जेन-जी से घबराई सरकार?,राहुल के छात्र संवाद पर पहले रोक, फिर अनुमति के खेल ने खड़े किए सवाल

रितेश सिन्हा

प्रयागराज में राहुल गांधी के ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम को लेकर आयोजन स्थल की अनुमति पहले रद्द होने और बाद में कार्यक्रम के लिए रास्ता साफ होने के घटनाक्रम ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक अनावश्यक विवाद को जन्म दे दिया है। प्रशासनिक स्तर पर इसके अपने कारण हो सकते हैं और किसी राजनीतिक कार्यक्रम को अनुमति देना या नहीं देना प्रशासन का अधिकार भी है। लेकिन जब किसी कार्यक्रम को लेकर फैसला पहले हो और फिर बदल जाए, वह भी तब जब कार्यक्रम का केंद्र छात्र और युवा हों, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। आखिर ऐसी कौन-सी परिस्थिति थी जिसने पहले रोक लगाई और फिर रास्ता खोल दिया?

यह सवाल केवल राहुल गांधी की सभा तक सीमित नहीं है। असली सवाल उस युवा पीढ़ी का है, जिसे आज हर राजनीतिक दल अपने साथ जोड़ना चाहता है। कांग्रेस ने ‘छात्रों की गूंज’ अभियान के जरिए युवाओं के बीच पहुंच बनाने की कोशिश शुरू की है। प्रयागराज को इस अभियान का महत्वपूर्ण पड़ाव बनाना भी राजनीतिक रूप से समझ में आता है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं के लिए प्रयागराज लंबे समय से एक बड़ा केंद्र रहा है। यहां रोजगार, भर्ती, परीक्षा की पारदर्शिता और प्रश्नपत्र लीक जैसे मुद्दे राजनीतिक भाषण नहीं, हजारों परिवारों के भविष्य से जुड़े सवाल हैं। राहुल गांधी ने प्रयागराज में करीब 20 मिनट के संबोधन में युवाओं के रोजगार और भविष्य को लेकर सरकार पर कई गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि एक हजार युवाओं में केवल 12 को स्थायी नौकरी मिलती है। उन्होंने आरोप लगाया कि युवाओं का डेटा लेकर बड़ी कंपनियों को दिया जा रहा है और परिवारों से लाखों करोड़ रुपये लेने के बावजूद बीए-एमए की डिग्री रोजगार की गारंटी नहीं बन पा रही है। इन दावों की अलग-अलग स्तर पर तथ्यात्मक जांच हो सकती है, लेकिन राजनीतिक रूप से राहुल ने स्पष्ट कर दिया कि कांग्रेस अब रोजगार और युवा असंतोष को अपने अभियान का केंद्रीय मुद्दा बनाना चाहती है।

राहुल ने देश में करीब 40 करोड़ युवाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि यही भारत की सबसे बड़ी ताकत हैं। चीन की आर्थिक और रणनीतिक ताकत की चर्चा के बीच उनका कहना था कि भारत के युवाओं के सामने चीन की ताकत भी कम पड़ सकती है। यह केवल भाषण का हिस्सा नहीं था, बल्कि कांग्रेस के राजनीतिक संदेश का भी संकेत था—भारत के पास विशाल युवा शक्ति है, लेकिन यदि उसे रोजगार और अवसर नहीं मिले तो यही शक्ति राजनीतिक बेचैनी में बदल सकती है। राहुल गांधी ने युवाओं के बीच सोशल मीडिया की ‘रील संस्कृति’ पर भी हमला किया। उनका कहना था कि युवाओं से कहा जाता है कि जितनी रील देखनी है, देखें और जितनी बनानी है बनाएं तथा यह 21वीं सदी का नशा है। इस बयान के पीछे राजनीतिक सवाल यह है कि क्या युवाओं का ध्यान उनके वास्तविक भविष्य से हटाकर मनोरंजन और डिजिटल खपत में उलझाया जा रहा है। इस आरोप को राजनीतिक भाषण माना जा सकता है, लेकिन यह सवाल जरूर महत्वपूर्ण है कि डिजिटल युग में युवाओं की आकांक्षाओं और वास्तविक रोजगार अवसरों के बीच बढ़ती दूरी को कैसे कम किया जाए।

