अभी हाल ही में वोट चोरी के प्रमाण देते विपक्ष के नेता को देखा , भारत के चीफ जस्टिस पर हमला देखा, गाय , गोबर और मुसलमान के नाम पर मानवता को कुचलते हुए देख रहे हैं , हमने महाराष्ट्र विधानसभा में राजनीति की मर्यादा टूटती हुई देखी।सत्ता सुख के लिए विचारधारा और सिद्धांतों के विपरीत गठबंधन देखा, राजनीतिक सौदेबाजी देखी।
आजादी के लगभग आठ दशक में हम ।इन वर्षों में हमने राजनीति के कई रंग देखे।हमने सिद्धांतों और विचारधारा के प्रति संकल्पित राजनेता भी देखा,तो हम विचारहीन और मौकापरस्त राजनेताओं को भी देख रहे हैं।अभी हाल ही में वोट चोरी के प्रमाण देते विपक्ष के नेता को देखा , भारत के चीफ जस्टिस पर हमला देखा, गाय , गोबर और मुसलमान के नाम पर मानवता को कुचलते हुए देख रहे हैं , हमने महाराष्ट्र विधानसभा में राजनीति की मर्यादा टूटती हुई देखी।सत्ता सुख के लिए विचारधारा और सिद्धांतों के विपरीत गठबंधन देखा, राजनीतिक सौदेबाजी देखी।यह कहना गलत न होगा कि महाराष्ट्र में हुई घटना ने हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था को शर्मिंदा किया।जनतंत्र का मूल स्तंभ जनता,मतदान के बाद हासिये पर है।सत्ता के खेल में विचारधारा और सिद्धांत खत्म हो चुके हैं,मौकापरस्ती हावी हो चुकी है।मतदाता भौंचक है कि आखिर उसने किस दल को या किस गठबंधन को जनादेश देकर सत्ता सौंपी और किसे विपक्ष में बैठने का जनादेश दिया।हाल के वर्षों में हमने देश के कई विभिन्न प्रदेशों में देखा कि चुनाव परिणाम के बाद वहां जमकर सौदेबाजी हुई और जनमत के खिलाफ सरकारें बनी।
हमारे पूर्वजों ने,संविधान निर्माताओं ने काफी सोंच समझकर देश में ऐसी लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्थापना की थी जहां हर किसी को राजनीतिक दल बनाने की छूट है।हर राजनीतिक दल अपनी विचारधारा,अपने सिद्धांत और देश-प्रदेश के विकास के लिए जनता के सामने अपना एजेंडा रखता है।मतदाता अपनी विचारधारा और अपने पसंद के हिसाब से राजनीतिक दलों के सदस्य बनते हैं और उस दल को चुनाव में समर्थन करते हैं। अपनी-अपनी विचारधारा और एजेंडे के साथ राजनीतिक दल चुनाव में अपने प्रत्याशी खड़े करता है और अपने पसंद के हिसाब से मतदाता उन्हें मत देकर विजय बनाते हैं।उसी आधार पर विभिन्न सदनों में लोग पहुंचते हैं और पक्ष और विपक्ष बनता है।इसी प्रकार दलगत राजनीति होती है।मतलब स्पष्ट है कि दलगत राजनीति में विचारधारा काफी महत्वपूर्ण है।समान विचारधारा वाले दल चुनाव में गठबंधन करते हैं और जरूरत पड़ने पर मिलकर चुनाव लड़ते हैं।परंतु वर्तमान में यह व्यवस्था काफी उथल-पुथल नजर आ रही है।ऐसा लगता है कि अब विचारधारा,सिद्धांत और नैतिकता भारतीय राजनीति का हिस्सा नहीं रही।वर्तमान में यदि सबसे महत्वपूर्ण कुछ है तो वो है,कुर्सी।जिसे पाने के लिए राजनेता किसी भी हद तक जा रहे हैं,सिद्धांतों से समझौते कर रहे हैं।ऐसा लगता है कि राजनीतिक दलों की अब विचारधारा रह ही नहीं गई।
