राहुल गांधी को कभी उनकी ही पार्टी ने ‘युवराज’ के तौर पर पेश किया था, जो उनके लिए एक नकारात्मक टैग बन गया था। लेकिन आज, उन्होंने अपने संघर्ष, तपस्या और युवाओं के साथ सीधे संवाद के बल पर खुद को ‘GenZ का असली युवराज‘ साबित कर दिया है। वे एक ऐसी राजनीति का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं जो नफरत के बाजार में ‘मोहब्बत की दुकान’ खोलने का दम रखती है।

भारतीय राजनीति के कैनवास पर पिछले कुछ वर्षों में एक अभूतपूर्व बदलाव देखने को मिला है। कल तक जिस राजनेता को सोशल मीडिया ट्रोल आर्मी और मुख्यधारा के मीडिया का एक बड़ा हिस्सा गैर-गंभीर नेता साबित करने में जुटा था, आज वह देश की सबसे बड़ी युवा आबादी यानी GenZ (जेनरेशन ज़ी) और मिलनियल्स की पहली पसंद बनकर उभर रहा है। हम बात कर रहे हैं लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की। सफेद टी-शर्ट, बढ़ी हुई दाढ़ी और कंधों पर एक साधारण सा झोला लटकाए देश भर में घूम रहे राहुल गांधी आज केवल कांग्रेस पार्टी के चेहरा मात्र नहीं हैं, बल्कि वे उस पीढ़ी की आवाज़ बन चुके हैं जो खोखले वादों, बेरोजगारी और नफरत की राजनीति से तंग आ चुकी है। यही वजह है कि आज सत्ता पक्ष राहुल गांधी के इस नए अवतार से बेहद परेशान और असहज नजर आ रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भारतीय राजनीति के इतिहास में किसी भी नेता की छवि को बिगाड़ने के लिए जितना पैसा और संसाधन खर्च किए गए, उतना शायद ही किसी और पर किए गए हों। सालों तक राहुल गांधी को ‘पप्पू’ कहकर उनके राजनीतिक करियर को समाप्त करने की कोशिशें हुईं। लेकिन ‘भारत जोड़ो यात्रा’ ने इस पूरे नैरेटिव को हमेशा के लिए बदल दिया।
कन्याकुमारी से कश्मीर तक करीब 4,000 किलोमीटर की पैदल यात्रा ने राहुल गांधी को सीधे आम लोगों, विशेषकर युवाओं से जोड़ दिया। इस यात्रा के बाद जो राहुल गांधी सामने आए, वे किसी बंद कमरे की प्रेस कॉन्फ्रेंस के नेता नहीं थे, बल्कि वे सड़कों पर चलने वाले, लोगों के सुख-दुख को सुनने वाले और उनकी समस्याओं को संसद में उठाने वाले ‘जननायक‘ बन चुके थे। इस जमीनी जुड़ाव ने GenZ को अपनी ओर आकर्षित किया, क्योंकि यह पीढ़ी दिखावे से ज्यादा प्रामाणिकता को पसंद करती है। जेनरेशन ज़ी राहुल गांधी से खुद को जुड़ा हुआ महसूस करते हैं। संसद में सफेद टी-शर्ट पहनकर जाना हो, जूते का फीता बांधना हो, या फिर ट्रक ड्राइवरों, बाइक मैकेनिकों और कुलियों के साथ बैठकर चाय पीना हो राहुल गांधी का यह बेबाक और अनफिल्टर्ड अंदाज युवाओं को बेहद ‘कूल’ लगता है। GenZ को झूठे वादे या पीआर (PR) स्टंट बहुत जल्दी समझ आ जाते हैं। राहुल गांधी जब युवाओं के साथ अपनी कमियों और असफलताओं को साझा करते हैं, तो वे अधिक इंसानी और भरोसेमंद नजर आते हैं। जहाँ देश की मुख्यधारा की राजनीति हिंदू-मुस्लिम, मंदिर-मस्जिद और पुरानी इतिहास की बहसों में उलझी है, वहीं राहुल गांधी लगातार युवाओं के भविष्य से जुड़े मुद्दों पर बात कर रहे हैं।
