अब तो कॉकरोच सरकार का पसीना निकाल रहा है, कॉकरोच आज से नहीं हैं, जब से दुनिया है तब से कॉकरोच हैं..

भारत का नौजवान इन चवन्नी अठन्नी कॉकरोच के चक्कर में नहीं पड़ते..वो मेहनत करते हैं..कामयाब होते हैं..जिम्मेदारी निभाते हैं..यही है भारत का Gen Z!!

देश का युवा अब चुप नहीं बैठेगा। पेपर लीक, भ्रष्टाचार और शिक्षा व्यवस्था की विफलताओं ने लाखों छात्रों का भविष्य खतरे में डाल दिया है। हम मांग करते हैं कि शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए तुरंत इस्तीफा दें। युवा न्याय चाहता है, बहाने नहीं। ”भारत में कॉकरोच रवीश कुमार के “भटके नौजवान” या “गरीब मास्टर का बेटा” होता है जो सुकमा जैसा नक्सली बनता है या बुरहान बानी जैसा आतंकवादी!! कमाल है ये कॉकरोच हर जगह घुस कर अपनी जगह बना लेते हैं..कुछ कॉकरोच डफली बजाते हुए 2 अलग अलग पार्टियों से 3 लोकसभा या विधानसभा चुनाव भी लड़ जाता है और जमानत जब्त कराता है..कन्हैया कुमार भी कॉकरोच लीडर थे कभी!! आज राहुल गांधी के मंच से धकिया के नीचे कर दिया जाता है..

भारत के GenZ को कॉकरोच बोलने के रिएक्शन में सोशल मीडिया पर तूफान मच गया है। कहा जा रहा है कि प्रतिक्रिया में ट्विटर इंस्टाग्राम हैंडल्स बनाए जा रहे हैं जिनपर बहुत तेजी से फॉलोअर्स बढ़ गए। मुझे इसमें कोई हैरत नहीं है। सच ये है कि भारत का युवा वर्ग और जेन-ज़ी भारी आक्रोश में है। ‘पढ़ाई कमाई दवाई’ जैसे बुनियादी मुद्दों की अनदेखी के कारण वर्षों से असंतोष पनप रहा था। मैं ये बात लंबे समय से कह रहा हूं कि युवाओं का असंतोष धीरे धीरे बारूद का रूप ले रहा है जो फूटेगा तो देश की राजनीति को हमेशा के लिए बदल देगा। सत्ता में बैठे नेताओं के इसी डर के कारण पिछले कुछ समय से GenZ शब्द को ही डिस्क्रेडिट करने का प्रयास होने लगा है। भारत में चुनावी प्रक्रिया को जिस तरह बेइमानी से प्रभावित कर दिया गया है, उसका असर भी इस अभिव्यक्ति में दिख रहा है। हो सकता है Cockroach के नाम पर जो डिजिटल विरोध दिख रहा है, वो फिलहाल जमीन पर किसी ठोस आंदोलन का रूप न ले। लेकिन आने वाले समय में बड़े जनांदोलन की ज़मीन तैयार करने में यह मदद जरूर करेगा। असल सवाल ये नहीं है कि कॉकरोच के रिएक्शन में शुरू हुए सोशल मीडिया हैंडल्स के पीछे कौन है या कौन नहीं। असल सवाल है कि क्या अब भी भारत के युवाओं और GenZ की पीड़ा को हम लोग सुन पा रहे हैं या अभी भी खारिज कर रहे हैं?

