रितेश सिन्हा

उत्तर प्रदेश में राज्यसभा की 10 सीटों के लिए चुनाव की घोषणा के साथ ही प्रदेश की राजनीति में एक और बड़ा सियासी मुकाबला शुरू हो गया है। 16 अक्टूबर को होने वाला यह चुनाव भले ही राज्यसभा की 10 सीटों तक सीमित हो, लेकिन इसकी राजनीतिक गूंज 2027 के विधानसभा चुनाव तक सुनाई दे सकती है। यही वजह है कि भाजपा ने राज्यसभा के गणित के साथ-साथ विधानसभा चुनाव की संगठनात्मक तैयारी भी तेज कर दी है और राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने खुद पश्चिमी उत्तर प्रदेश से मोर्चा संभाल लिया है। राज्यसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश के विधायक मतदान करेंगे। मौजूदा संख्या बल के हिसाब से भाजपा सबसे बड़े दल के रूप में सात सीटों की स्थिति में है। उसके सहयोगी दलों को जोड़ दिया जाए तो उसका राजनीतिक आधार और मजबूत हो जाता है। दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के पास मिलाकर दो सीटें सुरक्षित करने लायक संख्या है। ऐसे में दसवीं सीट का गणित सबसे ज्यादा दिलचस्प बन सकता है। एक सीट के लिए करीब 37 मत का कोटा बनता है। भाजपा खेमे के लिए सात सीटों का गणित सहज है, लेकिन आठवीं सीट के लिए अतिरिक्त मतों की जरूरत होगी। यही वह जगह है जहां मुकाबला राजनीतिक रूप ले सकता है। यदि 10 सीटों के लिए 10 उम्मीदवार रहते हैं तो गणित काफी हद तक स्पष्ट रहेगा। लेकिन 11वां उम्मीदवार आते ही विधायकों की प्राथमिकता, अतिरिक्त मत और छोटे दलों तथा असंबद्ध विधायकों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाएगी।

विपक्ष के लिए चुनौती केवल भाजपा का संख्या बल नहीं है। समाजवादी पार्टी के सामने सबसे बड़ा सवाल अपने विधायकों को एकजुट रखने का है। 2024 के राज्यसभा चुनाव में पार्टी को बगावत का सामना करना पड़ा था। इसलिए इस बार प्रत्याशी चयन के साथ-साथ विधायक प्रबंधन भी अखिलेश यादव की बड़ी राजनीतिक परीक्षा है। भाजपा ने राज्यसभा चुनाव से आगे की तैयारी शुरू कर दी है और यहीं नितिन नबीन की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। नबीन ने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद उत्तर प्रदेश में अपना पहला बड़ा पश्चिमी क्षेत्रीय दौरा मेरठ और सहारनपुर से शुरू किया है। 21 और 22 सितंबर के इस दौरे में उन्होंने सांसदों, विधायकों, पूर्व सांसदों, पूर्व विधायकों और संगठन के पदाधिकारियों के साथ बैठकें कीं। बूथ, शक्ति केंद्र, मंडल और जिला स्तर की तैयारियों की समीक्षा भी उनके कार्यक्रम का हिस्सा रही। यह केवल औपचारिक संगठनात्मक दौरा नहीं है। मेरठ से शुरुआत अपने आप में राजनीतिक संदेश देती है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में विधानसभा की 71 सीटें हैं और यह क्षेत्र लंबे समय से भाजपा की चुनावी रणनीति में महत्वपूर्ण रहा है। नबीन का यहां पहुंचना बताता है कि भाजपा 2027 की तैयारी को केवल लखनऊ की बैठकों तक सीमित नहीं रखना चाहती, बल्कि सीधे क्षेत्रीय संगठन और बूथ स्तर तक ले जाना चाहती है।