प्रयागराज का घटनाक्रम इसी पृष्ठभूमि में और महत्वपूर्ण हो जाता है। कार्यक्रम शाम छह बजे होना था, जिसे बाद में सात बजे किया गया। कांग्रेस के अनुसार 23 जिलों के छात्रों को इसमें आमंत्रित किया गया और दो लाख से अधिक छात्रों ने पंजीकरण कराया। पंजीकरण और वास्तविक उपस्थिति अलग-अलग बातें हैं, लेकिन इससे कांग्रेस की राजनीतिक तैयारी का अंदाजा जरूर मिलता है। पार्टी स्पष्ट रूप से यह संदेश देना चाहती है कि वह छात्रों और युवाओं के बीच अपनी राजनीतिक जमीन तैयार कर रही है। कांग्रेस के लिए यह केवल छात्र संवाद नहीं, बल्कि 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की तैयारी का भी हिस्सा है। पार्टी जानती है कि प्रदेश की राजनीति में उसका आधार लंबे समय से चुनौतीपूर्ण रहा है। ऐसे में युवाओं को केंद्र में रखकर नया राजनीतिक नैरेटिव बनाना उसके लिए जरूरी है। बेरोजगारी, भर्ती, पेपर लीक और शिक्षा की लागत जैसे मुद्दे उसे भाजपा सरकार के सामने एक अलग राजनीतिक मैदान दे सकते हैं।

यही रणनीति भाजपा और योगी सरकार के लिए भी चुनौती है। सरकार के पास अपने काम का बड़ा रिपोर्ट कार्ड है। कानून-व्यवस्था, बुनियादी ढांचे, धार्मिक पर्यटन, निवेश और कल्याणकारी योजनाओं को वह अपनी उपलब्धियों के रूप में प्रस्तुत करती है। लेकिन युवा इससे आगे का सवाल पूछ रहा है। वह जानना चाहता है कि उसके लिए रोजगार के अवसर कितने बढ़े, भर्ती कितनी तेजी से हुई और परीक्षा व्यवस्था कितनी भरोसेमंद बनी। यही कारण है कि अनुमति विवाद को केवल प्रशासनिक मामला कहकर समाप्त कर देना पर्याप्त नहीं होगा। यदि कार्यक्रम स्थल की अनुमति किसी सुरक्षा, कानून-व्यवस्था या अन्य प्रशासनिक कारण से रद्द की गई थी तो सरकार को उसका कारण स्पष्ट करना चाहिए। यदि बाद में परिस्थितियां बदलीं और कार्यक्रम की अनुमति बहाल हुई तो उसका आधार भी बताया जाना चाहिए। लोकतंत्र में प्रशासनिक फैसलों की वैधता जितनी जरूरी है, उनकी पारदर्शिता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

हालांकि केवल इस घटनाक्रम के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना कि सरकार जेन-जी से डर गई है, तथ्यात्मक रूप से जल्दबाजी होगी। राजनीतिक आरोप और प्रमाणित तथ्य अलग-अलग चीजें हैं। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि आज के युवा को नजरअंदाज करना किसी भी सरकार के लिए राजनीतिक जोखिम है। यह पीढ़ी केवल नेताओं के भाषण नहीं सुनती। वह आंकड़े देखती है, सोशल मीडिया पर अलग-अलग दावे पढ़ती है और सरकार तथा विपक्ष दोनों से सवाल करती है। आज का युवा किसी एक राजनीतिक दल की स्थायी संपत्ति नहीं है। वह सरकार की किसी नीति से प्रभावित होकर भाजपा के साथ खड़ा हो सकता है और अगले ही क्षण रोजगार या परीक्षा व्यवस्था पर सरकार से सवाल पूछ सकता है। वह राहुल गांधी का भाषण सुन सकता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वह कांग्रेस का मतदाता बन गया। वह किसी भी राजनीतिक दल को वोट दे सकता है, लेकिन अपने भविष्य का हिसाब सभी से मांग सकता है।