बिहार की राजनीति के तीन प्रमुख ध्रुव,लालू प्रसाद यादव,नीतीश कुमार और रामविलास पासवान,सब के सब इस तरह के खेल में शामिल हैं।केंद्रीय मंत्री और लोजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष रामविलास पासवान भारतीय राजनीति के मौसम विज्ञानिक कहे जाते थे ।मौसम वैज्ञानिक उन्हें यूं ही नहीं कहा जाता।इसके पीछे वजह भी है।अपने राजनीतिक कैरियर में विचारधारा, सिद्धांत और नैतिकता को दरकिनार कर रामविलास पासवान कई विभिन्न सरकारों में शामिल हुए और सत्ता का सुख भोग करते रहे और आज भी कर रहे हैं।हवा का रुख देखकर पाला बदलने में रामविलास पासवान राजनीति के माहिर खिलाड़ी माने जाते हैं।इसी की बदौलत उन्होंने अपने भाइयों,पुत्र एवं भतीजे को राजनीति में स्थापित करने में सफलता भी पाई।प्रदेश में ऐसे ही मौकापरस्त राजनेताओं में एक नाम आता है,पूर्व केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा का।जनता दल यू से राजनीतिक जीवन की शुरूआत करने वाले उपेंद्र कुशवाहा पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार शुरू से काफी मेहरबान रहे।उपेंद्र कुशवाहा का नाम तब प्रदेश के लोगों ने अच्छे से जाना जब 2003 में नीतीश कुमार ने उन्हें विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाया।परंतु बाद के दिनों में उपेंद्र कुशवाहा के और नीतीश कुमार के संबंधों में खटास आ गई और तब उपेंद्र कुशवाहा ने जदयू छोड़ दिया। 2009 में एक बार फिर दोनों के संबंध सुधरे,उपेंद्र कुशवाहा ने नीतीश कुमार को समर्थन करना शुरू किया।तब नीतीश कुमार ने उपेंद्र कुशवाहा को राज्यसभा भेज दिया।परंतु 2013 में उपेंद्र कुशवाहा फिर जदयू से अलग हो गए और उन्होंने अपनी अलग राजनीतिक पार्टी ‘रालोसपा’ बना ली।2014 के लोकसभा चुनाव में रालोसपा,राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का हिस्सा बना और तीन सीटों पर खड़े रालोसपा के सभी प्रत्याशी चुनाव जीतने में सफल रहे।उपेंद्र कुशवाहा केंद्र में मंत्री बने।उनकी राजनैतिक महत्वाकांक्षा बढ़ने लगी और 2019 के लोकसभा चुनाव से पूर्व उपेंद्र कुशवाहा ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को छोड़ दिया।2019 के लोकसभा चुनाव में उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी के प्रत्याशियों की सभी सीटों पर हार हुई।अत्यधिक महत्वाकांक्षा और बगैर विचारधारा और सिद्धांतों के आज एक बार फिर उपेंद्र कुशवाहा प्रदेश की राजनीति से दूर हो चुके हैं।एक हैं,राजनेता जगदेव प्रसाद के पुत्र नागमणि।केंद्र की वाजपेयी सरकार में मंत्री रह चुके हैं।कोई विचारधारा नहीं,न कोई सिद्धान्त।निजी लाभ के लिए करीब दर्जन भर दल बदल चुके हैं।जनता दल, शोषित समाज दल,राष्ट्रीय जनता दल,भारतीय जनता पार्टी,लोजपा,जदयू,कांग्रेस सहित शायद ही कोई दल उनसे बचा।हर विचारधारा के अनुसार खुद को ढालने में माहिर हैं।जिंदगी का कोई सिद्धांत नहीं,पता नहीं अभी आगे वह कितने विचारधाराओं को आत्मसात करेंगे। प्रदेश के पूर्व मंत्री रमई राम भी ऐसे ही एक राजनेता हैं,जो कई धुर विरोधी दलों के सदस्य रहे।रमई राम राष्ट्रीय जनता दल के वरिष्ठ नेता रहे हैं और लालू-राबड़ी मंत्रिमंडल में करीब 13 वर्षों तक मंत्री रहे।कांग्रेस में भी गए,जदयू में शामिल हुए।फिर नीतीश कुमार के खिलाफ शरद यादव खेमे में चले गए और एक बार पुनः राजद में वापसी की।1969 में राजनीति में उतरने वाले रमई राम राजनीति में करीब 50 वर्ष गुजार चुके हैं।परंतु अफसोस कि आज भी न कोई सिद्धांत,न विचारधारा।अपने निजी लाभ के लिए कब किधर पलटी मार दें कहा नहीं जा सकता।शरद यादव का नाम भारतीय राजनीति में काफी सम्मान के साथ लिया जाता है।जनता दल यूनाइटेड के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे शरद यादव राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के संयोजक भी रहे।सात बार लोकसभा के सदस्य,जबकि तीन बार राज्यसभा के सदस्य रह चुके शरद यादव केन्द्र की विभिन्न सरकारों में मंत्री भी रह चुके हैं।