड विकास पदाधिकारी से बात की, परंतु अधिकारी सिर्फ देख लेने का आश्वासन देते हैं और कोई भी सहयोग नहीं करते हैं।
वही मालपुर पंचायत के एक वार्ड सदस्य बताती हैं कि उनके वार्ड में एक नाले के निर्माण के दौरान गांव के ही एक दबंग व्यक्ति ने उनका काम अवरुद्ध कर दिया। मामला पुलिस और फिर अदालत तक गया। उन्होंने बताया कि उनके पति पर दबंगों ने कई झूठे केस दर्ज कर दिए। मामले की जांच हुई और जांच के बाद प्रखंड विकास पदाधिकारी एवं अंचलाधिकारी ने काम को आगे करने का निर्देश दिया। छह माह तक पूरा गांव परेशान रहा, सड़क पर पानी जमा रहा और लोगों का उस रास्ते से आना जाना बंद हो गया। सरकारी आदेश मिलने के बाद जब पुनः काम शुरू किया गया तो फिर से दबंगों ने काम करने से रोक दिया। उन्होंने बताया कि पुनः इसकी सूचना प्रखंड विकास पदाधिकारी को दी। बार-बार प्रखंड पदाधिकारी को बोलने के बावजूद भी उन्होंने किसी प्रकार का सहयोग नहीं किया और काम जहां का वहीं रुका हुआ है। रास्ता अवरुद्ध है और उस रास्ते से आने जाने वाले ग्रामीणों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। प्रदेश में सरकार ने पंचायत चुनाव में महिलाओं के लिए पचास फीसदी सीट आरक्षित की हुई है। निश्चित रूप से महिलाओं को आगे बढ़ाने के लिए यह एक अच्छा फैसला है। परंतु हम सब जानते हैं कि पंचायतों में ज्यादातर महिलाएं गांव की बहू होती हैं। शिक्षा का अभाव होता है, उन्हें गांव की भौगोलिक और सामाजिक स्थिति की जानकारी भी नहीं होती है। साथ ही साथ किसी प्रकार के विवाद होने की स्थिति में गांव की बहू निकल कर समस्याओं का निष्पादन करने में असमर्थ होती है। आज भी गांव में बहू को घर से निकलना, गांव में घूमना एक बहुत बड़ी बात मानी जाती है। नतीजा यह होता है कि आज भी जितने भी महिला जनप्रतिनिधि हैं, ज्यादातर के पति या उनके बेटे ही सारा काम देखते हैं। महिलाएं सिर्फ और सिर्फ नाम के लिए जनप्रतिनिधि होती हैं। यह सैद्धांतिक रूप से ही लागू हो सका है। व्यवहारिक रूप से यह बिल्कुल भी लागू नहीं हो सका। ऐसा नहीं है कि सरकार इन बातों को नहीं जानती है। सरकार में बैठे लोग भी इन्हीं गांव से गए हुए हैं और उन्हें इसकी अच्छी तरह से समझ है। एक समस्या और होती है कि महिला जनप्रतिनिधि के होने से अधिकारी भी उनकी बात को गंभीरतापूर्वक नहीं लेते हैं, उनकी सुनते नहीं है और सहयोग भी नहीं करते हैं। महिलाएं बार-बार अपने पंचायत, अपने गांव, अपने घर से निकल कर प्रखंड कार्यालय आने जाने में भी असमर्थ होते हैं। पूरे मामले को देखने के बाद प्रदेश में पंचायती राज व्यवस्था मजाक बनता दिखाई दे रहा है। सरकार प्रचार के विभिन्न माध्यमों से इसे अपनी बहुत बड़ी उपलब्धि बताती है,जबकि जमीनी हकीकत कुछ और ही बयाँ करती है।