भाजपा के लिए वास्तविक चुनौती राहुल गांधी का कोई एक कार्यक्रम नहीं है। वास्तविक चुनौती युवाओं के मन में मौजूद सवाल हैं। अगर सरकार के पास इन सवालों के ठोस जवाब हैं तो उसे विपक्षी मंचों से घबराने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। उसे छात्रों के बीच जाकर अपना रिपोर्ट कार्ड रखना चाहिए। कितनी भर्तियां हुईं? कितनी परीक्षाएं समय पर हुईं? कितने परिणाम समय पर घोषित हुए? पेपर लीक के मामलों में कितनी कार्रवाई हुई? कितने युवाओं को रोजगार मिला? इन सवालों का जवाब देना ही राजनीतिक मुकाबले का सबसे प्रभावी तरीका होगा। दूसरी ओर कांग्रेस को भी यह समझना होगा कि युवाओं की नाराजगी को राजनीतिक समर्थन में बदलना आसान नहीं है। राहुल गांधी छात्रों से सरकार पर सवाल पूछ सकते हैं, लेकिन छात्रों को राहुल गांधी से भी सवाल पूछना चाहिए। कांग्रेस के पास रोजगार का क्या मॉडल है? परीक्षा व्यवस्था को कैसे पारदर्शी बनाया जाएगा? सरकारी नौकरियों पर बढ़ते दबाव को कैसे कम किया जाएगा? निजी क्षेत्र में गुणवत्तापूर्ण रोजगार कैसे पैदा होगा? युवा अब केवल यह सुनना नहीं चाहता कि सरकार गलत है। वह यह भी जानना चाहता है कि विकल्प क्या है।

राहुल गांधी के साथ प्रियंका गांधी की बेटी मिराया की मौजूदगी भी कार्यक्रम की चर्चा का हिस्सा रही, लेकिन राजनीतिक रूप से उससे अधिक महत्वपूर्ण वह संदेश है जो कांग्रेस ने कार्यक्रम के जरिए देने की कोशिश की। पार्टी युवाओं के बीच एक ऐसा नैरेटिव बनाना चाहती है जिसमें रोजगार और शिक्षा चुनावी राजनीति के केंद्रीय मुद्दे बनें। यदि यह रणनीति सफल होती है तो 2027 के उत्तर प्रदेश चुनाव में राजनीतिक बहस का एक हिस्सा निश्चित रूप से बदल सकता है। भाजपा के लिए इसे केवल कांग्रेस का अभियान मानकर खारिज करना भी जोखिम भरा होगा। बेरोजगारी और भर्ती का सवाल किसी राजनीतिक दल की देन नहीं है। यह उन युवाओं की वास्तविक चिंता है जिन्होंने वर्षों तक परीक्षाओं की तैयारी की है। एक परीक्षा रद्द होना, परिणाम में देरी या भर्ती प्रक्रिया का लंबा खिंचना उनके लिए सिर्फ प्रशासनिक समस्या नहीं होती। इसके पीछे परिवार का पैसा, समय और भविष्य जुड़ा होता है।यही वह भावनात्मक और राजनीतिक जमीन है, जिस पर राहुल गांधी उतरने की कोशिश कर रहे हैं।