दो विपरीत विचारधारा लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार,दोनों के करीब रह चुके हैं और फिर अपना अलग राजनीतिक दल ‘लोकतांत्रिक जनता दल’ बनाया।कभी जनता दल यूनाइटेड के राष्ट्रीय अध्यक्ष और सबसे बड़े नेता रहने वाले शरद यादव आज जनता दल यूनाइटेड के सबसे बड़े विरोधी और कभी लालू प्रसाद यादव के धुर विरोधी होने वाले शरद यादव अभी लालू प्रसाद यादव के हिमायती बने हुए हैं।पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी राजनीति के माहिर खिलाड़ी हैं।अपने राजनैतिक जीवन में उन्होंने भी कई दलों और विचारधाराओं के साथ काम किया।1980 और 1985 में कांग्रेस के टिकट से जीतकर विधानसभा पहुंचने वाले जीतन राम मांझी जगन्नाथ मिश्रा मंत्रिमंडल के सहयोगी भी रहे।1990 और 1995 में हार के बाद जीतन राम मांझी कांग्रेस छोड़ राष्ट्रीय जनता दल में शामिल हो गए और राष्ट्रीय जनता दल के टिकट से चुनाव जीत राबड़ी देवी मंत्रिमंडल में मलाई खाने लगे।2005 आते-आते जब प्रदेश में राष्ट्रीय जनता दल की साख गिरी और नीतीश कुमार के सितारे बुलन्द हुए तो ये जनता दल यूनाइटेड में शामिल हो गए।चुनाव जीते और नीतीश कुमार मंत्रिमंडल में मलाई खाने लगे।जदयू नेता के तौर पर नीतीश कुमार की मेहरबानी से प्रदेश के मुख्यमंत्री बने और फिर नीतीश कुमार को ही जदयू से दरकिनार करने की कोशिश की।जदयू को तोड़ने का प्रयास भी किया,काफी हद तक सफल भी हुए।परंतु पूरी तरह सफल नहीं हो पाए।नतीजा मुख्यमंत्री पद से हाथ धोना पड़ा। अपनी राजनीतिक पार्टी ‘हिंदुस्तान आवाम मोर्चा’ बनाई और भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का हिस्सा बने।अपना स्वार्थ सिद्ध होते नहीं देख राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन छोड़ राजद के नेतृत्व वाली महागठबंधन में शामिल हो गए।आज वो प्रदेश की राजनीति में अपनी जमीन तलाश रहे हैं।लोकसभा चुनाव में बुरी तरह हार का मुंह देखने के बाद उनके बयानों से अब यह अनुमान लगाया जा रहा है कि मांझी का महागठबंधन से मोह भंग हो चुका है।आगामी विधानसभा चुनाव में जीतन राम मांझी किस गठबंधन का हिस्सा होंगे,कहना मुश्किल है।1990 में निर्दलीय राजनीति से चुनावी सफर की शुरूआत करने वाले पप्पू यादव ने विभिन्न दलों से होते हुए आज अपनी पार्टी ‘जन अधिकार पार्टी’ बना ली है। अपराधिक इतिहास से जुड़े पप्पू यादव का नाम एक बाहुबली नेता के तौर पर जाना जाता है।राजनीति की शुरुआत में पप्पू यादव ने लालू प्रसाद यादव का काफी सहयोग किया।हालांकि बाद में दोनों के बीच संबंधों में खटास आ गई और एक-दूसरे के विरोधी बन गए।वह राष्ट्रीय जनता दल के अलावा समाजवादी पार्टी,लोजपा से भी जुड़े।एक बार फिर राजद के करीब आए परंतु सम्बन्ध ज्यादा दिन नहीं चला।उसके बाद पप्पू यादव ने अपनी राजनीतिक पार्टी बना ली।जबकि उनकी पत्नी रंजीता रंजन कांग्रेस की सदस्य हैं और कांग्रेस से ही सांसद रह चुकी हैं।आगामी विधानसभा चुनाव में पप्पू यादव किस गठबंधन का समर्थन करेंगे,कहना कठिन है।पूर्व सांसद आनंद मोहन की पत्नी लवली आनंद ने भी अपनी जरूरतों के हिसाब से दल बदलने में कभी परहेज नहीं किया।बिहार पीपुल्स पार्टी,समाजवादी पार्टी,जदयू और कांग्रेस,सभी विचारधारा के साथ उन्होंने अपनी राजनीति की।1995 से प्रदेश की राजनीति में सक्रिय रहने वाले श्याम रजक जो कभी लालू प्रसाद यादव के बेहद करीबी हुआ करते थे।