क्या कहते हैं आप ? क्या देश इस स्थिति में जा रहा है ? क्या हम मोदी जी को खोने वाले है ? इतना तिरस्कार और स्वीकृति क्यों ?

देवों के देव, दूतों के दूत,अवतारों के अवतार, सरदारों के सरदार, नॉन बायोलॉजिकल,अवतारी पुरुष, महामानव,अवार्डी पुरुष, विश्व गुरु, ब्रह्मांड गुरु , वर्ल्ड लीडर , ग्लोबल लीडर , दिव्य पुरुष , तिलिस्मी शक्तियों वाले , भगवान विष्णु के 56 अवतार, शानदार , जानदार , बेहतरीन , उत्कृष्ट , लाजबाब , कमाल , अद्भुत , अविश्वनीय , प्रभावशाली , प्रेरणादायक , सहारणीय , प्रश्ननीय , उम्दा , बेमिशाल , अनुपम , अतुलनीय , अव्वल , श्रेष्ठ , सर्वेष्ठ , दमदार , जबरदस्त , काबिल ए तारीफ , गुणवान , होनहार , बुद्धिमान , समझदार , विवेकशील , अनुभवी , मेहनती , कर्मठ , ईमानदार , जुझारू , निष्ठावान , समर्पित , लगनशील , अनुशासित , विन्रम , सरल , सज्जन , नेकदिल , एकदिल , उदार , दयालु , सहृदय , मिलनसार , हंसमुख , सकारात्मक , ऊर्जावान , आत्मविश्वासी , साहसी , निडर , दृढनिश्चयी , धैर्यवान , संयमी , जिम्मेदार , भरोसेमंद , विश्वनीयता , सम्मानीय , आदरणीय , प्रेरक , प्रगतिशील , रचनात्मक , सृजनशील , कल्पनाशील , कुशल , निपुण , दक्ष , माहिर , विशेषज्ञ , प्रतिभावान , योग्य , सक्षम , सक्षम नेतृत्वकर्ता , करिश्माई , आकर्षक , ओजस्वी , तेजस्वी , गौरवान्ति करने वाला , प्रेरणा स्रोत , मिसाल , आदर्श , महान , विलक्षण , असाधारण ,उत्कृष्ट व्यतित्व, उच्च विचारों वाले , जनप्रिय , कर्मयोगी , विजेता , विश्व विजेता , गौरव , नवरत्न , कोहिनूर , रत्न , खरा सोना , हीरा , न्यायप्रिय , रक्षक , आत्मबली , सत्यवादी, महान ज्ञानी , एंट्रायर पॉलिटिकल साइंस से MA की हुए, खूबसूरत, सुंदर, हसीन, मनमोहक, आकर्षक, लाजवाब,दिलकश,मोहक,मनोहर,रमणीय,सुहावना,प्यारा,नाज़ुक,चमकदार,दमकता,नूरानी,रौशन,अनुपम,बेमिसाल,अद्वितीय,मनभावन,लुभावना,दिलनशीं,मनमुग्धकारी,सुरम्य,आकर्षण से,भरपूर,कातिलाना,कशिशभरा,स्वर्गिक,अलौकिक,जन्नत-सा,गुलाब-सा,चाँद-सा,परी सा, नयनाभिराम, सुडौल, मनहर, सौम्य, कोमल, मधुर, निराला, बेहतरीन, लुभावनी, शालीन, गरिमामय, तेजस्वी, मनोहारी, मनोमुग्धकारी, अनुपम सौंदर्य वाला, रूपवान

अङ्गेन गात्रं नयनेन वक्त्रं
न्यायेन राज्यं लवणेन भोज्यम्।
श्री श्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी जी जोकि पूरे 800 साल बाद भारत की इस पावन धरा पर अवतार लेकर आए है साथियों , ये छुट मूट पेपर लीक , पेट्रोल इथेनॉल गिरते पुल ब्रिज बांध , बंद होते स्कूल कॉलेज यूनिवर्सिटी सरकारी यूनिवर्सिटी के चक्कर में क्या हम इस महापुरुष को खोने वाले हैं?
