22,006 करोड़ का कर्ज, 6.5 करोड़ में छुट्टी! मोदी राज में उद्योगपतियों के लिए दिवाला या ‘मालामाल’ योजना?

एनसीएलटी के फैसले ने बड़े कर्जदारों की जवाबदेही, बैंकिंग व्यवस्था और जनता के पैसे की सुरक्षा पर खड़े किए गंभीर सवाल- रितेश सिन्हा

देश के चर्चित कारोबारी और मीडिया उद्योगपति सुभाष चंद्रा से जुड़ा मामला भारतीय बैंकिंग और दिवाला व्यवस्था के सामने एक ऐसा सवाल खड़ा करता है जिसे नजरअंदाज करना मुश्किल है। राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण के सामने उनकी व्यक्तिगत गारंटी से जुड़े ऋणदाताओं के करीब 22,006 करोड़ रुपये के स्वीकृत दावे थे, जबकि स्वीकृत समाधान योजना के तहत लगभग 6.5 करोड़ रुपये का भुगतान प्रस्ताव सामने आया। गणित के स्तर पर देखें तो यह स्वीकृत दावों का लगभग 0.03 प्रतिशत है। यहीं से देश में यह बहस शुरू होती है कि आखिर हजारों करोड़ रुपये के दावे कुछ करोड़ रुपये के समाधान तक कैसे पहुंच जाते हैं। यहां एक तथ्य स्पष्ट करना जरूरी है। 22,006 करोड़ रुपये को सुभाष चंद्रा का व्यक्तिगत रूप से लिया गया कर्ज नहीं होगा, यह उन कंपनियों से जुड़े दावे हैं जिनके ऋण के लिए उन्होंने व्यक्तिगत गारंटी दी थी। मूल कंपनियों और उपलब्ध दूसरी संपत्तियों से ऋणदाताओं की वसूली के रास्ते अलग से बने हुए हैं। व्यक्तिगत गारंटी के स्तर पर इतनी बड़ी रकम के सामने केवल कुछ करोड़ रुपये की वसूली निश्चित रूप से गंभीर सवाल खड़े करती है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर हजारों करोड़ रुपये के ऋण के पीछे प्रमोटर की व्यक्तिगत गारंटी ली गई थी, तो संकट आने पर उस गारंटी की वास्तविक आर्थिक कीमत इतनी कम कैसे निकली? बैंक और वित्तीय संस्थान किसी बड़े कारोबारी को हजारों करोड़ रुपये का ऋण केवल नाम देखकर नहीं देते। कंपनी की संपत्ति, कारोबार, नकदी प्रवाह, शेयर मूल्य, भविष्य की क्षमता और प्रमोटर की व्यक्तिगत गारंटी जैसे अनेक पहलुओं का मूल्यांकन किया जाता है। फिर इतनी बड़ी देनदारी के मामले में व्यक्तिगत स्तर पर वसूली इतनी मामूली क्यों रह गई, इसका जवाब जनता को मिलना चाहिए।

यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ऋणदाताओं में बड़े वित्तीय संस्थानों के नाम सामने आए हैं। रिपोर्टों के अनुसार एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस, एचडीएफसी बैंक, एक्सिस बैंक, केनरा बैंक, आरबीएल बैंक और यूनियन बैंक जैसे संस्थानों ने इस प्रक्रिया में अपने दावे और आपत्तियां रखीं। यानी मामला किसी छोटे कारोबारी ऋण का नहीं, बल्कि देश की बड़ी वित्तीय संस्थाओं से जुड़े हजारों करोड़ रुपये के दावों का है। जब ऐसी रकम का सवाल हो तो केवल कानूनी प्रक्रिया पूरी हो जाना पर्याप्त नहीं माना जा सकता; यह भी देखना होगा कि सार्वजनिक और संस्थागत धन की अधिकतम वसूली के लिए हर संभव प्रयास हुआ या नहीं। राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण ने जिस समाधान को मंजूरी दी, उसके पीछे ऋणदाताओं की मतदान प्रक्रिया भी है। प्रस्ताव को आवश्यक बहुमत मिला और उसके बाद न्यायाधिकरण ने उसे मंजूरी दी। इसका अर्थ यह नहीं कि न्यायाधिकरण ने किसी उद्योगपति को मनमाने ढंग से हजारों करोड़ रुपये माफ कर दिए। लेकिन आम नागरिक के नजरिए से समस्या यह है कि कानूनी रूप से वैध समाधान और आर्थिक रूप से न्यायपूर्ण समाधान हमेशा एक ही चीज नहीं होते। यही वह जगह है जहां व्यवस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही महत्वपूर्ण हो जाती है। दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता को इसी उद्देश्य से बनाया गया था कि डूबती कंपनियों की संपत्तियों को बचाया जाए, लंबी अदालती लड़ाई से बचा जाए और ऋणदाताओं को बेहतर वसूली मिले। इस व्यवस्था ने कई बड़े मामलों में बैंकों को उल्लेखनीय रकम वापस दिलाई है। इसलिए पूरी दिवाला व्यवस्था को विफल बताना तथ्यात्मक रूप से गलत होगा। समस्या वहां पैदा होती है जहां किसी बड़े कर्जदार के मामले में स्वीकृत दावे और वास्तविक वसूली के बीच जमीन-आसमान का अंतर दिखाई देता है।

