जातीय समीकरण और बाहुबलियों पर निर्भर बिहार के राजनीतिक दल।

ऐसा कोई राजनीतिक दल नजर नहीं आता जिसे बाहुबलियों से परहेज हो।शाहबुद्दीन,रीतलाल यादव,राजबल्लभ यादव,बिंदी यादव, अनंत सिंह,मुन्ना शुक्ला,सुनील पांडे,ललन सिंह,सूरजभान सिंह,पप्पू यादव,आनंद मोहन,रामा सिंह,धूमल सिंह,बोगो सिंह,प्रह्लाद यादव सहित सैकड़ों बाहुबली आज विभिन्न राजनीतिक दलों के सदस्य हैं और विभिन्न सदनों के वर्तमान या पूर्व सदस्य हैं।चुनाव में इनकी काफी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

प्रदेश में विधान सभा का चुनाव हो रहा है।राजनीतिक दल और राजनेता अपनी-अपनी गोटी सेट कर चुके हैं।प्रदेश का चुनावी इतिहास बताता है कि यहां चुनाव में दो चीजें काफी महत्व रखती हैं,पहली जातीय समीकरण और दूसरा बाहुबली।करीब अस्सी के दशक में प्रदेश की राजनीति का जो अपराधीकरण शुरू हुआ,वो आज पूरी तरह उस रंग में रंग चुका है।बाहुबली जो कभी सुरक्षा पाने के लिए बड़े-बड़े राजनेताओं और अपने पसंद के और उनके मन मुताबिक काम करने वाले राजनेताओं की मदद किया करते थे, वो सारे बाहुबली आज राजनेता बने हुए हैं।ऐसा कोई राजनीतिक दल नजर नहीं आता जिसे बाहुबलियों से परहेज हो।शाहबुद्दीन,रीतलाल यादव,राजबल्लभ यादव,बिंदी यादव, अनंत सिंह,मुन्ना शुक्ला,सुनील पांडे,ललन सिंह,सूरजभान सिंह,पप्पू यादव,आनंद मोहन,रामा सिंह,धूमल सिंह,बोगो सिंह,प्रह्लाद यादव सहित सैकड़ों बाहुबली आज विभिन्न राजनीतिक दलों के सदस्य हैं और विभिन्न सदनों के वर्तमान या पूर्व सदस्य हैं।चुनाव में इनकी काफी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।कहने को तो टी एन सेशन और के जे राव जैसे चुनाव आयुक्त ने चुनाव में काफी हद तक इनकी भूमिका को सीमित कर दिया है,परंतु सच्चाई तो गांवों में रहने वाली आम जनता ही जानती है।दिन-ब-दिन विभिन्न सदनों में अपराधिक तत्वों की संख्या बढ़ती जा रही है।हत्या,लूट,अपहरण और बलात्कार जैसे अपराध के आरोपी आज विभिन्न सदनों में बैठकर प्रदेश के भाग्य विधाता और नीति निर्माता बने हुए हैं।ऐसा लगता है जैसे बाहुबलियों पर राजनीतिक दलों की निर्भरता बढ़ती ही जा रही है।अभी हाल ही में पटना में जदयू नेता संजय सिंह के नेतृत्व में महाराणा प्रताप की जयंती मनाई गई।चूंकि मामला राजपूत समाज को रिझाने का था,विधानसभा चुनाव काफी निकट है तो प्रदेश के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी कार्यक्रम में शिरकत करने पहुंचे हुए थे।यह महज संयोग था या फिर किसी योजना के तहत,ये तो आयोजक ही जाने।परंतु कार्यक्रम में बड़ी संख्या में पूर्व सांसद आनंद मोहन के समर्थक मौजूद थे।मुख्यमंत्री के संबोधन के दौरान बार-बार पूर्व सांसद के समर्थक उनकी रिहाई की मांग करते रहे।आनंद मोहन समर्थकों की बात पर गौर करते हुए सार्वजनिक मंच से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ऐलान किया कि आनंद मोहन उनके पुराने साथी रहे हैं और उनकी रिहाई के लिए उनसे जो बन पड़ेगा वो करेंगे।