छात्रों और युवाओं के आंदोलन समाज की ज्वलंत समस्याओं और उनकी आकांक्षाओं को सामने लाते हैं। किसी भी लोकतांत्रिक ढांचे में, जन आंदोलनों को नेतृत्व के खोने या समाप्त होने के संकेत के रूप में देखने के बजाय, समाज और सरकार के बीच चल रहे निरंतर संवाद के रूप में देखा जाना चाहिए। राजनीति में स्थिरता और बदलाव दोनों ही जनता की सामूहिक इच्छा और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का परिणाम होते हैं। छात्र आंदोलनों और वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य को लेकर समाज में विभिन्न दृष्टिकोण और व्यापक बहस देखने को मिलती है। लोकतान्त्रिक व्यवस्थाओं में जन आंदोलनों, विशेष रूप से छात्र आंदोलनों का इतिहास बहुत गहरा और प्रभावशाली रहा है। भारत के राजनैतिक और सामाजिक इतिहास में छात्रों की भूमिका हमेशा से महत्वपूर्ण रही है, चाहे वह स्वतंत्रता संग्राम के समय का आंदोलन हो या फिर स्वतंत्र भारत में हुए विभिन्न बड़े राजनैतिक बदलाव। किसी भी लोकतांत्रिक देश में नेतृत्व और जन भावनाओं के बीच का रिश्ता बेहद जटिल होता है, जिसे केवल एक नजरिए से नहीं देखा जा सकता।
भारत का इतिहास गवाह है कि जब-जब युवाओं और छात्रों ने किसी बड़े सामाजिक या राजनीतिक मुद्दे पर आवाज उठाई है, तब-तब देश की राजनीति को एक नई दिशा मिली है। 1970 के दशक का ‘जेपी आंदोलन’ (जयप्रकाश नारायण आंदोलन) इसका एक बड़ा उदाहरण है, जिसकी शुरुआत बिहार के छात्रों के असंतोष से हुई थी और आगे चलकर इसने तत्कालीन सरकार के खिलाफ एक बहुत बड़ा राष्ट्रीय रूप ले लिया था। छात्र आंदोलनों को किसी भी जीवंत लोकतंत्र का एक स्वाभाविक हिस्सा माना जाता है, जहाँ युवा अपनी आकांक्षाओं, रोजगार, शिक्षा और नीतियों के खिलाफ अपनी असहमति को शांतिपूर्ण तरीके से प्रकट करते हैं। इस तरह के आंदोलन किसी भी राजनैतिक नेतृत्व के लिए एक चुनौती और जन भावनाओं को समझने का माध्यम दोनों बन सकते हैं। लोकतंत्र में चुनी हुई सरकारों और जन आंदोलनों के बीच का संघर्ष नीतियों में सुधार लाने और व्यवस्था को अधिक पारदर्शी बनाने का काम भी करता है।
वर्तमान समय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व को लेकर देश और दुनिया में कई तरह की धारणाएं मौजूद हैं। उनके समर्थकों का एक बहुत बड़ा वर्ग है जो उन्हें देश को आधुनिक बनाने, वैश्विक मंच पर भारत का कद बढ़ाने और कड़े तथा साहसिक फैसले लेने वाले एक बेहद मजबूत नेता के रूप में देखता है। इस वर्ग में उनके प्रति अगाध श्रद्धा और विश्वास की भावना है, जिसके कारण वे उन्हें एक असाधारण नेतृत्वकर्ता मानते हैं। दूसरी ओर, राजनीतिक विश्लेषकों और आलोचकों का मानना है कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में नेतृत्व की स्थिति जनता के समर्थन, चुनावी नतीजों, आर्थिक नीतियों और सामाजिक स्थिरता पर निर्भर करती है। कोई भी राजनैतिक नेतृत्व आंदोलनों, चुनावों और जनता की बदलती प्राथमिकताओं के दौर से गुजरता है। आलोचकों के अनुसार, लोकतंत्र में सरकार की नीतियों की आलोचना और उनके खिलाफ शांतिपूर्ण प्रदर्शन संवैधानिक अधिकारों के अंतर्गत आते हैं और इन्हें किसी भी सरकार या नेतृत्व की स्थिरता को सीधे तौर पर समाप्त करने वाले कारक के रूप में देखने के बजाय लोकतंत्र की आंतरिक प्रक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए।
लोकतंत्र एक ऐसी व्यवस्था है जो कुछ निश्चित सिद्धांतों और प्रक्रियाओं पर काम करती है। लोकतंत्र में किसी भी नेतृत्व के बने रहने या बदलने का सबसे वैध और मुख्य माध्यम चुनाव होते हैं। जब तक किसी नेता को चुनावी माध्यम से जनता का बहुमत प्राप्त होता है, तब तक उनकी राजनैतिक स्थिति मजबूत बनी रहती है। भारत जैसी मजबूत संवैधानिक व्यवस्थाओं में न्यायपालिका, संसद और चुनाव आयोग जैसी संस्थाएं देश की राजनैतिक स्थिरता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। कोई भी आंदोलन या विरोध प्रदर्शन इन संवैधानिक सीमाओं के भीतर ही अपनी अभिव्यक्ति पाता है। छात्रों या आम जनता के आंदोलनों का उद्देश्य अक्सर सरकार को कुछ विशिष्ट नीतियों (जैसे रोजगार, परीक्षा प्रणाली, शिक्षा नीति) पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर करना होता है। सरकारें अक्सर इन आंदोलनों के जवाब में संवाद और सुधार का रास्ता अपनाती हैं, जिससे राजनैतिक संतुलन बना रहता है।




