जीवन में बहुत सी चीज़ें ऐसी होती हैं जो आपके लिए खुशी का बायस बनती हैं, आप में ऊर्जा और उत्साह भरती हैं। लेकिन ऐसी भी चीज़ें होती हैं, जो आपके लिए विपदा के समान होती हैं और आपको तोड़ कर रख देती हैं। बावजूद इसके मेरा मानना है कि यह भी अच्छे के लिए ही होता है। दुख तो होता है, आप संकट में भी होते हैं मगर ऐसी स्थिति आपको नए सिरे से जीवन को शक्ल देने का अवसर प्रदान करती है।

आज की बेरोजगारी ने किसी न किसी शक्ल में हममें से बहुत से लोगों के सामने ऐसी परिस्थितियां पैदा की हैं। उनका मुकाबला किया जाना चाहिए, उनसे नई राह ढूंढनी चाहिए। पहचान की जानी चाहिए कि कौन आपका शुभचिंतक है, कौन बैरी। वक़्त है इस परिस्थिति से उपजे दौर में नई पहचान के साथ आगे बढ़ने की। भूल जाइए उन्हें, जिन्होंने आपको ठगा। आपका इस्तेमाल किया। आपके सहारे अपना भला किया और निहायत ज़रूरी वक़्त में आपकी चिंता छोड़ दी। उनका साथ धरिए जो आपके लिए इस संकट में आपके खैरख्वाह साबित हुए। उम्मीद है जीवन की तस्वीर इससे ज़रूर बदलेगी। दुख का कारण बने लोगों को उनके किए की सज़ा भी ज़रूर दीजिए क्यूंकि अगर आप ऐसा नहीं करेंगे तो यह भी एक किस्म का अन्याय होगा। उनके हौसले को तोड़ना ज़रूरी है, उनका स्याह चेहरा सामने आना ही चाहिए।

मन इतना भारी है कि बयां नहीं कर सकता। पिछले लगभग दो महीने से हर रोज़ लोगों की परेशानियों को करीब से देख रहा हूं। खास कर उन लोगों की परेशानियों को, जिनके लिए यह विपदा इधर कुंआ, उधर खाई की तरह पेश आ रही है। शुरू से मेरा मानना रहा है कि जितनी मौतें कोरोना वायरस के संक्रमण से नहीं होंगी, उतने लोग इससे पैदा हुई परिस्थितियों के आगे ज़िन्दगी से हाथ धो बैठेंगे। परिस्थितियों से उपजे माहौल में तिल तिल मरने को मजबूर होंगे। वही हो रहा है। कल लखनऊ का हादसा इसी का एक उदाहरण है। कल सुबह से ही इसी कारण मन हद से ज्यादा खराब है। मारे गए 15 छात्र सरकार के कुशासन पर कुर्बान हो गया। सुबह से इन मारे गए लोगों के घर में विलाप शुरू था, लोग धाड़ धाड रोए जा रहे थे। ऐसा लग रहा था मानो धरती फट जाएगी। किसी का बेटा मारा गया, किसी का सुहाग उजड़ गया तो किसी के घर का एकमात्र चिराग इस दुनिया में नहीं रहा था। बुझ गया उनके घर का चिराग। और ये लोग स्वाभाविक मौत नहीं मरे थे। न कोरोना ने उनकी जान ली थी। उनकी जान लेने के जिम्मेवार वे लोग थे जो ऐसी घड़ी में उनमें इतना विश्वास भी नहीं जगा पाए थे कि तुम्हें कुछ नहीं होगा, तुम सही सलामत रहोगे। तुम्हारे आश्रित भी सही सलामत रहेंगे। भविष्य को लेकर जब कुछ स्पष्ट न हो बल्कि अंधेरा ही पसरा नज़र आ रहा हो, और वर्तमान खुद ही खौफजदा हो तो इंसान अपने घर, अपने लोगों की ओर ही भागता है। यही सोचता है कि मरना ही किस्मत में है तो उन लोगों के बीच मरूं, जिनके लिए मेरी ज़िन्दगी मौत कोई मायने रखती है। उन बेगैरतों से कैसा लगाव जिन्होंने उनके श्रम, उनके वोट से अपना लाभ तो जुटाया मगर संकट की घड़ी में छोड़ दिया उनके हाल पर। माफ कीजिएगा जो कॉकरोच कहकर इन अभावग्रस्त छात्रों का मखौल उड़ा रहे हैं । आप घर में आराम फहरा रहे और टीवी, सोशल मीडिया के जरिए दुनिया जहान की खबर हासिल कर रहे और अपने विचार, ज्ञान पेल रहे लोग हकीकत से पूरी तरह शायद ही परिचित हैं। ज़मीन पर चीज़ें वैसी नहीं हैं, जैसा आपको लग रहा है। अच्छे अच्छों की हालत ऐसी है कि आत्महत्या करने का विचार आने लगा है। राहत, भोजन वितरण की तस्वीरें ज्यादा हैं, अमल उस रूप में कतई नहीं। हर तरफ झूठ है, फरेब है। छात्र जब ट्रेन में किराया देकर आ रहा है और सरकारें झूठ बोल रही हैं कि उन्हें मुफ्त में घर भेजा जा रहा है, तो आप अंदाजा लगाइए कि झूठ का साम्राज्य कितना गहरा है। सबने बस अपना चेहरा बचाने के अपने अपने झूठ तलाशे हुए हैं। यही तो जीवन है जी,सच, झूठ, फरेब और जीवन ……