जरूरत के हिसाब से उन्होंने भी अपनी विचारधारा बदलने में वक्त नहीं गंवाई और नीतीश कुमार के सितारे बुलंद होने पर राजद छोड़ जदयू में शामिल हो गए।नीतीश कुमार ने भी प्रदेश की राजनीति में जाति की भूमिका के महत्व को देखते हुए उन्हें मलाई खाने के लिए मंत्री पद दे दिया।कभी प्रदेश की राजनीति में काफी ताकतवर माने जाने वाले नरेंद्र सिंह,महाचंद्र सिंह,मोहम्मद अली अशरफ फातमी सहित कीर्ति झा आजाद,शत्रुघ्न सिन्हा,उदय नारायण चौधरी, पूर्व सांसद अरुण कुमार सिंह,पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रामजतन सिन्हा,पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अशोक कुमार चौधरी,भगवान सिंह कुशवाहा,तारिक अनवर,समेत सैकड़ों राजनेताओं ने अपने निजी लाभ के लिए अपनी विचारधारा और सिद्धांतों से समझौता करने में वक्त नहीं गंवाया और सत्ता सुख के लिए जिधर उन्हें लाभ नजर आया उधर पलटी मार दी।राजनीति के दो विपरीत ध्रुव नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव भी तब एक हो गए जब नीतीश कुमार के भाजपा से संबंध खराब हो गए थे।हमेशा लालू प्रसाद यादव का विरोध कर प्रदेश की सत्ता पर काबिज होने वाले नीतीश कुमार ने भी जरूरत पड़ने पर सत्ता सुख भोगने के लिए विचारधारा और सिद्धांतों से परहेज करने से गुरेज नहीं किया और मतलब निकल जाने पर कुछ घंटों के अंदर राजद छोड़ भाजपा से हाथ मिलाने में भी देर नहीं की।जिस नरेंद्र मोदी का विरोध कर नीतीश कुमार ने भाजपा से संबंध विच्छेद किया था,आज उन्हीं नरेंद्र मोदी की तारीफ करते नीतीश कुमार नहीं थकते और सत्ता का सुख प्राप्त कर रहे है । एक बार फिर बिहार विधानसभा चुनाव में नेताओं के चाल चरित्र और चेहरा बिहार देख रहा है।हमारे यहां राजनीति में दल बदलने को हृदय परिवर्तन कहा जाता है।आश्चर्य होता है दल बदलना वो भी ठीक विपरीत विचारधारा वाले दलों में जाना, आखिर ये कैसा ह्रदय परिवर्तन है ?दल बदलना वो भी टिकट पाने के लिए,दल बदलना वो भी अपने परिजनों को टिकट दिलवाने के लिए,दल बदलना वो भी मंत्री पद की कुर्सी के लिए,दल बदलना वो भी भ्र्ष्टाचार की सजा से बचने के लिए,आखिर ये कैसा हृदय परिवर्तन है ?मतदाताओं के मतों का अपमान कर निजी हित के लिए किसी को भी समर्थन करना, आखिर ये कैसा हृदय परिवर्तन है ?मंत्री पद पाने के अपनी ही पार्टी से गद्दारी कर दूसरे दल को समर्थन करना,यह कैसा हृदय परिवर्तन है? कभी कुर्सी के लिए,कभी पैसों के लिए तो कभी किसी अन्य वजह से अपने विचारधारा,अपने सिद्धांतों को छोड़ दूसरे दलों में शामिल होना आखिर यह कैसा हृदय परिवर्तन है ?अपनी पार्टी छोड़ किसी अन्य दल में शामिल होना या अपने दल के विपरीत जाकर किसी को समर्थन करना हमारे देश में कोई नई बात नहीं है।हमारे राजनेता वर्षों से मतदाताओं के मतों से खेलते आ रहे हैं।हमारे राजनेता वर्षों से हमारे देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था से खेलते आ रहे हैं,उन्हें कलंकित करते आ रहे हैं।भारतीय राजनीति का यह गंदा चेहरा,लोकतंत्र का कोढ़ है।ये घटिया राजनैतिक व्यवस्था भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती है और भ्रष्टाचार मुक्त राष्ट्र के सपने को चकनाचूर करती है।ऐसे मूल्यविहीन,विचारहीन,सिद्धांत विहीन राजनेता जो मतदाताओं का नहीं हुआ,जो अपने दल का नहीं हुआ,वो क्या प्रदेश और देश का भला कर पाएगा ?मतदाता निराश हैं,हताश हैं,अपनी नजरों के सामने अपने मतों का दुरूपयोग देखने को विवश हैं।क्या लोकतंत्र के इस कोढ़ का इलाज मुमकिन है ?