भाजपा की नई सामाजिक राजनीति : ओबीसी का उभार, हाशिए पर सवर्ण समाज?

बिहार भाजपा की राजनीति इन दिनों एक नए मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। सियासी गलियारों में टिकट को लेकर कई नामों की चर्चा है, लेकिन जिन नामों ने सबसे अधिक राजनीतिक हलचल पैदा की है, उनमें ऋतु जायसवाल का नाम भी शामिल है। बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र को लेकर चल रही चर्चाओं में उनका नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है।

यदि ऐसा होता है तो यह केवल एक उम्मीदवार का चयन नहीं होगा, बल्कि भाजपा की बदलती सामाजिक और राजनीतिक रणनीति का एक और स्पष्ट संकेत माना जाएगा। बांकीपुर लंबे समय से भाजपा के पारंपरिक शहरी वोट बैंक और विशेष रूप से कायस्थ प्रभाव वाले क्षेत्र के रूप में जाना जाता रहा है। ऐसे में यहां से किसी नए सामाजिक संदेश के साथ उम्मीदवार उतारने की चर्चा ने राजनीतिक हलकों में कई सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या भाजपा अब अपने पुराने सामाजिक आधार से आगे बढ़कर पूरी तरह नए सामाजिक समीकरणों पर दांव लगाने जा रही है? क्या पार्टी की प्राथमिकताओं में सवर्ण समाज का स्थान पहले जैसा नहीं रह गया है? दरअसल, पिछले एक दशक में भाजपा के संगठन और नेतृत्व संरचना में जो बदलाव दिखाई दिए हैं, वे किसी संयोग का परिणाम नहीं लगते। कभी ब्राह्मण, भूमिहार, राजपूत, कायस्थ और वैश्य समाज के मजबूत समर्थन पर खड़ी भाजपा ओबीसी, अति पिछड़ा और अन्य सामाजिक समूहों के बीच अपना आधार और मजबूत करने की रणनीति पर काम करती दिखाई दे रही है।

गोविंदाचार्य के सामाजिक विस्तार के सूत्र को कभी भाजपा के भीतर एक प्रयोग माना जाता था। आज वही प्रयोग पार्टी की स्थायी रणनीति बन चुका है। भाजपा अब स्वयं को किसी एक वर्ग की पार्टी नहीं, बल्कि बहुसंख्यक सामाजिक गठबंधन के रूप में स्थापित करना चाहती है। लेकिन इस प्रक्रिया में एक सवाल लगातार उठ रहा है—क्या सामाजिक विस्तार की इस यात्रा में पार्टी उन वर्गों को पीछे छोड़ रही है जिन्होंने उसके सबसे कठिन दौर में उसका साथ दिया था? बिहार में इसकी झलक पहले सम्राट चौधरी के उभार में दिखाई दी और अब टिकट वितरण की चर्चाओं में भी वही संकेत मिल रहे हैं। उत्तर प्रदेश से लेकर बिहार और हरियाणा तक भाजपा का नेतृत्व ढांचा तेजी से बदल रहा है। पार्टी के भीतर ओबीसी नेतृत्व को आगे बढ़ाने की नीति अब अपवाद नहीं, बल्कि स्थापित रणनीति बनती जा रही है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी तेज है कि आने वाले समय में भाजपा विभिन्न राज्यों में और अधिक ओबीसी चेहरों को संगठन तथा सत्ता के शीर्ष पदों पर आगे बढ़ा सकती है।