नॉर्वे के एक अखबार ने मोदी जी का कार्टून छापा, अब कार्टून छापना कोई बड़ी समस्या नहीं है। सभी प्रधानमंत्रियों के छपते आए है और आज भी गए गुजरो के छप रहे है। फिर भक्तगण और देश की मीडिया ने अपमान हो गया , अपमान हो गया कहकर इतना हु हल्ला क्यों मचा दिया , दअरसल असल समस्या नॉर्वे के अखबार में छपा कार्टून नहीं। असल समस्या हमारा मैनेज्ड मीडिया, कॉम्प्रोमाइज मीडिया से है। पिछले 12 सालों से हम आदि हो चुके है सिर्फ और सिर्फ मोदी जी का गुणगान सुनते सुनते हुए , मोदी जी ये , मोदी जी वो,  भगवान , अवतार , दिव्य पुरुष , विश्व गुरु ब्रह्मांड गुरु वर्ल्ड लीडर ग्लोबल लीडर फलाना ढिमका। पिछले 12 सालों से हमने कभी सरकार या मोदी जी की खामियां टीवी पर सुनी देखी नहीं है मजाल है कि एक शब्द भी देश की मीडिया ने कभी खिलाफ बोला या लिखा हो क्योंकि देश की मीडिया को पता है इधर तुम सच दिखाओगे , उधर से तुम्हारे घर ऑफिस ED CBI की रेड हो जाएगी , तुमको देशद्रोही घोषित कर दिया जाएगा , तुम्हारे चैनल बंद कर दिए जाएंगे। लेकिन नॉर्वे स्वतंत्र मीडिया रैंकिंग में नंबर वन है इसलिए वहा प्रधानमंत्री का कार्टून बनता है सरकारों की आलोचना होती है विरोध होता है कड़वे से कड़वे सवाल पूछे जाते है क्योंकि वहा की सरकार इसको लोकतंत्र का हिस्सा मानती है लेकिन भारत में पिछले 12 सालों में ऐसा माहौल बना दिया गया कि मोदी जी से सवाल पूछना देशद्रोह है , मोदी जी का विरोध करना भारत का अपमान है एक शब्द भी विरोध का बोला जाए तो सब चिल्ला उठते है कुलबुलाने लगते है कि अपमान हो गया अपमान हो गया। नेशनल मीडिया तो छोड़िए ,

अगर फेसबुक पर छोटी मोटी पोस्ट इनके सामने आ जाए तो उसको ब्लॉक करवाते समय नहीं लगाते है वो समय अब गया जब डॉ मनमोहन सिंह को मीडिया मौनी बाबा कहकर संबोधित करती थी , उसके कार्टून बनाकर अपने चैनलों पर दिखाती थी  कॉमेडी शो ,लाफ्टर चैलेंज शो में मनमोहन सिंह जैसे भेष भूषा बनाकर मजाक बनाया जाता था नेताओं की मिमिक्री की जाती थी। मंदिर-मस्जिद,नमाज, कांवड़ यात्रा, शहरों के नाम बदलना सब ठीक है..वर्ल्ड टूर,फ़ोटोग्राफ़ी,Reels सब स्वीकार्य है.. लेकिन पढ़े लिखे नौकरी के लिए स्ट्रगल करते युवाओं को अब भी नहीं सुना गया तो भविष्य में क्रांति देखने को मिल सकती है.. उनकी समस्या रोजगार है,पेपर लीक है.. उनको किक नहीं मिलता किसी कॉन्ट्रोवर्शियल न्यूज से.. उम्मीद करती हूँ कॉकरोच जनता पार्टी का हाल अन्ना आंदोलन जैसा नहीं होगा..कोई केजरी न निकल जाए इस क्रांति से..

