संगीत रागी पर रार: तुमने भूमिहार ब्राह्मण की मर्यादा को कलंकित कर दिया

हाल ही में एक सार्वजनिक बहस के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के विचारक और दिल्ली विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर संगीत रागी द्वारा की गई कुछ टिप्पणियों ने समाज के एक बड़े हिस्से, विशेषकर बिहार के प्रबुद्ध नागरिक समाज को गहरे आक्रोश से भर दिया है।

संगीत रागी ने एक टीवी डिबेट में जिस प्रकार की अमर्यादित भाषा और तर्कों का सहारा लिया, उससे न केवल एक समुदाय विशेष की भावनाओं को ठेस पहुँची है, बल्कि उन्होंने उस गौरवशाली भूमिहार ब्राह्मण समाज की समृद्ध और शालीन परंपरा को भी भारी आघात पहुँचाया है, जिससे वे स्वयं आते हैं।

एक महान विरासत पर दाग

प्रोफेसर संगीत रागी से आज पूरा बिहार और देश का बौद्धिक समाज यह पूछ रहा है कि आखिर उन्होंने किस प्रकार के संस्कारों और शिक्षा को ग्रहण किया है? क्या वे उसी बिहार की पावन धरती से आते हैं, जिसने भारतीय इतिहास, संस्कृति और राजनीति को दिशा देने वाले एक से बढ़कर एक मनीषियों को जन्म दिया है? यह वही बिहार है जहाँ राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने अपनी कविताओं से राष्ट्रवाद और साम्यवाद की अलख जगाई, जहाँ महान इतिहासकार प्रोफेसर राघव शरण शर्मा (आर. एस. शर्मा) ने प्राचीन भारतीय इतिहास लेखन को एक नई वैज्ञानिक दृष्टि दी। यह बाबू लंगट सिंह की भूमि है, जिन्होंने मुजफ्फरपुर में लंगट सिंह कॉलेज जैसी ऐतिहासिक संस्था की स्थापना कर शिक्षा के प्रसार में अपना सर्वस्व दान कर दिया। बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री ‘बिहार केसरी’ डॉ. श्रीकृष्ण सिंह (श्रीबाबू) ने सामाजिक न्याय और आधुनिक बिहार के निर्माण की जो नींव रखी, उसे आज भी याद किया जाता है। वहीं, स्वामी सहजानंद सरस्वती ने किसानों और मजलूमों के हक की लड़ाई लड़कर शोषितों की आवाज को बुलंद किया। ये सभी महापुरुष भूमिहार ब्राह्मण समाज के गौरव थे, जिन्होंने हमेशा समाज को जोड़ने, ज्ञान का प्रकाश फैलाने और मर्यादा को बनाए रखने का कार्य किया। लेकिन संगीत रागी ने अपनी ओछी और कटु बयानबाजी से इस महान ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत पर एक गहरा दाग लगा दिया है।

यादव समाज के योगदान पर अमर्यादित टिप्पणी

अपनी बहस के दौरान प्रोफेसर रागी ने यादव समुदाय को लेकर बेहद अपमानजनक और लांछित करने वाली बातें कहीं। यादव समाज का भारत और विशेषकर बिहार के सामाजिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक ताने-बाने में एक अद्वितीय और अमूल्य योगदान रहा है। भगवान कृष्ण की विरासत से जुड़े इस समाज ने हमेशा कर्म और पुरुषार्थ को प्राथमिकता दी है। कृषि से लेकर सेना में देश की रक्षा करने तक, और राजनीति से लेकर शिक्षा के क्षेत्र तक, यादव समाज ने राष्ट्र निर्माण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। किसी एक समुदाय विशेष को इस तरह से सार्वजनिक मंचों पर अपमानित करना न तो एक प्रोफेसर की गरिमा को शोभा देता है और न ही एक प्रबुद्ध नागरिक की मर्यादा को। सबसे परिपक्व और सराहनीय बात यह रही कि प्रोफेसर रागी की इस घोर उत्तेजक और अपमानजनक टिप्पणी के बावजूद, यादव समाज के प्रबुद्ध वर्ग या आम नागरिकों ने पलटकर भूमिहार ब्राह्मण समुदाय पर कोई कीचड़ नहीं उछाला। उन्होंने इस पूरे विवाद में असीम धैर्य और सामाजिक सौहार्द का परिचय दिया, जो उनकी सांस्कृतिक परिपक्वता को दर्शाता है।

