कांवड़ियों का स्वागत उन्हीं की शैली में करें। जो विनम्र और शालीन हैं, उनका विनम्रता और शालीनता से। जो उद्दंड हैं उनका उनके हिसाब से। कांवड़िए के रूप में घूम रहे अपराधियों का डटकर मुकाबला करें। ये समाज के भी दुश्मन हैं और धर्म के भी।भारत में काँवर यात्रा धर्म, इतिहास, समाज और राजनीति का एक जटिल कोलाज है। जहाँ एक तरफ पौराणिक मान्यताएं और निस्वार्थ आस्था इस यात्रा की आत्मा हैं, वहीं दूसरी तरफ राजनीतिकरण और भीड़ तंत्र की वीभत्सता इसकी साख को नुकसान पहुंचा रही हैं।

भारत में काँवर यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं है। यह आस्था, सामाजिक ताने-बाने, राजनीति और जन-उत्साह का एक अनूठा संगम बन चुकी है। श्रावण मास (सावन) में उत्तर भारत की सड़कों पर भगवा रंग के वस्त्र पहने, कंधों पर काँवर उठाए लाखों श्रद्धालुओं का हुजूम उमड़ पड़ता है। ये श्रद्धालु गंगा नदी से पवित्र जल भरकर अपने स्थानीय शिव मंदिरों या प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंगों की ओर पैदल यात्रा करते हैं। इस विशाल जनसमूह की यात्रा के पीछे गहरा धार्मिक इतिहास है। वहीं समकालीन समय में इसका राजनीतिकरण और इसके कुछ नकारात्मक पहलू भी उभरकर सामने आए हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, काँवर यात्रा की शुरुआत पौराणिक काल में हुई थी। कुछ मान्यताओं के अनुसार, त्रेतायुग में श्रवण कुमार ने अपने नेत्रहीन माता-पिता को काँवर में बैठाकर हरिद्वार में गंगा स्नान कराया था। वापसी में उन्होंने अपने माता-पिता के लिए गंगाजल लाया था, जिसे काँवर यात्रा की शुरुआत माना जाता है।

एक अन्य मान्यता के अनुसार, भगवान परशुराम ने सबसे पहले गढ़मुक्तेश्वर (उत्तर प्रदेश) से गंगाजल लाकर पुरा महादेव (बागपत) में शिवलिंग पर अर्पित किया था। सबसे प्रचलित कथा समुद्र मंथन से जुड़ी है। जब मंथन से निकले हलाहल विष को भगवान शिव ने अपने कंठ में समाहित कर लिया, तो उनका शरीर तपने लगा। देवताओं ने उनके शरीर को शीतलता प्रदान करने के लिए पवित्र गंगाजल उन पर अर्पित किया। तभी से सावन के महीने में शिव को गंगाजल चढ़ाने की परंपरा शुरू हुई। ऐतिहासिक रूप से, यह यात्रा पहले बेहद कठिन और सीमित थी। साधु-संत और अत्यंत समर्पित गृहस्थ ही नंगे पैर सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा करते थे। समय के साथ परिवहन के साधनों के विकास और सामाजिक बदलावों ने इसे एक व्यापक जन-आंदोलन का रूप दे दिया है। पिछले दो दशकों में काँवर यात्रा के स्वरूप में भारी बदलाव आया है। कभी शांत और केवल भक्ति रस में डूबी रहने वाली यह यात्रा अब एक भव्य और आक्रामक सांस्कृतिक उत्सव में बदल चुकी है।
इस बदलाव के पीछे राजनीति की एक बड़ी भूमिका रही है। विभिन्न राजनीतिक दलों, विशेषकर दक्षिणपंथी और सत्ताधारी दलों ने काँवरियों को एक बड़े और एकजुट हिंदू वोट बैंक के रूप में देखा है। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और बिहार जैसे राज्यों में सरकारों द्वारा काँवरियों का स्वागत हेलीकॉप्टर से फूलों की बारिश करके किया जाता है। प्रशासन उनके मार्ग की सुरक्षा और सेवा में पूरी तरह जुट जाता है। राजनीतिक दल काँवर यात्रा को सांस्कृतिक पुनरुत्थान के प्रतीक के रूप में पेश करते हैं। इससे बहुसंख्यक आबादी के बीच एक विशेष राजनीतिक संदेश जाता है, जिससे धार्मिक ध्रुवीकरण को बल मिलता है। काँवर यात्रा अब केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं रही, बल्कि यह एक वर्ग विशेष और युवाओं के लिए अपनी धार्मिक व सामाजिक पहचान का प्रदर्शन करने का जरिया बन गई है। काँवर यात्रा का एक दूसरा पहलू भी है जो चिंताजनक है। लाखों की भीड़ में कुछ असामाजिक तत्वों के शामिल होने के कारण यात्रा के दौरान अक्सर हिंसक और वीभत्स घटनाएं देखने को मिलती हैं। सड़कों पर किसी छोटी सी दुर्घटना या विवाद (जैसे काँवर का किसी वाहन से छू जाना) पर काँवरियों की भीड़ उग्र हो जाती है। वाहनों को फूंकना, चालकों की बेरहमी से पिटाई करना और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना आम बात हो गई है। कई बार यह हिंसा वीभत्स रूप ले लेती है, जहाँ कानून-व्यवस्था पूरी तरह असहाय नजर आती है। पारंपरिक रूप से यात्रा में सात्विकता अनिवार्य थी। परंतु अब काँवरियों के कुछ गुटों में तेज डीजे (DJ) संगीत पर अश्लील या भड़काऊ गानों पर नाचना, सड़कों पर यातायात के नियमों की धज्जियां उड़ाना और गांजे व अन्य नशीले पदार्थों का सेवन करना देखा जाता है। राजनीतिक दबाव के कारण पुलिस और स्थानीय प्रशासन अक्सर इन हुड़दंगियों के सामने मूकदर्शक बना रहता है।
काँवरियों को कानून हाथ में लेने पर भी कड़ी सजा नहीं मिलती, जिससे उनका हौसला और बढ़ता है। काँवर यात्रा के दौरान हफ्तों तक राष्ट्रीय राजमार्ग बंद कर दिए जाते हैं। स्कूल, कॉलेज और व्यापारिक प्रतिष्ठान बंद हो जाते हैं। एम्बुलेंस और आवश्यक सेवाओं को भी रास्ता मिलने में कठिनाई होती है, जिससे आम जनता को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है। इन तमाम विवादों और नकारात्मकताओं के बावजूद, काँवर यात्रा के मूल में छिपी धार्मिक श्रद्धा को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता। यह यात्रा भारत के निचले और मध्यम वर्ग के लोगों के लिए एक बहुत बड़ा धार्मिक और सामाजिक मंच है। काँवर यात्रा की सबसे खूबसूरत बात यह है कि इसमें जाति व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो जाती है। यात्रा के दौरान हर व्यक्ति सिर्फ ‘भोले’ या ‘काँवरिया’ होता है। ऊंच-नीच, अमीर-गरीब का भेद मिट जाता है। सभी एक ही रंग के कपड़े पहनते हैं, एक जैसा भोजन करते हैं और एक साथ जमीन पर सोते हैं। यह सामाजिक समरसता का एक बड़ा उदाहरण है। यह यात्रा लाखों गरीब परिवारों के लिए रोजगार का साधन बनती है। सड़कों के किनारे लगने वाले ढाबे, फल विक्रेता, काँवर बनाने वाले कारीगर, कपड़े बेचने वाले और टेंट लगाने वाले लोगों की आजीविका इसी सीजन पर टिकी होती है। इसमें मुस्लिम समुदाय के लोग भी बड़े पैमाने पर काँवर बनाने और सेवा शिविरों में सहयोग करते हैं, जो गंगा-जमुनी तहजीब को दर्शाता है।
भारत में काँवर यात्रा धर्म, इतिहास, समाज और राजनीति का एक जटिल कोलाज है। जहाँ एक तरफ पौराणिक मान्यताएं और निस्वार्थ आस्था इस यात्रा की आत्मा हैं, वहीं दूसरी तरफ राजनीतिकरण और भीड़ तंत्र की वीभत्सता इसकी साख को नुकसान पहुंचा रही हैं। यदि इस यात्रा को उसकी मूल पवित्रता के साथ बनाए रखना है, तो प्रशासन को सख्त होना होगा। आस्था के नाम पर हुड़दंग और हिंसा करने वालों से सख्ती से निपटना आवश्यक है। वहीं राजनीतिक दलों को भी इस धार्मिक भावना का इस्तेमाल अपने संकीर्ण फायदों के लिए करने से बचना चाहिए। काँवर यात्रा तभी सार्थक होगी जब इसमें शामिल हर ‘भोले’ के भीतर शिव जैसी करुणा, संयम और अनुशासन की भावना जाग्रत होगी।