मुख्यमंत्री के ऐलान के बाद गोपालगंज के तत्कालीन जिलाधिकारी जी कृष्नैय्या हत्याकांड में आजीवन कारावास की सजा काट रहे पूर्व सांसद आनंद मोहन के रिहाई की संभावना बढ़ गई है।एक सार्वजनिक मंच से किसी प्रदेश के मुख्यमंत्री का इस प्रकार का ऐलान,कि एक हत्या की सजा काट रहे व्यक्ति की रिहाई के लिए उनसे जो बनेगा वो करेंगे,यह बेहद शर्मनाक है।यह बात मुख्यमंत्री ने एक ऐसे शख्स के लिए कही है,जो एक जिलाधिकारी की हत्या के मामले में जेल में बंद है।एक ऐसा बाहुबली जिसकी एक जमाने में उत्तरी बिहार में तूती बोलती थी,जिनके नाम से लोग भय खाते थे और जिलाधिकारी की हत्या मामले में अदालत ने जिसे दोषी पाया है और उम्रकैद की सजा सुनाई है।प्रदेश के मुख्यमंत्री का बयान अपने आप में काफी कुछ कहता है।अनुमान लगाया जा सकता है कि प्रदेश की राजनीति और प्रदेश के राजनेता सत्ता पाने के लिए किस हद तक बाहुबलियों पर निर्भर हैं।करीब तीन दशकों से लालू प्रसाद यादव,नीतीश कुमार और रामविलास पासवान प्रदेश की राजनीति के केंद्र रहे हैं।अपराध की दुनिया के बड़े-बड़े बादशाह,इंडिया मोस्ट वांटेड अपराधी,हत्यारे, बलात्कारी और अपहरणकर्ता सब के सब इन तीनों नेताओं के संरक्षण में फले फूले हैं।जो भी बाहुबली और अपराधी तत्व सत्ता के साथ हैं,वो मजे में हैं और जिसने भी सत्ता का विरोध किया,वो अनंत सिंह जैसे सलाखों के पीछे पहुंच गया।एक वक्त वो भी हुआ करता था,जब राजनेता अपराधियों से रात के अंधेरे में मिलते थे,छुप-छुपा कर मिलते थे।एक ये भी वक्त है जब प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री,पूर्व केंद्रीय मंत्री लालू प्रसाद यादव जेल में बंद एक अपराधी रीतलाल यादव से मदद मांगने जेल में पहुंचते हैं,प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री खुले आम एक बाहुबली की रिहाई के लिए जो संभव है करने की बात करते हैं,तो रामविलास पासवान,बाहुबली सूरजभान सिंह का भरपूर इस्तेमाल कर अपने राजनैतिक रसूख को बढ़ाने से नहीं चूकते और कांग्रेस बाहुबली अनंत सिंह को अपनी पार्टी में शामिल करने से गुरेज नहीं करती।कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि प्रदेश के राजनीतिक दल और राजनेताओं की बाहुबलियों पर काफी हद तक निर्भरता है।अब जबकि विधानसभा का चुनाव निकट है, राजनेता इन बाहुबलियों और नए बन रहे बाहुबलियों से अपने संबंधों को सजाने और संवारने में लगे हैं।इस बात की पूरी संभावना है कि चुनाव आते-आते हमारा परिचय राजनीति में पदार्पण करने वाले कुछ और बाहुबलियों से होगा।प्रदेश में बढ़ती अपराधिक घटनाएं यह संदेश दे रही है कि नए-नए कई ऐसे रंगबाज हैं जो राजनेताओं को अपनी ताकत दिखाकर अपनी और आकर्षित करने में लगे हैं।बाहुबल और धनबल आज पार्टियों के टिकट पाने की महत्वपूर्ण शर्त बन चुकी है।दूसरी चीज जो चुनाव में काफी महत्व रखती है,वो है जातीय समीकरण।