राहुल ने यह भी आरोप लगाया कि परिवारों से लाखों करोड़ रुपये लिए जाते हैं और बदले में बीए-एमए की डिग्री मिलती है, लेकिन सर्टिफिकेट रोजगार की गारंटी नहीं देता। यह आरोप व्यापक शिक्षा व्यवस्था पर राजनीतिक हमला है। लेकिन इसके पीछे वास्तविक नीति प्रश्न भी है—क्या उच्च शिक्षा और रोजगार बाजार के बीच पर्याप्त तालमेल है? क्या युवाओं को केवल डिग्री चाहिए या रोजगार योग्य कौशल भी? और क्या सरकार तथा निजी क्षेत्र मिलकर ऐसी व्यवस्था बना पा रहे हैं जिसमें शिक्षा के बाद अवसर सुनिश्चित हो? भारत की युवा आबादी देश के लिए बहुत बड़ा अवसर है। लेकिन जनसांख्यिकीय लाभ तभी आर्थिक ताकत बनता है जब युवाओं को शिक्षा, कौशल और रोजगार मिले। अन्यथा बड़ी युवा आबादी बेरोजगारी, असंतोष और राजनीतिक बेचैनी का कारण भी बन सकती है। इसीलिए प्रयागराज का घटनाक्रम केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है। यह राष्ट्रीय राजनीति में उभरते उस सवाल का संकेत है जिसमें युवा अब केवल चुनावी भीड़ नहीं, बल्कि राजनीतिक एजेंडा तय करने वाला वर्ग बनना चाहता है।

2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में जातीय समीकरण, धार्मिक मुद्दे, कानून-व्यवस्था और सरकारी योजनाएं अपनी जगह महत्वपूर्ण रहेंगे। लेकिन यदि रोजगार, भर्ती और परीक्षा की पारदर्शिता युवाओं के बीच बड़ा मुद्दा बन गई तो सभी दलों को अपनी रणनीति बदलनी पड़ेगी। सरकार के लिए संदेश स्पष्ट है—युवाओं को केवल योजनाओं का लाभार्थी मानना पर्याप्त नहीं। उन्हें अवसर चाहिए, रोजगार चाहिए, ऐसी व्यवस्था चाहिए जिस पर उन्हें भरोसा हो। विपक्ष के लिए संदेश भी उतना ही स्पष्ट है—युवाओं की नाराजगी को वोट में बदलना है तो केवल सत्ता पर हमला नहीं, ठोस विकल्प भी देना होगा। युवा के लिए संदेश सबसे महत्वपूर्ण है—वह किसी राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं है। उसे हर दल से सवाल पूछने का अधिकार है। प्रयागराज में असली सवाल यह नहीं कि राहुल गांधी की सभा से सरकार डरी या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या सरकार उस पीढ़ी के सामने खड़े होकर जवाब देने को तैयार है, जो अब नारे से ज्यादा आंकड़े मांगती है और भाषण से ज्यादा अवसर।

किसी कार्यक्रम की अनुमति रद्द करने से बेरोजगारी खत्म नहीं होती। किसी सभा को रोकने से पेपर लीक का सवाल खत्म नहीं होता। किसी विपक्षी दल पर राजनीति करने का आरोप लगाने से छात्र की बेचैनी खत्म नहीं होती। आज की जेन-जी पूछ रही है—मेरी नौकरी कहां है? मेरी परीक्षा सुरक्षित है या नहीं? मेरी डिग्री का मूल्य क्या है? मेरी मेहनत का परिणाम कब मिलेगा? यही वे सवाल हैं जिनका जवाब आने वाले समय में राजनीतिक दलों का भविष्य तय कर सकता है। प्रयागराज की ‘छात्रों की गूंज’ को केवल राहुल गांधी की सभा के रूप में देखना भूल होगी। यह उस राजनीतिक बदलाव की दस्तक भी हो सकती है जिसमें युवा अब चुनावी मुद्दा बनने से आगे बढ़कर चुनावी एजेंडा तय करने की कोशिश कर रहा है।

सरकार जेन-जी से घबराई है या नहीं, इसका फैसला वक्त करेगा। जेन-जी के सवालों को नजरअंदाज करना अब किसी भी सरकार के लिए आसान नहीं होगा। मंच चाहे राहुल गांधी का हो या सत्ता का—अब असली माइक युवा के हाथ में है, वह नारा नहीं, हिसाब मांग रहा है।

Change Language