‘नीट’ प्रश्नपत्र कांड पर संसद से सड़क तक महाघमासान

‘प्रधान हटाओ’ की गूंज के बीच अब प्रधानमंत्री के फैसले पर टिकी देश की नजर- रितेश सिन्हा

देश की सबसे प्रतिष्ठित चिकित्सा प्रवेश परीक्षा ‘नीट’ का प्रश्नपत्र लीक विवाद अब केवल एक परीक्षा का मामला नहीं रह गया है। यह करोड़ों युवाओं के विश्वास, देश की शिक्षा व्यवस्था की साख और सरकार की जवाबदेही पर खड़ा सबसे बड़ा प्रश्न बन चुका है। संसद के भीतर विपक्ष सरकार को घेर रहा है, तो संसद के बाहर हजारों छात्र, अभिभावक और विभिन्न संगठन सड़क पर उतरकर जवाब मांग रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि लाखों युवाओं के भविष्य से जुड़ी परीक्षा भी सुरक्षित नहीं रह गई, तो फिर देश की शिक्षा व्यवस्था पर भरोसा किस आधार पर किया जाए? पिछले कुछ वर्षों में लगभग हर बड़े भर्ती या प्रवेश परीक्षा के साथ प्रश्नपत्र लीक, धांधली, परीक्षा रद्द होने या अनियमितताओं के आरोप जुड़े हैं। कभी भर्ती परीक्षा, कभी शिक्षक नियुक्ति, कभी पुलिस भर्ती और अब देश की सबसे महत्वपूर्ण चिकित्सा प्रवेश परीक्षा। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या यह केवल संयोग है या व्यवस्था के भीतर कहीं गंभीर संस्थागत विफलता घर कर चुकी है?

सोमवार को राजधानी दिल्ली में जो दृश्य देखने को मिला, उसने इस पूरे विवाद को नया राजनीतिक आयाम दे दिया। हजारों प्रदर्शनकारी संसद मार्ग पर जुटे और संसद की ओर कूच करने लगे। उनकी मांग साफ थी— शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को पद से हटाया जाए, परीक्षा प्रणाली में जवाबदेही तय की जाए और युवाओं के साथ हुए कथित अन्याय का न्यायपूर्ण समाधान निकाला जाए। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को बैरिकेड लगाकर रोक दिया। कई स्थानों पर लाठीचार्ज और आंसू गैस के प्रयोग की खबरें भी सामने आईं। लोकतंत्र में अपने भविष्य की चिंता लेकर सड़क पर उतरे युवाओं के सामने पुलिस की दीवार खड़ी कर देना अपने आप में कई सवाल छोड़ गया।

राजधानी का बड़ा हिस्सा सुरक्षा छावनी में बदल गया। कई मार्गों पर यातायात प्रभावित हुआ, मेट्रो सेवाओं पर असर पड़ा और संसद के आसपास अभूतपूर्व सुरक्षा व्यवस्था देखने को मिली। लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यह रहा कि क्या सरकार आंदोलन को सुन रही है या केवल उसे नियंत्रित करने की कोशिश कर रही है? इस बीच ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के नेतृत्व में चल रहे आंदोलन ने केंद्र सरकार पर दबाव और बढ़ा दिया। संगठन के प्रतिनिधिमंडल ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे. पी. नड्डा को ज्ञापन सौंपते हुए तीन प्रमुख मांगें रखीं— शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की बर्खास्तगी, सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की रिहाई तथा प्रश्नपत्र लीक से जुड़े तनाव के कारण कथित रूप से आत्महत्या करने वाले अभ्यर्थियों के परिवारों को एक-एक करोड़ रुपये की आर्थिक सहायता। ज्ञापन के बाद स्वास्थ्य मंत्री ने बताया कि बातचीत हुई है, लेकिन इससे आंदोलन की धार कम होती दिखाई नहीं दी।

विपक्ष ने इस पूरे घटनाक्रम को संसद के भीतर जोरदार ढंग से उठाया। सरकार से पूछा गया कि यदि परीक्षा प्रणाली पूरी तरह सुरक्षित थी तो इतनी बड़ी चूक कैसे हुई? यदि सुरक्षा व्यवस्था मजबूत थी तो प्रश्नपत्र लीक की खबरें क्यों सामने आईं? यदि दोषी पकड़े गए हैं तो अब तक जिम्मेदार अधिकारियों और नीति निर्धारकों पर कठोर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? विपक्ष का आरोप है कि सरकार प्रशासनिक स्तर पर कुछ लोगों को जिम्मेदार बताकर राजनीतिक जवाबदेही से बचने का प्रयास कर रही है। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस पूरे विवाद के केंद्र में हैं। विपक्ष और आंदोलनकारी संगठनों का तर्क है कि जब किसी मंत्रालय के अधीन लगातार गंभीर विवाद सामने आते हैं, तब केवल विभागीय जांच पर्याप्त नहीं होती। लोकतांत्रिक परंपरा में नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करना भी शासन का हिस्सा माना जाता है। इसी कारण ‘प्रधान हटाओ’ का नारा केवल राजनीतिक नारा नहीं बल्कि आंदोलन की सबसे प्रमुख मांग बन गया है। युवाओं का आक्रोश केवल एक परीक्षा तक सीमित नहीं है। उनका कहना है कि वे वर्षों तक कठिन परिश्रम करते हैं, परिवार आर्थिक बोझ उठाता है, लाखों रुपये कोचिंग और तैयारी पर खर्च होते हैं, लेकिन अंत में यदि प्रश्नपत्र पहले ही बाहर आ जाए या परीक्षा की निष्पक्षता पर सवाल उठ जाए तो सबसे बड़ा नुकसान ईमानदारी से तैयारी करने वाले छात्रों का होता है। ऐसी स्थिति में प्रतिभा नहीं बल्कि व्यवस्था की कमजोरी चर्चा का विषय बन जाती है।