यहीं से ‘हेयरकट’ शब्द पर भी सवाल उठता है। वित्तीय दुनिया में यह सामान्य शब्द है, इसका अर्थ बहुत सीधा है—बकाया रकम का बड़ा हिस्सा वापस न मिलना। अगर हजारों करोड़ रुपये के दावे हों और समाधान राशि कुछ करोड़ रुपये हो तो आम आदमी यह पूछने को मजबूर होगा कि आखिर नुकसान किसका हुआ। कर्ज देने वाली संस्था का, उसके निवेशकों का, जमाकर्ताओं का या व्यापक अर्थव्यवस्था का? भारत में बैंकिंग व्यवस्था की रीढ़ करोड़ों लोगों की बचत है। सरकारी बैंकों में जनता का पैसा होता है और निजी वित्तीय संस्थानों में भी आम नागरिकों, निवेशकों और संस्थागत पूंजी की बड़ी हिस्सेदारी होती है। इसलिए बड़े कॉरपोरेट ऋणों का संकट केवल उद्योगपति और बैंक के बीच का निजी विवाद नहीं है। उसका प्रभाव पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। एक छोटा व्यापारी कुछ किश्तें चूक जाए तो बैंक नोटिस भेजता है। गृह ऋण की किश्त रुक जाए तो परिवार पर संपत्ति गंवाने का खतरा मंडराने लगता है। किसान या छोटा उद्यमी बैंक के दबाव में आ जाता है। लेकिन बड़े कारोबारी समूहों के हजारों करोड़ रुपये के मामले वर्षों तक पुनर्गठन, समझौते, दिवाला प्रक्रिया और कानूनी लड़ाइयों में घूमते रहते हैं। सवाल यह नहीं कि किसी बड़े कारोबारी को कानून का लाभ क्यों मिला; सवाल यह है कि क्या वही व्यवस्था छोटे कर्जदार को भी समान अवसर और समान संवेदनशीलता देती है?

सुभाष चंद्रा का मामला इसी दोहरेपन की धारणा को और मजबूत करता है। यह धारणा लोकतंत्र और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए खतरनाक है कि बड़े उद्योगपतियों के लिए नुकसान का रास्ता अंततः बैंक की बैलेंस शीट तक पहुंच जाता है, जबकि छोटे कर्जदार के लिए नुकसान सीधे उसके घर और कारोबार तक पहुंचता है। मोदी सरकार के कार्यकाल में बैंकिंग क्षेत्र में खराब ऋणों की सफाई और दिवाला व्यवस्था को मजबूत करने को महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसमें कोई संदेह नहीं कि बैंकिंग क्षेत्र की स्थिति पहले की तुलना में बेहतर हुई है और दिवाला संहिता के माध्यम से बड़ी मात्रा में वसूली हुई है। लेकिन यही उपलब्धियां सरकार पर एक दूसरी जिम्मेदारी भी डालती हैं—बड़े ऋणों में जवाबदेही और वसूली की प्रक्रिया इतनी पारदर्शी हो कि जनता को यह महसूस न हो कि कानून का सबसे बड़ा लाभ ताकतवर कर्जदार को मिल रहा है। बड़ा सवाल यह भी है कि हजारों करोड़ रुपये का ऋण देते समय बैंकों ने क्या पर्याप्त जोखिम मूल्यांकन किया था। क्या प्रमोटर की व्यक्तिगत संपत्ति और गारंटी का स्वतंत्र मूल्यांकन हुआ था? क्या समय रहते जोखिम की पहचान की गई? क्या ऋण की निगरानी पर्याप्त थी? क्या संकट के शुरुआती संकेतों पर कार्रवाई हुई? और यदि नहीं हुई तो उन अधिकारियों और संस्थाओं की जिम्मेदारी कौन तय करेगा जिन्होंने इतना बड़ा जोखिम स्वीकार किया?

