परदे के पीछे की खौफनाक कहानी ‼ राजनीति की बिसात और असली मास्टरस्ट्रोक: जब चक्रव्यूह रचने वाला खुद घिर जाए

सत्ता के विरुद्ध हर क्रांति गैरकानूनी होती है, लेकिन क्रांति होती जरूर है। क्रांति की सफलता ही उसे वैध बना सकती है, जबकि असफलता उसे अपराध बना देती है। सत्ता भी तब तक वैध है, जब तक क्रांतियां कुचली जाती हैं। जब क्रांति सत्ता को रौंदती है, तब कहीं जाकर कोई तानाशाह मारा जाता है।

सत्ता का सबसे शातिर मास्टरमाइंड जब संसद के गलियारे में कदम रखता है, तो हवा का रुख अपने आप बदल जाता है‼ सत्ताधारी की चाल में कोई हड़बड़ी नहीं होती , उनकी चुप्पी में भी एक तय रणनीति और सामने वाले को मात देने का भरोसा साफ़ झलकता है‼ विपक्षी खेमा जिस बौखलाहट और बयानबाज़ी के ढोल पीट रहा है, वो असल में उनकी लगातार हो रही करारी राजनीतिक हार की कसक है‼ जब रणनीति काम न आए, तो संसद की मर्यादा को शोर-शराबे की बलि चढ़ाना ही कुछ नेताओं की आख़िरी शरणस्थली बन जाता है‼ राजनीति में इत्तेफ़ाक जैसी कोई चीज़ नहीं होती। 20 जुलाई को नई दिल्ली की सड़कों पर उतरी 2 लाख से भी ज्यादा लोगों की भीड़ कोई स्वतःस्फूर्त जनसैलाब नहीं थी, बल्कि एक सुनियोजित राजनीतिक घेराबंदी थी। देश के कोने-कोने से (बिहार से लेकर तमिलनाडु तक) लोगों को जुटाकर दिल्ली के मुहाने पर खड़ा किया गया‼ मेट्रो स्टेशन बंद हुए तो नई दिल्ली स्टेशन का सहारा लिया गया।

मक़सद साफ़ था‼ संसद की तरफ़ भीड़ झोंककर व्यवस्था को ढहा देना। निशाना कोई दिल्ली पुलिस का सिपाही नहीं, सीधे देश के गृह मंत्री थे‼ साजिश की असली वजह समझते हैं । मॉनसून सत्र से ठीक पहले हवा गर्म थी कि डीलिमिटेशन बिल मेज़ पर आने वाला है। बहुमत का गणित 360के जादुई आंकड़े को छू चुका था। धरने पर बैठी विरोधी पार्टियों को जब 200 लोग जुटाना भारी पड़ रहा था, तब संसद मार्च का यह हिंसक दांव खेला गया। रणनीति बहुत साफ़ और भयानक थी, उकसाओ उपद्रव कराओ गोलियाँ चलवाओ लाशें गिराओ और फिर नैतिकता का चोला पहनकर गृह मंत्री का इस्तीफ़ा माँगो‼ चाल का जवाब चाल से दिया गया । गृह मंत्रालय का स्पष्ट और सख्त निर्देश था। ज़्यादा से ज़्यादा संयम, कम से कम बल प्रयोग। एक भी जान नहीं जानी चाहिए‼ दिल्ली पुलिस ने उकसावे के उस पूरे प्रायोजित चक्रव्यूह को बिना एक भी गोली चलाए ध्वस्त कर दिया। सत्ता ने विरोधियों के बिछाए जाल को उनकी ही आँखों के सामने नाकाम कर दिया‼ लेकिन असल खेल तो अब शुरू हुआ है। तमाशा देखने वालों को लग रहा है कि खेल ख़त्म हो गया। लेकिन आज नॉर्थ ब्लॉक के बंद कमरों में देश की सर्वोच्च सुरक्षा कमान अमित शाह, अजीत डोभाल, IB निदेशक और CRPF प्रमुख एक मेज़ पर बैठे थे‼

घंटों चली इस बैठक का सीधा सा मतलब है: काउंटर-अटैक का नया ब्लूप्रिंट तैयार हो चुका है‼ चक्रव्यूह रचने वाले अब अपनी ही बिछाई बिसात पर घिरने वाले हैं। इंतज़ार कीजिए‼ आज के राजनीति का एक स्याह सत्य यह हो सकता है पर जिस तरह सत्ताधारी संसद में होते हुए भी संसद से गायब वह अलग कहानी व्यक्त कर रही है मतलब सत्ता के विरुद्ध हर क्रांति गैरकानूनी होती है, लेकिन क्रांति होती जरूर है। क्रांति की सफलता ही उसे वैध बना सकती है, जबकि असफलता उसे अपराध बना देती है। सत्ता भी तब तक वैध है, जब तक क्रांतियां कुचली जाती हैं। जब क्रांति सत्ता को रौंदती है, तब कहीं जाकर कोई तानाशाह मारा जाता है। वास्तव में सच तो साबित नहीं होने वाला है ? खैर जो भी हो हर संभावनाओं में देश की भलाई ही है

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