पेपर लीक विरोधी आंदोलन में शामिल साथियों पर दमन बंद करो!, AISA – JNU

भाजपा सरकार के इशारे पर पुलिस ने पेपर लीक विरोधी आंदोलन में शामिल साथियों के खिलाफ़ बर्बर दमन का अभियान छेड़ दिया है। तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग को लेकर चले इस आंदोलन में शामिल छात्रों और कार्यकर्ताओं को चुन-चुनकर निशाना बनाया जा रहा है। यह लोकतांत्रिक अधिकारों पर सीधा हमला है।

रविवार, 2 अगस्त को मध्य प्रदेश पुलिस जेएनयू छात्रसंघ की संयुक्त सचिव कॉमरेड दानिश के घर पहुँच गई। दानिश उन छात्रों में थीं जिन्होंने धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग को लेकर भूख हड़ताल की थी। पुलिस ने उनके माता-पिता और परिवार के अन्य लोगों से उनकी जानकारी ली, उनके बारे में पूछताछ की और उनका मोबाइल नंबर माँगा। यह सब जानते हैं कि दानिश जेएनयू की आवासीय छात्रा हैं। फिर पुलिस उनके गाँव क्यों पहुँची? क्या इसका मक़सद उनके परिवार को डराना-धमकाना और उन पर दबाव बनाना नहीं था? दरअसल, आंदोलनकारियों के परिवारों को निशाना बनाना भाजपा सरकार की सोची-समझी रणनीति बन चुकी है। सरकार यह मानने को तैयार ही नहीं कि आंदोलनकारी इस देश के वयस्क और स्वतंत्र नागरिक हैं, जिन्हें अपनी बात कहने का पूरा अधिकार है।

कुछ दिन पहले भी पूर्व जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष आइशी घोष की तलाश के बहाने दिल्ली पुलिस ए.के. गोपालन भवन स्थित सीपीआई(एम) के केंद्रीय कार्यालय तक पहुँच गई थी। यह भी इसी दमनकारी सिलसिले की एक कड़ी है। दूसरी ओर भाजपा आईटी सेल और उससे जुड़े गिरोह महिला कार्यकर्ताओं को खुलेआम बलात्कार और यौन हिंसा की धमकियाँ दे रहे हैं। हाल ही में जेएनयू छात्रसंघ की उपाध्यक्ष के. गोपिका बाबू को बेहद शर्मनाक और वीभत्स धमकियाँ दी गईं। लेकिन सारी हदें तब पार हो गईं जब एक 15 साल की नाबालिग बच्ची को कैमरे के सामने माफ़ी माँगने के लिए मजबूर कर दिया गया। गोदी मीडिया और भाजपा आईटी सेल के पूरे नेटवर्क ने मिलकर एक बच्ची पर ऐसा असहनीय दबाव बनाया।

देश ने यह भी देखा कि जंतर-मंतर पर आंदोलनकारियों को खाना और पानी उपलब्ध कराने के कारण जुनैद के माता-पिता ही नहीं, बल्कि उनके दूर के रिश्तेदारों तक को उत्तर प्रदेश पुलिस ने उठा लिया और पूछताछ के नाम पर परेशान किया। इसी तरह एआईसीसीटीयू के साथी कॉमरेड नौशाद, जिन्होंने अपने इलाके में चंदा जुटाकर प्रदर्शनकारियों के लिए पीने के पानी का इंतज़ाम किया था, उन्हें भी दिल्ली पुलिस लगातार तंग करती रही। उन्हें बार-बार फ़ोन किए गए और स्थानीय थाने में हाज़िर होने के लिए मजबूर किया गया।

साथियो, पिछले बारह वर्षों में मोदी सरकार ने असहमति की हर आवाज़ को कुचलने की कोशिश की है। केवल आंदोलनकारियों को गिरफ़्तार करना और उन पर ज़ुल्म ढाना ही नहीं, बल्कि उनके परिवारों, रिश्तेदारों और लोकतांत्रिक आंदोलनों के साथ खड़े होने वाले हर नागरिक को डराना-धमकाना इसकी राजनीतिक कार्यशैली बन चुकी है।

लोकतंत्र पर इस सुनियोजित हमले के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करना आज पहले से कहीं ज़्यादा ज़रूरी है। हमें इन लोकतंत्र-विरोधी और फ़ासीवादी ताक़तों को बेनकाब करना होगा, उन्हें राजनीतिक तौर पर अलग-थलग करना होगा और जनता की संगठित ताक़त से परास्त करना होगा। आइसा

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