नबीन की भूमिका इसलिए भी अहम है क्योंकि वह संगठन और चुनावी रणनीति के बीच सीधा सेतु बनने की स्थिति में हैं। राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में उनका काम केवल सार्वजनिक सभाएं करना नहीं, बल्कि यह देखना भी है कि पार्टी का संगठन चुनावी मशीनरी में कितनी तेजी से बदल रहा है। मेरठ में युवा सम्मेलन, शक्ति केंद्र सम्मेलन और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के साथ बैठकें इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा हैं। नबीन ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद भी किया। सहारनपुर में पूर्व सांसदों और विधायकों के साथ बैठक तथा जिला और क्षेत्रीय पदाधिकारियों के साथ रणनीतिक चर्चा से यह स्पष्ट है कि भाजपा नेतृत्व टिकट या चुनावी मुद्दों पर अंतिम दौर की चर्चा से पहले जमीनी संगठन की स्थिति को समझना चाहता है। यानी नबीन का पश्चिमी उत्तर प्रदेश दौरा एक तरह से 2027 के लिए संगठन की परीक्षा भी है। कौन-सा बूथ सक्रिय है, कहां संगठन कमजोर है, किस क्षेत्र में कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय की जरूरत है और किन सामाजिक समूहों तक पार्टी की पहुंच बढ़ानी है—इन सभी सवालों का जवाब संगठनात्मक बैठकों के जरिए तलाशा जा रहा है। यही भाजपा की रणनीति को विपक्ष से अलग करता है। राज्यसभा चुनाव में जहां विपक्ष को अपने विधायकों को टूटने से बचाने और संख्या को एकजुट रखने की चुनौती है, वहीं भाजपा पहले से ही अगले विधानसभा चुनाव की संगठनात्मक जमीन तैयार करने में जुटी दिखाई दे रही है।
सपा के लिए यह अंतर महत्वपूर्ण है। राज्यसभा चुनाव में दो सीटें सुरक्षित करने के बाद भी उसके सामने 2027 का बड़ा राजनीतिक मैदान होगा। अगर पार्टी के विधायक इस चुनाव में एकजुट रहते हैं तो यह संगठन के लिए सकारात्मक संकेत होगा। लेकिन यदि अतिरिक्त प्रत्याशी के कारण क्रॉस-वोटिंग होती है या भीतर से असंतोष सामने आता है तो भाजपा उसे 2027 की राजनीति में भी मुद्दा बना सकती है। बसपा के लिए स्थिति और कठिन है। मौजूदा संख्या बल के आधार पर राज्यसभा की अपनी सीट बचाना उसके लिए मुश्किल है। यदि कोई बड़ा राजनीतिक उलटफेर नहीं हुआ तो चुनाव के बाद उच्च सदन में बसपा का प्रतिनिधित्व समाप्त हो सकता है। यह उत्तर प्रदेश की राजनीति में उसके लगातार सिमटते राजनीतिक आधार का एक और संकेत होगा। नबीन की सक्रियता का दूसरा पहलू यह है कि भाजपा ने 2027 की लड़ाई को अभी से संगठनात्मक स्तर पर शुरू कर दिया है। मेरठ और सहारनपुर के दौरे में उनका फोकस नेताओं से ज्यादा संगठन के विभिन्न स्तरों पर रहा। इसका अर्थ यह है कि भाजपा राज्यसभा चुनाव को एक अलग घटना की तरह नहीं देख रही, बल्कि इसे 2027 की लंबी राजनीतिक तैयारी के बीच रखकर देख रही है।
राज्यसभा चुनाव में विपक्ष के पास अपनी दो सीटें सुरक्षित रखने के लिए संख्या मौजूद है, लेकिन भाजपा के पास संख्या के साथ व्यापक संगठनात्मक ढांचा भी है। नितिन नबीन की पश्चिमी उत्तर प्रदेश यात्रा ने इसी अंतर को रेखांकित किया है। उन्होंने मेरठ से जिस तरह संगठन की कमान संभाली और सहारनपुर तक जाकर बूथ से जिला स्तर तक तैयारियों की समीक्षा की, उससे संकेत मिलता है कि भाजपा 2027 के लिए मैदान पहले ही तैयार करना चाहती है।
16 अक्टूबर का राज्यसभा चुनाव इसलिए सिर्फ 10 सीटों का फैसला नहीं होगा। यह पहला ऐसा पड़ाव होगा जहां यह देखा जाएगा कि विपक्ष अपनी संख्या को एकजुट राजनीतिक ताकत में बदल पाता है या नहीं। दूसरी ओर नितिन नबीन की सक्रियता बताती है कि भाजपा केवल राज्यसभा का गणित नहीं देख रही—उसकी नजर 2027 के पूरे राजनीतिक मैदान पर है।