पार्टी का पूरा ढांचा इस दिशा में आगे बढ़ता दिखाई देता है कि सामाजिक प्रतिनिधित्व का नया मॉडल तैयार किया जाए, जिसमें पिछड़े वर्गों की भागीदारी पहले से अधिक हो। लोकतंत्र में हर वर्ग की भागीदारी आवश्यक है और उसका स्वागत भी होना चाहिए। लेकिन सवाल तब उठता है जब प्रतिनिधित्व का संतुलन बदलने लगे। भाजपा के भीतर और उसके समर्थक वर्गों में आज यही चर्चा सुनाई देती है कि सामाजिक विस्तार की इस राजनीति में सवर्ण समाज की राजनीतिक हिस्सेदारी लगातार सीमित होती जा रही है। बिहार से उठ रहे संकेत केवल एक राज्य तक सीमित नहीं हैं। दिलचस्प यह है कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन स्वयं बिहार की राजनीति से आते हैं। ऐसे में पार्टी के भीतर यह चर्चा और तेज है कि उनकी अगुवाई में संगठन और सत्ता, दोनों में इसी नई सामाजिक संरचना की झलक और अधिक स्पष्ट दिखाई दे सकती है। भाजपा जिस सामाजिक पुनर्संतुलन की राजनीति पर आगे बढ़ रही है, उसमें ओबीसी नेतृत्व का उभार लगातार मजबूत होता दिख रहा है, जबकि सवर्ण समाज के बीच प्रतिनिधित्व और हिस्सेदारी को लेकर बेचैनी बढ़ रही है।

बांकीपुर केवल एक विधानसभा क्षेत्र नहीं है। यह भाजपा की पारंपरिक शहरी राजनीति का प्रतीक रहा है। यह वह इलाका है जहां वर्षों तक पार्टी को सवर्ण समाज, विशेषकर कायस्थ मतदाताओं का मजबूत समर्थन मिलता रहा। लेकिन आज वही क्षेत्र नए सामाजिक प्रयोगों की प्रयोगशाला बनता दिखाई दे रहा है। भाजपा नेतृत्व बार-बार यह संदेश दे रहा है कि भविष्य की राजनीति सामाजिक विस्तार से तय होगी। लेकिन इस विस्तार की कीमत कौन चुका रहा है? यह सवाल पार्टी के पुराने समर्थकों के बीच तेजी से उठ रहा है। जिन लोगों ने संगठन खड़ा किया, बूथों पर संघर्ष किया, विपक्ष के सबसे कठिन दौर में पार्टी का झंडा उठाए रखा, वे आज स्वयं को निर्णय प्रक्रिया से बाहर महसूस कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों पर नजर डालिए। भाजपा का नेतृत्व ढांचा तेजी से बदल रहा है। संगठन और सत्ता के महत्वपूर्ण पदों पर पिछड़े वर्गों की हिस्सेदारी बढ़ रही है। यह लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व का हिस्सा हो सकता है, लेकिन साथ ही यह भी सच है कि सवर्ण समाज की उपस्थिति पहले जैसी प्रभावशाली नहीं रह गई है।

