शहनाई की हर तान में इतिहास बोलता है, उस्ताद के सुरों में सारा हिंदुस्तान बोलता है…सुरों के इतिहास को संयोने का जिद,,,

भारतरत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ान साहब की विरासत को समर्पित यह केवल एक जानकारी नहीं, बल्कि एक भावनात्मक यात्रा है…..सविता_आनन्द (यह कहानी सविता आनंद के सोशल मीडिया से प्रेरित है)

उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ान साहब की विरासत से मेरा जुड़ाव किसी दायित्व से अधिक एक भावनात्मक रिश्ता है। पिछले वर्षों में जो भी प्रयास हुए, वे केवल इस अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित और जीवित रखने की एक छोटी-सी कोशिश थी। उस्ताद के परिवार, उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ान चैरिटेबल ट्रस्ट, श्री अफ़ाक हैदर जी और उन सभी साथियों का विशेष धन्यवाद, जिनके सहयोग और विश्वास यह यात्रा जारी रहेगा । यह सोंच उनका है जिन्होंने उस्ताद की विरासत को सहेजने का सपना देखा। वह कहती है , “मैंने केवल अपनी श्रद्धा निभाई है, सम्मान उस विरासत का है जो उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ान साहब हमें सौंप गए हैं।” यह हैं

दिल्ली निवासी सविता आनंद, जो एक लेखिका, सामाजिक कार्यकर्ता और पूर्व निजी सचिव (समाज कल्याण मंत्री, दिल्ली सरकार) रह चुकी हैं, पिछले दो दशकों से उस्ताद के परिवार और उनकी विरासत से गहराई से जुड़ी हुई है। उस्ताद की शहनाई से पहली मुलाक़ात में ही उनके भीतर ऐसा सुर जगा दिया, जिसे उन्होंने जीवन का हिस्सा बना लिया। फिर न पीछे मुड़कर देखा, न इस साधना से दूर हुईं। उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ान चैरिटेबल ट्रस्ट के अध्यक्ष अफाक हैदर जी के साथ मिलकर उन्होंने सचिव के रूप में निरंतर प्रयास किए कभी “विरासत ए बिस्मिल्लाह” जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से, तो कभी डॉक्यूमेंट्री और लेखों के जरिए उस्ताद की स्मृति को जीवित रखने की एक सतत मुहिम चलाई। उन्होंने न केवल सांस्कृतिक मंचों पर इस विरासत की आवाज़ उठाई, बल्कि प्रशासन और सरकार को भी पत्राचार के माध्यम से उस जर्जर होते पुश्तैनी मकान की ओर बार-बार ध्यान दिलाया जो आज इतिहास का एक अनमोल अध्याय है। उनका विश्वास हमेशा यही रहा “ऐसी शख़्सियतें रोज़ नहीं जन्म लेतीं… और उनका सम्मान केवल यादों से नहीं, संरक्षण से होता है।” और आज, यह प्रयास रंग लाया है उस्ताद के पुश्तैनी घर को संग्रहालय के रूप में संरक्षित करने के सरकार के निर्णय ने इस लंबे संघर्ष, प्रेम और समर्पण पर एक मुहर लगा दी है। यह केवल एक निर्णय नहीं… यह सुरों की अमरता को दिया गया सम्मान है। “शहनाई की धुन अब दीवारों में नहीं, इतिहास में गूंजेगी…” साधुवाद सविता आनंद को —

उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ान जहाँ भी जाते थे, अपने साथ बनारस की मिट्टी की महक, गंगा की रवानी और हिंदुस्तान की सांस्कृतिक आत्मा को लेकर चलते थे। अपनी जन्मभूमि और कर्मभूमि से उनका लगाव इतना गहरा था कि वह केवल एक महान कलाकार नहीं, बल्कि अपनी परंपरा और विरासत के जीवंत प्रतिनिधि बन जाते थे। औपचारिक शिक्षा भले ही सीमित रही हो, लेकिन जीवन, मनुष्यता और संगीत की उनकी समझ असाधारण थी। वर्षों की साधना ने उनके भीतर ऐसा विशाल संगीत-ब्रह्मांड रच दिया था, जिसमें रागों की गंभीरता, लोकधुनों की आत्मीयता और इंसानी भावनाओं की अनंत छवियाँ एक साथ बसती थीं। उनकी शहनाई केवल सुर नहीं बिखेरती थी, वह दिलों से संवाद करती थी। विदेशी धरती पर जब उनकी शहनाई गूंजती, तो भाषा, देश और संस्कृति की सारी सीमाएँ मानो स्वतः मिट जातीं। संगीत के पारखी ही नहीं, आम श्रोता भी उनकी धुनों में इस तरह डूब जाते जैसे वे भारतीय रागों की बारीकियों से भली-भांति परिचित हों। पिछले दो दशकों से भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ान की विरासत के संरक्षण के लिए निरंतर प्रयास किया जा रहा है।