शालीनता और तार्किकता की कमी

संगीत रागी खुद को आरएसएस का विचारक और एक बड़ा बौद्धिक चेहरा बताते हैं। लेकिन उनके भीतर उस संगठन की बुनियादी शालीनता और संवाद कला का घोर अभाव दिखता है। अगर उन्हें बौद्धिक विमर्श और तार्किक बहस की समझ सीखनी है, तो उन्हें अपने ही समाज के अन्य बड़े चेहरों की ओर देखना चाहिए। राज्यसभा सांसद और प्रसिद्ध विचारक प्रोफेसर राकेश सिन्हा को कभी किसी ने टीवी बहसों में आपा खोते या अमर्यादित होते नहीं देखा। राकेश सिन्हा अपने घोर राजनीतिक और वैचारिक विरोधियों के बीच भी बेहद तार्किक, शांत और शालीन तरीके से अपनी बात रखते हैं। वे भी उसी भूमिहार ब्राह्मण समाज से आते हैं, लेकिन उनके संवाद में विद्वता झलकती है, कटुता नहीं। इसी तरह जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल माननीय मनोज सिन्हा जी का उदाहरण सबके सामने है। उन्होंने गाजीपुर से लेकर कश्मीर तक अपने कार्यों, कुशल प्रशासन और गरिमापूर्ण आचरण से हर वर्ग के लोगों का दिल जीता है। कश्मीर जैसे संवेदनशील क्षेत्र में उन्होंने जन-जन के प्रिय नेता के रूप में अपनी पहचान बनाई है। मनोज सिन्हा जी की भाषा और कार्यशैली में जो शालीनता और मर्यादा है, संगीत रागी उससे कोसों दूर नजर आते हैं।

सामाजिक समरसता को आघात

एक शिक्षक और प्रोफेसर का दायित्व समाज में ज्ञान की ज्योति जलाना और विभिन्न वर्गों के बीच पुल का काम करना होता है। लेकिन प्रोफेसर संगीत रागी ने ठीक इसके विपरीत काम किया है। उन्होंने अपने बयानों से समाज में जातिगत विद्वेष और कड़वाहट घोलने का प्रयास किया है। उनकी इस हरकत ने पूरे भूमिहार ब्राह्मण समाज को आत्मग्लानि और असमंजस में डाल दिया है। समाज का हर समझदार व्यक्ति आज यह महसूस कर रहा है कि संगीत रागी ने राजनीतिक लाभ या व्यक्तिगत कुंठा के कारण अपनी जाति और समाज के गौरव को नीचा दिखाने का काम किया है। अंततः, यह स्पष्ट है कि किसी भी व्यक्ति की पहचान उसके ज्ञान, आचरण और समाज के प्रति उसके व्यवहार से होती है, न कि केवल एक बड़ी डिग्री या पद से। प्रोफेसर संगीत रागी ने एक पूरे समुदाय को लांछित करके और अपने ही समाज के पुरोधाओं की मर्यादा को ताक पर रखकर यह साबित कर दिया है कि वे बौद्धिक संवाद के योग्य नहीं हैं। उन्हें अपने इस आचरण के लिए न केवल यादव समाज से बल्कि पूरे भूमिहार ब्राह्मण समाज से माफी मांगनी चाहिए, जिनकी छवि को उन्होंने धूमिल किया है।

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