राजनीति में केवल संख्या नहीं चलती, स्मृतियां भी चलती हैं। भाजपा की सफलता की कहानी में सवर्ण समाज का योगदान किसी से छिपा नहीं है। राम मंदिर आंदोलन से लेकर संगठन विस्तार तक, आर्थिक सहयोग से लेकर वैचारिक समर्थन तक, इस वर्ग ने पार्टी को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लेकिन आज पार्टी की प्राथमिकताओं में उनका स्थान पहले जैसा दिखाई नहीं देता। सबसे दिलचस्प बात यह है कि भाजपा के भीतर यह परिवर्तन किसी आकस्मिक निर्णय का परिणाम नहीं है। यह एक सुनियोजित राजनीतिक परियोजना का हिस्सा प्रतीत होता है। नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने पिछले एक दशक में पार्टी को सामाजिक रूप से पुनर्गठित किया है। उनका लक्ष्य स्पष्ट है—ऐसा व्यापक सामाजिक गठबंधन तैयार करना जो किसी एक वर्ग पर निर्भर न रहे। चुनावी दृष्टि से यह रणनीति सफल भी रही है। लेकिन हर सफल रणनीति अपने साथ कुछ जोखिम भी लेकर आती है। यदि पार्टी का पारंपरिक आधार यह महसूस करने लगे कि उसकी राजनीतिक उपयोगिता समाप्त हो चुकी है, तो असंतोष का जन्म होना स्वाभाविक है। यह असंतोष तुरंत दिखाई नहीं देता, लेकिन समय के साथ यह राजनीतिक व्यवहार में बदल जाता है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में भी पिछले वर्षों में सामाजिक प्रतिनिधित्व का दायरा बढ़ा है। जिस संगठन को कभी सवर्ण नेतृत्व के गढ़ के रूप में देखा जाता था, वहां भी अब व्यापक सामाजिक प्रतिनिधित्व पर जोर दिया जा रहा है। यह परिवर्तन अपने आप में महत्वपूर्ण है, लेकिन इससे यह धारणा भी मजबूत हुई है कि भाजपा और संघ परिवार दोनों अपने पारंपरिक सामाजिक आधार से दूरी बनाकर नई राजनीतिक जमीन तैयार कर रहे हैं। भाजपा समर्थक सवर्ण समाज का एक वर्ग अब खुलकर यह सवाल उठाने लगा है कि क्या पार्टी में उनकी भूमिका केवल स्थायी वोट बैंक तक सीमित होकर रह गई है? जिन वर्गों ने वैचारिक संघर्ष से लेकर संगठन निर्माण तक भाजपा को मजबूती दी, क्या वे अब नेतृत्व की दौड़ में पीछे धकेले जा रहे हैं? बिहार में बांकीपुर से लेकर दिल्ली के सत्ता गलियारों तक यह चर्चा धीरे-धीरे राजनीतिक फुसफुसाहट से निकलकर खुली बहस का रूप लेती जा रही है। बिहार में उठी यह बहस केवल बिहार की बहस नहीं है। यह भाजपा के भविष्य की बहस है। यह उस राजनीतिक मॉडल की बहस है जो आने वाले वर्षों में पूरे देश की राजनीति को प्रभावित कर सकता है।

आज भाजपा के सामने चुनौती विपक्ष नहीं है। चुनौती अपने ही सामाजिक आधार के भीतर संतुलन बनाए रखने की है। नए वर्गों को जोड़ना राजनीतिक आवश्यकता हो सकती है, लेकिन पुराने सहयोगियों को उपेक्षा का संदेश देना राजनीतिक दूरदर्शिता नहीं माना जा सकता।यदि पार्टी का संदेश यह बनता है कि सवर्ण समाज केवल वोट देने के लिए है और नेतृत्व की बारी किसी और की है, तो यह स्थिति भविष्य में नए राजनीतिक समीकरणों को जन्म दे सकती है। राजनीति में कोई भी वर्ग स्थायी रूप से मौन नहीं रहता। जब उसे लगता है कि उसकी आवाज नहीं सुनी जा रही, तब वह नए रास्ते तलाशने लगता है। भाजपा की नई सामाजिक राजनीति का संदेश साफ दिखाई देता है—नया सामाजिक विस्तार, नए चेहरे और नया नेतृत्व। लेकिन इस पूरी कवायद के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सवर्ण समाज को धीरे-धीरे राजनीतिक केंद्र से हटाकर केवल चुनावी गणित का हिस्सा बनाया जा रहा है? यदि यह धारणा मजबूत होती है तो आने वाले समय में भाजपा को विपक्ष से अधिक अपने पारंपरिक समर्थक वर्ग के सवालों का सामना करना पड़ सकता है। क्योंकि राजनीति में उपेक्षा की भावना अक्सर वहीं से असंतोष पैदा करती है, जहां कभी सबसे मजबूत समर्थन खड़ा हुआ करता था।

फिलहाल ये प्रश्न धीमे स्वर में पूछे जा रहे हैं। लेकिन यदि बिहार से उठ रही यह बेचैनी अन्य राज्यों तक पहुंची, तो आने वाले वर्षों में यही प्रश्न भाजपा की सामाजिक राजनीति की सबसे बड़ी परीक्षा बन सकते हैं। चुनावी जीतें बहुत कुछ तय करती हैं, लेकिन राजनीतिक दलों की दीर्घकालिक ताकत उनके समर्थकों के भरोसे से तय होती है। भाजपा के सामने अब असली चुनौती उसी भरोसे को बनाए रखने की है।

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