दरिंदों में जमुई जैसी हिम्मत कहाँ से आती है? क्या सरकार और प्रशासन निकम्मी है?

सरकार और प्रशासन को ‘निकम्मा’ कहलाने से बचने के लिए कागजी दावों से बाहर निकलकर जमीन पर काम करना होगा। अपराधियों के मन में कानून का ऐसा खौफ पैदा करना होगा कि वे किसी भी गलत हरकत को अंजाम देने से पहले कांप उठें।

बिहार का जमुई जिला एक बार फिर सुर्खियों में है, लेकिन किसी विकास कार्य के लिए नहीं, बल्कि एक ऐसी खौफनाक वारदात के लिए जिसने मानवता को शर्मसार कर दिया है। एक सहपाठी की आबरू पर हाथ डालने की कोशिश करने वाले दरिंदों के सामने जब 10वीं का एक छात्र ढाल बनकर खड़ा हुआ, तो उसने यह साबित कर दिया कि समाज में अभी भी इंसानियत जिंदा है। लेकिन इस पूरी घटना ने एक बहुत बड़ा और कड़वा सवाल हमारे पूरे सिस्टम के सामने खड़ा कर दिया है आखिर इन दरिंदों में इतनी हिम्मत आती कहाँ से है? क्या वाकई हमारी सरकार और कानून-व्यवस्था पूरी तरह निकम्मी हो चुकी है? जमुई की घटना कोई पहली या आखिरी वारदात नहीं है। देश और राज्य में कड़े से कड़े कानून बनने और फास्ट ट्रैक कोर्ट के दावों के बावजूद अपराधियों के हौसले पस्त होने का नाम नहीं ले रहे हैं। जब अपराधी सरेआम किसी बच्ची या महिला को अपना शिकार बनाने की कोशिश करते हैं, तो साफ है कि उनके दिल में कानून का कोई डर नहीं है। अपराधियों में यह हिम्मत रातों-रात नहीं आती। यह हिम्मत पैदा होती है हमारे लचर कानूनी सिस्टम, मामलों के सालों-साल लटकने की प्रक्रिया और सजा की दर (Conviction Rate) बेहद कम होने की वजह से।

जब अपराधियों को पता होता है कि वे संगीन जुर्म करके भी सालों तक जेल और बेल के खेल में बाहर घूम सकते हैं, तो उनका हौसला ‘भेड़ियों’ जैसा खूंखार हो जाता है। जमुई का मामला भी इसी प्रशासनिक और कानूनी ढिलाई का नतीजा है। जनता टैक्स इसलिए देती है ताकि सड़क पर चलते हुए उसकी बहन, बेटी और बच्चे सुरक्षित महसूस कर सकें। लेकिन धरातल की हकीकत यह है कि पुलिस थानों की कार्यशैली अक्सर सवालों के घेरे में रहती है। घटनाओं के बाद पुलिस की मुस्तैदी तो दिखती है, फ्लैग मार्च होते हैं, गिरफ्तारियां भी दिखाई जाती हैं, लेकिन सवाल यह है कि अपराध होने से पहले पुलिस का इंटेलिजेंस और गश्त तंत्र कहाँ सो रहा होता है? क्या प्रशासन केवल एक ‘रिएक्टिव’ फोर्स बनकर रह गया है, जो तभी जागता है जब कोई बड़ी वारदात हो जाती है और मीडिया में बवाल मचता है? जमुई कांड में अगर वह 10वीं का जांबाज छात्र अपनी जान पर खेलकर खड़ा न होता, तो आज प्रशासन एक और बड़ी नाकामी का शिकार हो चुका होता।

पुलिसिंग का मतलब सिर्फ केस दर्ज करना नहीं, बल्कि अपराधियों में ऐसा खौफ पैदा करना है कि वे अपराध करने की सोच भी न सकें। जब तक प्रिवेंटिव पुलिसिंग (अपराध रोकने वाली पुलिसिंग) मजबूत नहीं होगी, तब तक बेटियां सड़कों पर असुरक्षित ही रहेंगी। अक्सर देखा जाता है कि स्थानीय स्तर पर छोटे-मोटे गुंडों और लफंगों को किसी न किसी राजनीतिक दल या स्थानीय रसूखदार व्यक्ति का संरक्षण प्राप्त होता है। पुलिस भी कई बार राजनीतिक दबाव या रसूख के कारण इन असामाजिक तत्वों पर हाथ डालने से कतराती है। यही छोटी-छोटी ढील आगे चलकर जमुई जैसे बड़े कांडों का रूप ले लेती है। जब तक अपराधियों को जाति, धर्म या राजनीति के चश्मे से देखा जाता रहेगा और उन्हें बचाने की कोशिशें होंगी, तब तक इन दरिंदों की हिम्मत बढ़ती रहेगी। सरकार चाहे किसी भी दल की हो, प्रशासनिक तंत्र को पूरी तरह स्वतंत्र और जवाबदेह बनाना उसकी सबसे पहली जिम्मेदारी है। दरिंदों की हिम्मत बढ़ने का एक बड़ा कारण समाज का मूकदर्शक बने रहना भी है।

अक्सर लोग किसी भी झमेले से बचने के लिए आंखें मूंद लेते हैं, जिससे अपराधियों का मनोबल और बढ़ जाता है। लेकिन जमुई के इस 10वीं के छात्र ने समाज को एक नया रास्ता दिखाया है। उसने यह साबित किया कि अगर सही समय पर सही इरादे के साथ खड़े हुआ जाए, तो भेड़ियों के पूरे झुंड को पीछे हटने पर मजबूर किया जा सकता है। यह घटना जहां प्रशासन पर एक बड़ा कलंक है, वहीं इस जांबाज छात्र की बहादुरी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि अगर एक बच्चा अपनी जान दांव पर लगाकर किसी की आबरू बचा सकता है, तो हथियारों और अधिकारों से लैस हमारी पुलिस और प्रशासन ऐसा क्यों नहीं कर पाते?

सरकार और प्रशासन को ‘निकम्मा’ कहलाने से बचने के लिए कागजी दावों से बाहर निकलकर जमीन पर काम करना होगा। अपराधियों के मन में कानून का ऐसा खौफ पैदा करना होगा कि वे किसी भी गलत हरकत को अंजाम देने से पहले कांप उठें। जमुई कांड के असली हीरो को सलाम करने के साथ-साथ सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि उस पीड़ित बच्ची और उस जांबाज छात्र को त्वरित न्याय मिले, और उन सभी दरिंदों को ऐसी कठोरतम सजा दी जाए जो आने वाले समय के लिए एक मिसाल बन सके।

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