राहुल गांधी केवल रैलियाँ नहीं कर रहे हैं, बल्कि वे सीधे सरकार की कमजोर दुखती रग पर हाथ रख रहे हैं। यही कारण है कि मोदी सरकार उनके हमलों का जवाब देने में खुद को असहज पा रही है। हाल के दिनों में नीट, यूजीसी-नेट और विभिन्न राज्यों की भर्ती परीक्षाओं में हुए पेपर लीक ने करोड़ों युवाओं का भविष्य अधर में लटका दिया। राहुल गांधी ने इस मुद्दे को संसद से लेकर सड़क तक उठाया और पीड़ित छात्रों से मुलाकात की। सरकार इस मुद्दे पर पूरी तरह रक्षात्मक मुद्रा में आ गई। देश का पढ़ा-लिखा युवा आज रोजगार के लिए भटक रहा है। राहुल गांधी जब भी युवाओं से मिलते हैं, वे नौकरियों की कमी और ‘अग्निवीर’ जैसी योजनाओं के नुकसानों पर बात करते हैं। यह बात सीधे युवाओं के दिलों को छूती है क्योंकि यह उनकी असल जिंदगी की हकीकत है। राहुल गांधी लगातार देश की संपत्ति के कुछ गिने-चुने उद्योगपतियों के हाथों में सिमटने का आरोप लगाते रहे हैं। युवाओं को यह बात समझ आ रही है कि देश का विकास केवल कुछ लोगों तक सीमित हो रहा है, जबकि आम युवाओं के लिए अवसर कम हो रहे है। ‘जितनी आबादी, उतना हक’ का नारा देकर राहुल गांधी ने देश के बहुसंख्यक दलित, पिछड़े और आदिवासी युवाओं के भीतर एक नई उम्मीद जगाई है। यह मुद्दा सीधे तौर पर सामाजिक न्याय से जुड़ा है, जिससे सरकार की पारंपरिक राजनीति का गणित बिगड़ रहा है।
कुछ साल पहले तक सोशल मीडिया पर बीजेपी और उसकी आईटी सेल का एकछत्र राज था। लेकिन आज पासा पूरी तरह पलट चुका है। राहुल गांधी के यूट्यूब वीडियो, रील्स, इंस्टाग्राम पोस्ट और एक्स (ट्विटर) पर उनकी सक्रियता को GenZ बड़े चाव से देख रहा है। उनके यूट्यूब चैनल पर अपलोड होने वाले व्लॉग (Vlogs), जैसे किसी बढ़ई (Carpenter) के साथ काम करना, डिलीवरी बॉय के साथ स्कूटी पर घूमना या आईआईटी के छात्रों के साथ तीखे सवालों के जवाब देना मिलियंस में व्यूज बटोर रहे हैं। युवाओं को लगता है कि राहुल गांधी उनके बीच के ही एक व्यक्ति हैं जो उनकी भाषा बोलते हैं।
सत्ता पक्ष की चिंता केवल इस बात से नहीं है कि राहुल गांधी की लोकप्रियता बढ़ रही है, बल्कि चिंता इस बात की है कि सरकार के पास उनके इस नए अवतार का कोई तोड़ नहीं मिल रहा है। अब अगर सरकार का कोई नेता राहुल गांधी पर व्यक्तिगत टिप्पणी या मजाक उड़ाने की कोशिश करता है, तो जनता और विशेषकर युवा उसे तुरंत खारिज कर देते हैं। राहुल गांधी की छवि अब एक गंभीर, मैच्योर और जमीनी नेता की बन चुकी है। 2024 के लोकसभा चुनावों के बाद मजबूत विपक्ष और नेता प्रतिपक्ष के रूप में राहुल गांधी संसद में सरकार को हर नीति पर घेर रहे हैं। वे प्रधानमंत्री के भाषणों का तथ्यों के साथ जवाब दे रहे हैं, जिससे सरकार को अपनी रणनीतियों पर पुनर्विचार करना पड़ रहा है। बीजेपी की सबसे बड़ी ताकत देश का युवा वोटर रहा है। लेकिन हालिया चुनावों और सर्वे से साफ है कि युवा अब रोजगार और सुरक्षा के नाम पर राहुल गांधी और इंडिया (INDIA) गठबंधन की तरफ आकर्षित हो रहा है। यह सरकार के लिए सबसे बड़ी खतरे की घंटी है।
राहुल गांधी को कभी उनकी ही पार्टी ने ‘युवराज’ के तौर पर पेश किया था, जो उनके लिए एक नकारात्मक टैग बन गया था। लेकिन आज, उन्होंने अपने संघर्ष, तपस्या और युवाओं के साथ सीधे संवाद के बल पर खुद को ‘GenZ का असली युवराज‘ साबित कर दिया है। वे एक ऐसी राजनीति का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं जो नफरत के बाजार में ‘मोहब्बत की दुकान’ खोलने का दम रखती है। भारत की आधी से अधिक आबादी 25 वर्ष से कम उम्र की है, और यदि यह आबादी राहुल गांधी के विचारों से सहमत हो रही है, तो आने वाले समय में देश की राजनीतिक दिशा और दशा पूरी तरह बदलने वाली है। सरकार की परेशानी बिल्कुल जायज है, क्योंकि वे एक ऐसे नेता से मुकाबला कर रहे हैं जिसके खोने के लिए कुछ नहीं है, लेकिन जीतने के लिए पूरा देश और युवाओं का भविष्य सामने खड़ा है।