एक वक्त था जब प्रदेश की राजनीति पर सवर्णों का कब्जा हुआ करता था।देश की आजादी के बाद करीब दो दशक तक प्रदेश की सत्ता पर उच्च जातियों का वर्चस्व रहा जो काफी हद तक 1990 तक कायम रहा।1989 के लोकसभा चुनाव के बाद वी पी सिंह देश के प्रधानमंत्री बने।मंडल आंदोलन ने प्रदेश में राजनीति की दिशा और दशा बदल दी।इस दौर में समाज के पिछड़े समाज से कई नेता उभर कर सामने आए और छा गए।ओबीसी खासकर यादव तब राजनीति के केंद्र में आ गए।1990 में प्रदेश में विधानसभा का चुनाव हुए और लालू प्रसाद यादव प्रदेश के मुख्यमंत्री बने।प्रदेश की राजनीति से सवर्ण दरकिनार होने लगे।यह कहना गलत न होगा कि एक तरफ लालू प्रसाद यादव का उदय हुआ तो दूसरी ओर प्रदेश की राजनीति से सवर्ण जातियां हाशिए पर चली गई।”भूरा बाल साफ करो” का नारा देकर लालू प्रसाद यादव ने प्रदेश की राजनीति में प्रदेश की जनता को अपनी मानसिकता का परिचय दे दिया था।लालू पिछड़ों के मसीहा बनकर उभरे,अगरों के खिलाफ उटपटांग बयान देते रहे।प्रदेश में जातीय विद्वेष बढ़ने लगा।नतीजा एक पर एक कई नरसंहार हुए।मुस्लिम, यादव,पिछड़ों को जोड़ लालू अपनी राजनीतिक रोटी सेंकते रहे।प्रदेश का विकास हो न हो,लालू यादव गरीबों के मसीहा के रूप में स्थापित हो गए।विकास के मोर्चे पर बेहद खराब प्रदर्शन के बावजूद लालू प्रसाद यादव को पिछड़ी जातियों का समर्थन मिलता रहा,जो 2000 के विधानसभा चुनाव तक जारी रहा।परंतु चारा घोटाले में सजा होने,प्रदेश में अपराधिक घटनाओं में लगातार हो रही वृद्धि और कई जातियों का लालू यादव से मोहभंग होने और उन जातियों का नीतीश कुमार के करीब होने की वजह से 2005 के विधानसभा चुनाव में लालू सत्ता से बेदखल हो गए और नीतीश कुमार प्रदेश की सत्ता पर काबिज हो गए।नीतीश कुमार को लालू प्रसाद यादव के वोट बैंक में सेंध लगाने में कामयाबी मिली।एक वक्त था जब मुस्लिम समाज पूरी तरह लालू यादव का समर्थन किया करता था।प्रदेश में मुसलमानों की अच्छी खासी आबादी है।राजनीतिक दल इन्हें वोट बैंक समझते हैं और इन्हें रिझाने में लगे रहते हैं।यही वजह रही कि शहाबुद्दीन जैसे दुर्दांत अपराधी की लालू प्रसाद यादव के शासनकाल में तूती बोलती थी,तो सीमांचल के एक बाहुबली तस्लीमुद्दीन भी लालू के काफी करीब रहे।बाद में तस्लीमुद्दीन सुशासन बाबू नीतीश कुमार के भी करीब आए और उनकी काफी मदद की।ऐसे तो पूर्व केंद्रीय मंत्री तस्लीमुद्दीन ने कई बार विधानसभा और लोकसभा के चुनाव में जीत हासिल की।परन्तु उन पर हत्या और बलात्कार सहित कई आपराधिक मामलों के आरोप लगते रहे।2005 के विधानसभा चुनाव आते-आते वो वोट बैंक खिसक कर नीतीश कुमार के पाले में आ गए।कई पिछड़ी जातियाँ या कुछ ओबीसी और भाजपा के साथ की वजह से सवर्ण जातियां भी नीतीश कुमार की समर्थक हो गई।नतीजा रहा कि 2005 से लगातार नीतीश कुमार प्रदेश के मुख्यमंत्री बने हुए हैं।कहने को तो कहा जाता है कि प्रदेश की जनता ने नीतीश कुमार के विकास मॉडल को अपना समर्थन दिया है और नीतीश कुमार में अपनी आस्था प्रकट की है।