इस पूरे घटनाक्रम ने शिक्षा व्यवस्था पर सरकार के बड़े-बड़े दावों को भी विपक्ष के निशाने पर ला दिया है। विपक्ष का कहना है कि यदि देश को ज्ञान महाशक्ति बनाने की बात की जाती है तो सबसे पहले परीक्षा प्रणाली को अभेद्य बनाना होगा। केवल नई शिक्षा नीति, नई घोषणाएं या बड़े कार्यक्रम पर्याप्त नहीं होंगे। जब तक परीक्षा कराने वाली संस्थाओं में पारदर्शिता, तकनीकी सुरक्षा और जवाबदेही सुनिश्चित नहीं होगी, तब तक युवाओं का विश्वास लौटना कठिन होगा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह आंदोलन केवल छात्रों का नहीं रह गया है। अब इसमें अभिभावकों, शिक्षकों, सामाजिक संगठनों और विपक्षी दलों की भागीदारी बढ़ रही है। यही कारण है कि इसका राजनीतिक प्रभाव भी व्यापक होता जा रहा है। इस पूरे घटनाक्रम में एक और गंभीर सवाल पुलिस कार्रवाई को लेकर उठा है। आलोचकों का कहना है कि यदि युवाओं की आवाज सुनने के बजाय उन्हें बैरिकेड, लाठी और आंसू गैस का सामना करना पड़े, तो इससे लोकतांत्रिक संवाद कमजोर होता है। सरकार का पक्ष है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना उसकी जिम्मेदारी है, लेकिन विरोधी दलों का आरोप है कि सरकार संवाद के बजाय दमन का रास्ता चुन रही है। यह राजनीतिक विवाद का विषय है और इस पर अलग-अलग पक्षों की अलग-अलग राय है।

अब निगाहें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर टिक गई हैं। क्या सरकार केवल जांच समितियों और प्रशासनिक कार्रवाई तक सीमित रहेगी या कोई बड़ा राजनीतिक संदेश भी देगी? क्या शिक्षा मंत्रालय में जवाबदेही तय होगी? क्या परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार लागू किए जाएंगे? क्या राष्ट्रीय स्तर पर परीक्षा सुरक्षा के लिए नई व्यवस्था बनेगी? इन प्रश्नों का उत्तर आने वाले दिनों में ही मिलेगा। यदि सरकार इस मुद्दे को केवल राजनीतिक हमला मानकर टालने की कोशिश करती है तो यह असंतोष और गहरा सकता है। लेकिन यदि वह इसे युवाओं के विश्वास से जुड़ा राष्ट्रीय संकट मानते हुए कठोर और पारदर्शी कदम उठाती है, तो खोया हुआ भरोसा लौटाने का अवसर अभी भी मौजूद है। आज देश का युवा किसी राजनीतिक दल की जीत या हार नहीं चाहता। वह केवल इतना चाहता है कि उसकी मेहनत का मूल्य सुरक्षित रहे, उसकी परीक्षा निष्पक्ष हो और उसके भविष्य के साथ कोई समझौता न हो। यही मांग इस आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत है।

नीट प्रश्नपत्र लीक विवाद ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसके युवा होते हैं। यदि वही युवा व्यवस्था से निराश होने लगें, तो यह केवल शिक्षा का संकट नहीं बल्कि शासन की विश्वसनीयता की भी चुनौती बन जाता है। इसलिए यह समय राजनीतिक बयानबाजी से आगे बढ़कर ठोस जवाबदेही, पारदर्शी जांच और संस्थागत सुधार का है। संसद में उठी आवाज और सड़क पर उमड़ा जनाक्रोश अब सीधे सत्ता के सर्वोच्च स्तर तक पहुंच चुका है। आने वाले दिनों में सरकार का हर कदम यह तय करेगा कि यह विवाद केवल एक राजनीतिक तूफान बनकर रह जाएगा या भारतीय शिक्षा व्यवस्था में वास्तविक सुधार की शुरुआत करेगा।

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