पर अब माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में काशी की सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण और पुनर्स्थापन के लिए किए जा रहे प्रयासों के बीच उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ान के पैतृक आवास को संग्रहालय के रूप में विकसित करने, उनके घर तक जाने वाले मार्ग के सौंदर्यीकरण तथा बालाजी घाट को उनकी स्मृतियों से जुड़े सांस्कृतिक स्थल के रूप में विकसित करने के प्रस्तावों पर सकारात्मक सहमति बनी है। प्रशासन की ओर से परिवार को हरसंभव सहयोग का आश्वासन दिया गया है। उम्मीद है कि शीघ्र ही उस्ताद की अमूल्य विरासत को वह सम्मान मिलेगा जिसकी प्रतीक्षा वर्षों से की जा रही है।

सविता आनंद कहती है उस्ताद के पैतृक आवास को लेकर जब भी कोई अनिश्चितता की खबर सुनती, मन बेचैन हो उठता था। डर लगता था कि कहीं इतिहास और स्मृतियों का यह घर समय और बाज़ार की भेंट न चढ़ जाए। लेकिन अब यह विश्वास लेकर लौट रही हूँ कि उस्ताद की धरोहर सुरक्षित हाथों में है और आने वाली पीढ़ियाँ भी उस विरासत को महसूस कर सकेंगी, जिसे उन्होंने अपनी साधना से अमर बनाया। भागदौड़, अनगिनत मुलाकातें, संवाद और प्रयास आज सार्थक लग रहे हैं। लौट रही हूँ मन में यह संतोष लिए कि एक बेटी ने अपनी ओर से विरासत की रखवाली का फ़र्ज़ निभाने की ईमानदार कोशिश की है। यूँ ही कोई बिस्मिल्लाह नहीं होता… वह साधक, जिनके लिए संगीत ही इबादत था और शहनाई उनकी आराधना। राग और ताल… दोनों संगीत की आत्मा हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इनमें फर्क क्या है? यह कहानी है एक ऐसे महान कलाकार, जिनकी समझ केवल सुरों तक सीमित नहीं थी, बल्कि संगीत के दर्शन तक पहुँचती थी।

उनकी बातें सिर्फ संगीत नहीं सिखातीं, बल्कि यह भी बताती हैं कि ज्ञान, साधना और परंपरा का असली अर्थ क्या होता है। आज की तेज़ रफ़्तार पीढ़ी के लिए यह एक संदेश है—कला केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि जीवन को समझने का माध्यम भी है। जब हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की बात होती है, तो एक नाम अपनी अद्वितीय गायकी, भावपूर्ण प्रस्तुति और सुरों की गहराई के कारण अमर हो जाता है Ustad Bade Ghulam Ali Khan। पटियाला घराने के इस महान गायक ने अपने सुरों से संगीत को नई ऊँचाइयाँ दीं। उनकी आवाज़ में ऐसी मिठास, ऐसी रवानगी और ऐसा भाव था कि श्रोता मंत्रमुग्ध हुए बिना नहीं रह पाते थे। “याद पिया की आए” और “प्रेम जोगन बन के” जैसी प्रस्तुतियाँ आज भी संगीत प्रेमियों के दिलों में जीवित हैं। उनकी गायकी केवल कला नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक विरासत की एक अमूल्य धरोहर है। विरासत सिर्फ़ इमारतों में नहीं बसती, कुछ विरासतें आवाज़ बनकर सदियों तक गूंजती रहती हैं। उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ाँ साहब को दिल में रखकर उनकी संगीत , संस्कार और संस्कृति को संयोने की सोंच को आगे बढ़ाने वाली सविता आनंद को सप्रेम साधुवाद —

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