परंतु यह अधूरी सच्चाई है।कहने को तो लालू प्रसाद यादव प्रदेश की जाति आधारित राजनीति के सबसे बड़े लाभुक माने जाते हैं,परंतु मेरा ख्याल है कि नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद यादव के वोट बैंक में न सिर्फ सेंध लगाया बल्कि सामाजिक ताने बाने का सबसे अधिक लाभ उठाया।नीतीश कुमार ने जहां मुस्लिम,ओबीसी,दलित और महादलित मतदाताओं को रिझाने के लिए काफी कुछ किया।वहीं भाजपा के सहयोग से उसे सवर्ण जातियों का वोट भी मिलता रहा।अभी जबकि विधानसभा का चुनाव निकट है,नीतीश कुमार ने आनंद मोहन के समर्थन में बयान देकर राजपूत समाज को रिझाने के लिए अपना दांव चल दिया है।अपने पिछले चुनाव में नीतीश कुमार ने विकास,जाति और बाहुबल की लामबंदी पर पूरा फोकस किया है।कहने को तो प्रदेश वासी काफी समझदार हो गए हैं,परंतु यह एक कड़वी सच्चाई है कि बिहार के विधानसभा चुनाव में आज भी जातिययों की काफी महत्वपूर्ण भूमिका है।हर जाति के अपने-अपने नेता हैं।कुछ राजनेताओं ने तो केवल अपनी जाति की आबादी को देखकर अपनी राजनीतिक पार्टी बना ली है।लोक जनशक्ति पार्टी के पूर्व अध्यक्ष रामविलास पासवान की पहचान एक दलित नेता के रूप में होती है और उन्होंने लोक जनशक्ति पार्टी का गठन कर अपने परिजनों को भी दलितों का नेता बनाकर विभिन्न सदनों में भेजने में सफलता पाई है।उपेंद्र कुशवाहा ने कुशवाहा समाज के वोट बैंक को देख अपनी एक अलग राजनीतिक पार्टी बना ली है तो राजनीतिक का ककहरा सीख रहे मुकेश साहनी ने भी अपनी अलग राजनीतिक पार्टी बनाई हुई है।आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश में कुल 120 राजनीतिक दल रजिस्टर्ड हैं।पिछले करीब तीन दशक से सवर्ण जातियां प्रदेश की राजनीति में हाशिए पर रही हैं।हर राजनीतिक दल दलित,महादलित,पिछड़ा,ओबीसी और मुस्लिम वोट बैंक पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए प्रयास करता नजर आया।पिछले तीन दशक में शायद ही कोई ऐसा मौका आया जब किसी राजनीतिक दल ने सवर्ण जातियों को रिझाने के लिए कुछ किया हो।शायद इसकी प्रमुख वजह उनकी आबादी का कम होना और उनका एकजुट न होना रहा।परंतु पिछले कुछ वर्षों से जब से सवर्ण आरक्षण और सवर्ण एकता मंच जैसे कुछ मंच लगातार सवर्ण जातियों को एक करने के लिए लगे हुए हैं,राजनीतिक दलों का ध्यान इस ओर गया है।ऐसी पूरी संभावना नजर आ रही है कि आगामी विधानसभा चुनाव में सवर्ण जातियों की पूछ बढ़ने वाली है।शायद इसी का नतीजा है कि राजद जैसी पार्टी का नेतृत्व पहली बार किसी सवर्ण को दिया जाता है,प्रदेश के मुख्यमंत्री खुले मंच से आनंद मोहन की रिहाई के लिए हरसंभव प्रयास करने का आश्वासन देते हैं,कांग्रेस के अध्यक्ष और कार्यकारी अध्यक्ष में सवर्ण जाति के नेताओं को प्रमुखता से स्थान दिया जाता है तो भारतीय जनता पार्टी में भी सवर्णों की पूछ बढ़ गई है।

Change Language