राजनीति में अक्सर यह माना जाता था कि आज की युवा पीढ़ी (Gen-Z) सिर्फ रील्स बनाने और सोशल मीडिया तक सीमित है, लेकिन नेहा बोरा के नेतृत्व में हुए इस आंदोलन ने उस धारणा को पूरी तरह बदल दिया है। ओडिशा के शिक्षकों के प्रदर्शन से लेकर देश के कोने-कोने में शोषितों की आवाज बनने तक, नेहा आज राष्ट्रीय स्तर पर छात्र और जन आंदोलनों का चेहरा बन चुकी हैं।

भारतीय छात्र राजनीति और युवा आंदोलनों के इतिहास में कुछ ऐसे मोड़ आते हैं, जो सालों की खामोशी और लाचारी को एक झटके में तोड़ देते हैं। जुलाई-अगस्त 2026 में देश ने एक ऐसा ही ऐतिहासिक आंदोलन देखा, जिसने न सिर्फ दिल्ली के जंतर-मंतर को हिलाकर रख दिया, बल्कि सत्ता के शीर्ष गलियारों को भी झुकने पर मजबूर कर दिया। इस पूरे आंदोलन की धुरी और ‘आंदोलन की आत्मा’ बनकर उभरीं नेहा बोरा (Neha Bora), जो ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की राष्ट्रीय अध्यक्ष और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) की पीएचडी स्कॉलर हैं। नीट (NEET) पेपर लीक, परीक्षा धांधली और देश में फैल रहे बेरोजगारी के संकट के खिलाफ उनके ऐतिहासिक 23 दिनों के आमरण अनशन और बेबाक भाषणों ने उन्हें युवाओं के बीच “आज की भगत सिंह” के रूप में स्थापित कर दिया है। यह आंदोलन तब शुरू हुआ जब देश के लाखों युवाओं का भविष्य नीट (NEET) पेपर लीक की वजह से अधर में लटक गया था। नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) और शिक्षा मंत्रालय के ढुलमुल रवैये से नाराज होकर छात्र सड़कों पर उतर आए। जंतर-मंतर पर शुरू हुए कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) और छात्र संगठनों के इस साझा आंदोलन को वैचारिक और जमीनी नेतृत्व दिया नेहा बोरा ने।

नेहा बोरा ने केवल सोशल मीडिया पर गुस्सा जाहिर करने के बजाय जमीन पर उतरकर लड़ने का फैसला किया। उन्होंने लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक और अन्य छात्र नेताओं के साथ मिलकर बेमियादी भूख हड़ताल शुरू कर दी। अन्न का एक भी दाना लिए बिना, बेहद नाजुक स्वास्थ्य के बावजूद वह 23 दिनों तक अनशन पर डटी रहीं। इस दौरान दिल्ली पुलिस का लाठीचार्ज, भयंकर गर्मी और प्रशासन का दबाव भी उनके हौसलों को डिगा नहीं सका। नेहा बोरा के इस कड़े तप और अनशन का असर यह हुआ कि पूरे देश के छात्र और विपक्ष उनके समर्थन में खड़े हो गए। कांग्रेस नेता राहुल गांधी समेत कई बड़े विपक्षी नेताओं ने 10 जनपथ और जंतर-मंतर पर नेहा बोरा से मुलाकात की और उनकी मांगों को जायज ठहराया। आखिरकार, चौतरफा दबाव के आगे झुकते हुए तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। इस इस्तीफे को भारतीय राजनीति में एक अभूतपूर्व घटना माना जा रहा है। अपने एक वायरल भाषण में नेहा बोरा ने इस जीत पर कहा, “यह इस्तीफा सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं है, बल्कि उस क्रूर और अहंकारी निजाम की हार है जो सोचता था कि युवा चुप रहेंगे। निहत्थे छात्रों की एकजुटता ने साबित कर दिया कि फासीवादी ताकतों के सामने भी जीत संभव है।”
देश के प्रबुद्ध समाज, लेखकों और सोशल मीडिया पर युवाओं ने नेहा बोरा की तुलना सीधे शहीद-ए-आजम भगत सिंह से की है। हाल ही में मुंबई के वाई.बी. चव्हाण ऑडिटोरियम में उनके भाषण को सुनने उमड़ी हजारों की भीड़ और युवाओं के जोश को देखकर वरिष्ठ विश्लेषकों ने लिखा कि हर दौर अपने भगत सिंह की तलाश करता है—कभी वह जेल की कोठरी में मिलता है, तो कभी हाथ में डंडा और माइक थामे विश्वविद्यालय के गेट पर सत्ता को चुनौती देता है। नेहा बोरा आज के दौर की वही आवाज हैं।उनकी तुलना भगत सिंह से किए जाने के पीछे मुख्य कारण हैं. पुलिसिया दमन, लाठीचार्ज और जेल जाने के डर से परे, नेहा ने हमेशा अग्रिम पंक्ति में रहकर आंदोलन का नेतृत्व किया है। समाजशास्त्र की छात्रा होने के नाते उनका विजन सिर्फ परीक्षा रद्द कराने तक सीमित नहीं है। वह नई शिक्षा नीति (NEP), कोचिंग माफिया और शिक्षा के निजीकरण जैसे बुनियादी और ढांचागत मुद्दों पर सरकार को घेरती हैं। उनके भाषणों में कोई घिसे-पिटे राजनीतिक मुहावरे नहीं होते, बल्कि उनके संदर्भ सीधे युवाओं के हॉस्टल, कॉलेज, बेरोजगारी, अपमान और उनके दैनिक संघर्षों से आते हैं। भगत सिंह की तरह नेहा भी समाजवाद की पक्षधर हैं और जातिवाद व सांप्रदायिकता को देश की प्रगति का सबसे बड़ा दुश्मन मानती हैं।