NEET परीक्षा का पेपर लीक होने के विरोध में दिल्ली के जंतर-मंतर, पुणे की रैली और लखनऊ की रैली पर ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ की ओर से किए गए प्रदर्शन को दुनिया भर के बड़े मीडिया संस्थानों ने कवर किया है। ये दो विदेशी महिला पत्रकार जंतर-मंतर पहुँचने और प्रदर्शन के बारे में जानकारी जुटाने वाली शुरुआती लोगों में से थीं। फिर भी, कुछ लोगों ने उनका विरोध किया। क्यों? ब्रिटिश अखबार द गार्डियन की साउथ एशिया कॉरेस्पोंडेंट और जानी-मानी पत्रकार हैना एलिस-पीटरसन ने पूरे प्रदर्शन की निष्पक्ष रिपोर्टिंग की। वह भारत और पूरे साउथ एशिया क्षेत्र को कवर करती हैं और उनकी रिपोर्ट दुनिया भर में पढ़ी जाती हैं। दूसरी पत्रकार ऑस्ट्रेलिया से हैं—रेचल क्लेटन, जो ABC न्यूज़ की साउथ एशिया कॉरेस्पोंडेंट हैं। वह भारत, बांग्लादेश और नेपाल समेत कई देशों से रिपोर्टिंग करती हैं और इंटरनेशनल जर्नलिज़्म की दुनिया में एक जाना-माना नाम हैं। दोनों पत्रकारों ने अपने-अपने मीडिया संस्थानों में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ और अभिजीत दीपके के प्रदर्शन पर रिपोर्ट प्रकाशित कीं। हालाँकि, कुछ दक्षिणपंथी समर्थकों ने उन्हें ‘भारत-विरोधी’ करार दिया। फिर भी, एक पत्रकार की मूल भूमिका तो बस घटनाओं की वैसी ही रिपोर्टिंग करना है जैसी वे ज़मीन पर हो रही हैं। हमें उन पत्रकारों के काम का सम्मान करना चाहिए जो हमारे समाज के मुद्दों—जैसे लोगों की परेशानियाँ और विरोध-प्रदर्शन—को दुनिया के सामने लाने के लिए अपने देशों से दूर यात्रा करते हैं।

किशन बाबूराव उर्फ धूर्त अन्ना के नीचता भरे इतिहास ने काॅकरोच अभियान को संदिग्ध बना रखा है। शासकीय, प्रशासकीय और न्यायिक तानाशाही के खिलाफ यह सबसे मजबूत अभियान हो सकता था, लेकिन केजरीवाल के धोखे ने पचास साल के लिए किसी भी क्रांति को असंभव बना दिया है। मैं नहीं कहता, कि काॅकरोच संदिग्ध हैं, लेकिन भरोसा करने का कोई विश्वसनीय आधार भी तो नहीं है। जो भी हो, अब इतना देख ही लिया है, तो एक एडवेंचर और सही। तो काॅकरोच दोस्तों ! आपको शुभकामनाएं।

अब जान लीजिए कॉकरोचों के जन्म और चर्चित होने की ।।। महाराष्ट्र मूल के अभिजीत दिप्के अमेरिका में Study loan लेकर पढ़ाई कर रहे हैं। भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने सुप्रीम कोर्ट में एक सुनवाई के दौरान देश के युवाओं, बुद्धिजीवियों खासकर निष्पक्ष पत्रकारों, लेखकों एवं हमारे जैसे करोड़ों सोशल मीडिया में सत्ता को टॉर्च दिखाने वाले असली देशभक्तों को परजीवी एवं कॉकरोच कहा था । पूरे देश में इसकी प्रतिक्रिया होनी स्वाभाविक थी लेकिन इतनी अधिक हो जाएगी शायद विश्व में किसी ने उम्मीद नहीं की थी। भारतीय कॉकरोच पार्टी की स्थापना की जो अभी रजिस्टर्ड भी नहीं हो पाई है। आज तक इसके फॉलोअर 24 मिलियन पार कर चुके थे जबकि भारतीय जनता पार्टी के इससे आधे भी नहीं हैं । कांग्रेस की भाजपा से अधिक है लेकिन कांग्रेस भी कॉकरोच पार्टी से काफी पीछे है । यह भारत के युवाओं, बुद्धिजीवियों, लेखकों आदि के अंदर ही अंदर पनप रहे मोदी सरकार तथा सत्ता के खूंटे से बंधे सभी संस्थानों के खिलाफ रोष को प्रदर्शित करता है। भविष्य के लिए इसका संकेत क्या है, आप स्वयं समझ सकते हैं ।

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