लोक आस्था, शुद्धता और सामाजिक समरसता का सबसे बड़ा महापर्व ‘छठ’ केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह प्रकृति, संस्कृति और मानव जीवन के गहरे अंतर्संबंधों का जीवंत दस्तावेज है।

दुनिया की तमाम संस्कृतियों और धर्मों में उगते हुए सूरज, चढ़ते हुए वक्त और सफलता की वंदना करने की परंपरा रही है। लेकिन बिहार की माटी से उपजी यह अनूठी छठ संस्कृति पूरी दुनिया में अकेली है, जो ढलते हुए सूरज को भी उतना ही सम्मान, अर्घ्य और प्रणाम देती है जितना कि उगते हुए सूरज को। ‘छठ इनसाइड’ के इस विमर्श में हम यह समझने का प्रयास करेंगे कि क्यों बिहारी समाज की यह परंपरा पूरी मानवता को जीवन का सबसे बड़ा दर्शन सिखाती है। छठ महापर्व का सबसे विशिष्ट और अनूठा पहलू इसका पहला अर्घ्य है, जिसे ‘सझिया घाट’ या ‘संध्या अर्घ्य’ कहा जाता है। कार्तिक शुक्ल षष्ठी के दिन व्रती जल में खड़े होकर डूबते हुए सूर्य (अस्ताचलगामी सूर्य) को अर्घ्य देते हैं। सामान्यतः दुनिया में जो ढल रहा है, जो कमजोर हो रहा है या जो विदा ले रहा है, लोग उसकी उपेक्षा करते हैं। लेकिन बिहारी संस्कृति सिखाती है कि जिसका अंत तय है, उसका पुनरागमन भी निश्चित है। डूबते हुए सूरज को प्रणाम करना इस बात का प्रतीक है कि हम अपने अतीत, बुजुर्गों और जीवन के अवसान की ओर बढ़ रहे लोगों के प्रति कृतज्ञ हैं। यह दर्शन सिखाता है कि सुख और दुख, उत्थान और पतन जीवन के दो पहलू हैं। जो आज अस्त हो रहा है, वही कल नई ऊर्जा के साथ उदित होगा। यह अंधकार के बाद प्रकाश की उम्मीद का महापर्व है, जो जीवन के हर दौर में धैर्य और निष्ठा बनाए रखने का संदेश देता है।

छठ पूजा पूरी तरह से प्रकृति को समर्पित है। इसमें किसी मूर्ति की पूजा नहीं होती, न ही किसी भव्य मंदिर की आवश्यकता होती है। इसके केंद्र में साक्षात दिखने वाले देवता सूर्य और उनकी शक्ति ‘छठी मइया’ (प्रकृति की छठी अंश या कात्यायनी देवी) हैं। चार दिनों के इस महापर्व में स्वच्छता और शुद्धता का जो स्तर देखा जाता है, वह विज्ञान को भी हैरान करता है। व्रत की शुरुआत ‘नाहाय-खाय’ से होती है, जिसके बाद ‘खरना’ और फिर दो दिनों का निराजला अर्घ्य होता है। इस दौरान जो प्रसाद बनता है—जैसे ठेकुआ, चावल के लड्डू—वे सभी मिट्टी के चूल्हे पर, आम की लकड़ी का उपयोग कर बेहद शुद्धता से बनाए जाते हैं। अर्घ्य के सूप में चढ़ने वाले फल जैसे डाभ नींबू, सूथनी, शकरकंद, गन्ना, केला और हल्दी का पौधा, सीधे प्रकृति से आते हैं। यह पर्व हमें सिखाता है कि मानव जीवन पूरी तरह से प्रकृति पर निर्भर है, और नदियों, तालाबों तथा जलाशयों को स्वच्छ रखना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है। छठ के बहाने बिहार के लोग अपनी पारंपरिक जल संरचनाओं की सामूहिक सफाई करते हैं, जो आज के समय में पर्यावरण संरक्षण का सबसे बड़ा उदाहरण है।

छठ महापर्व में ऊंच-नीच, अमीर-गरीब और जातिगत भेदभाव पूरी तरह मिट जाते हैं। घाट पर जब अर्घ्य दिया जाता है, तो किसी राजा का सूप और किसी रंक का सूप एक ही नदी के पानी में, एक साथ सूर्य देव के सामने झुकता है। मिट्टी के चूल्हे और बर्तन बनाने वाले कुम्हार से लेकर, सूप-दउरा बुनने वाले डोम समाज के भाइयों तक, हर वर्ग का इस पर्व में अनिवार्य योगदान होता है। जब तक समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति की मेहनत उस दउरे में शामिल नहीं होती, तब तक किसी बड़े से बड़े रईस की पूजा पूरी नहीं मानी जाती। यह पर्व सदियों से समाज को एक सूत्र में पिरोने और समरसता की अलख जगाने का काम कर रहा है।एक समय था जब छठ पूजा को केवल बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश तक ही सीमित माना जाता था। लेकिन आज ‘बिहारी’ जहाँ भी गए—चाहे वह दिल्ली-मुंबई जैसे महानगर हों, या अमेरिका, लंदन, मॉरीशस और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश—वे अपनी इस धरोहर को साथ लेकर गए। आज दुनिया के कोने-कोने में, सात समंदर पार भी टेम्स नदी से लेकर न्यू जर्सी के तटों तक छठ के गीत गूंजते हैं। यह महापर्व अब केवल एक क्षेत्र विशेष का नहीं, बल्कि ग्लोबल स्तर पर बिहारी अस्मिता, उनकी जीवटता और अपनी जड़ों से जुड़े रहने के जज्बे का प्रतीक बन चुका है।

‘छठ’ केवल चार दिनों का त्योहार नहीं, बल्कि एक जीवन शैली है। यह सिखाता है कि उदयाचल (उगते सूर्य) की महिमा तब तक अधूरी है, जब तक हम अस्ताचल (डूबते सूर्य) का आदर करना नहीं सीख जाते। बिहार के लोगों के रग-रग में बसा यह पर्व आज की भागदौड़ भरी और स्वार्थी दुनिया को त्याग, तपस्या, सहअस्तित्व और कृतज्ञता का पाठ पढ़ाता है। इसीलिए गर्व से कहा जाता है कि बिहारी ही वो हैं जो डूबते को भी सहारा देते हैं और उगते को भी सलाम करते हैं।