नेहा बोरा की अपनी व्यक्तिगत कहानी भी बेहद दिलचस्प और प्रेरणादायक है। मूल रूप से उत्तराखंड की रहने वाली नेहा के पिता भारतीय सेना (Indian Army) में रहे हैं और उनका परिवार वैचारिक रूप से भारतीय जनता पार्टी (BJP) का प्रबल समर्थक रहा है। एक फौजी की बेटी होने के नाते उन्होंने देश के विभिन्न हिस्सों को देखा, लेकिन जब वह दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) और फिर जेएनयू आईं, तो उनका झुकाव वामपंथी छात्र राजनीति की तरफ हो गया। एक इंटरव्यू में उन्होंने साझा किया था कि उनके विचार उनके परिवार से बिल्कुल अलग थे, जिसके कारण घर में अक्सर तीखी बहसें और वैचारिक दूरियां बन गई थीं। जब वह जंतर-मंतर पर भूख हड़ताल पर बैठी थीं, तो उनके परिवार को इस बात की खबर नहीं थी। लेकिन जब अनशन के 22वें दिन उनकी मां को यह पता चला, तो वह उत्तर प्रदेश के बरेली से सीधे अपनी बेटी के पास जंतर-मंतर पहुंच गईं। एक मां ने अपनी राजनीतिक विचारधारा को पीछे छोड़कर अपनी बेटी के संघर्ष, उसके हौसले और उसके साथियों की सुरक्षात्मक भावना को गले लगा लिया। शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के बाद उनकी भाजपा-समर्थक मां ने ही फोन कर नेहा और देश के छात्रों को बधाई दी थी। जहाँ एक तरफ नेहा बोरा लाखों युवाओं की रोल मॉडल बन चुकी हैं, वहीं दूसरी तरफ वह दक्षिणपंथी संगठनों और सरकार समर्थकों के कड़े निशाने पर भी हैं। उनके कुछ बयानों को लेकर भारी विवाद भी हुआ है। हाल ही में उन्होंने अपने एक भाषण में बीजेपी और आरएसएस (RSS) के खिलाफ वैचारिक लड़ाई को “आजादी की दूसरी लड़ाई” करार दिया, जिस पर दक्षिणपंथी खेमे ने गहरी आपत्ति जताई। आलोचक उन पर समाज को जातियों में बांटने, सेना की व्यवस्था पर सवाल उठाने और चुनिंदा मुद्दों पर राजनीति करने का आरोप लगाते हैं।
इसी वैचारिक रंजिश का नतीजा हाल ही में झारखंड के रांची में देखने को मिला। जब वह वहां JPSC और JSSC परीक्षाओं में हुई गड़बड़ियों के खिलाफ छात्रों के मार्च का नेतृत्व कर रही थीं, तब एक अज्ञात युवक (जिसे दक्षिणपंथी संगठन का सदस्य बताया गया) ने उन पर स्याही फेंक (Ink Attack) दी और ‘जय श्री राम’ के नारे लगाए। इस हमले के बाद भी नेहा डरी नहीं; उन्होंने तुरंत प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा, “स्याही फेंककर या डराकर हमारे हौसलों को नहीं डिगाया जा सकता। यह हमला दिखाता है कि सत्ता हमारे आंदोलन से कितनी डरी हुई है।” राजनीति में अक्सर यह माना जाता था कि आज की युवा पीढ़ी (Gen-Z) सिर्फ रील्स बनाने और सोशल मीडिया तक सीमित है, लेकिन नेहा बोरा के नेतृत्व में हुए इस आंदोलन ने उस धारणा को पूरी तरह बदल दिया है। ओडिशा के शिक्षकों के प्रदर्शन से लेकर देश के कोने-कोने में शोषितों की आवाज बनने तक, नेहा आज राष्ट्रीय स्तर पर छात्र और जन आंदोलनों का चेहरा बन चुकी हैं।
चाहे कोई उनकी विचारधारा से सहमत हो या असहमत, लेकिन इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि नेहा बोरा ने देश के युवाओं को यह सिखा दिया है कि लोकतंत्र में डराना बंद कर देने से सत्ता का अहंकार अपने आप छोटा होने लगता है। 23 दिनों के अनशन की भट्टी में तपकर निकली यह ‘चेली’ आज वाकई भारतीय राजनीति में क्रांति की नई मशाल और इस दौर की “भगत सिंह” बनकर चमक रही है।