किसी भी बैंकिंग व्यवस्था में केवल कर्जदार की जवाबदेही नहीं होती। कर्ज देने वाले की भी जवाबदेही होती है। अगर 100 करोड़ रुपये के ऋण में गलती हो तो वह गंभीर है, लेकिन हजारों करोड़ रुपये के ऋण में जोखिम का गलत आकलन राष्ट्रीय आर्थिक चिंता बन जाता है। यहां एलआईसी से जुड़े सवाल भी महत्वपूर्ण हैं। यदि किसी वित्तीय संस्था ने इस समाधान का विरोध किया या अपनी आपत्ति दर्ज कराई, तो उसकी आपत्ति के आधार और उसके आर्थिक प्रभाव को सार्वजनिक बहस में सामने आना चाहिए। आखिर संस्थागत धन के संरक्षक होने के नाते वित्तीय संस्थाओं की जिम्मेदारी केवल कानूनी प्रक्रिया में भाग लेने तक सीमित नहीं हो सकती। इस पूरे मामले को ‘कर्ज माफी’ बताकर राजनीतिक नारा बना देना भी उचित नहीं होगा। मूल कंपनियों के विरुद्ध दावे और उनसे संभावित वसूली अलग विषय हैं। समाधान प्रक्रिया में अन्य संपत्तियों और संभावित वसूली के रास्ते भी मौजूद हो सकते हैं। इसलिए 22,006 करोड़ रुपये के पूरे दावे को 6.5 करोड़ रुपये में समाप्त मान लेना तथ्यात्मक रूप से अधूरा निष्कर्ष होगा।व्यक्तिगत गारंटी के स्तर पर 99 प्रतिशत से अधिक की कटौती जैसा आंकड़ा सामान्य नहीं है। इतनी बड़ी कटौती व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने के लिए पर्याप्त है। और इन सवालों का जवाब किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष में नहीं, बल्कि दस्तावेजों, आंकड़ों और पारदर्शिता के आधार पर दिया जाना चाहिए।

भारत को ऐसी अर्थव्यवस्था चाहिए जहां उद्योगपति जोखिम लें, निवेश करें और रोजगार पैदा करें। लेकिन उद्योगपति होना बैंक के पैसे पर विशेषाधिकार का प्रमाणपत्र नहीं हो सकता। मुनाफा निजी हो और नुकसान सार्वजनिक—यह मॉडल लंबे समय तक नहीं चल सकता। दिवाला कानून का उद्देश्य ईमानदार कारोबारी विफलता को अपराध बनाना नहीं है। कारोबार में नुकसान होना स्वाभाविक है। लेकिन यदि किसी कारोबारी समूह ने हजारों करोड़ रुपये का ऋण लिया, संकट आया और अंततः ऋणदाताओं को बहुत छोटी रकम स्वीकार करनी पड़ी, तो यह जरूर पूछा जाना चाहिए कि व्यवसाय की विफलता कहां खत्म होती है और प्रबंधन की जवाबदेही कहां से शुरू होती है। भारत को अब केवल बड़े ऋणों की वसूली के आंकड़े गिनने से आगे बढ़ना होगा। हर बड़े कॉरपोरेट ऋण में यह भी सामने आना चाहिए कि ऋण किस आधार पर मंजूर हुआ, जोखिम का मूल्यांकन किसने किया, सुरक्षा के रूप में क्या लिया गया, संकट की पहचान कब हुई और वसूली में कितनी रकम वापस आई। यदि कहीं गंभीर लापरवाही हुई है तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।

सवाल सिर्फ 22,006 करोड़ रुपये बनाम 6.5 करोड़ रुपये का नहीं है। सवाल है भारत की बैंकिंग व्यवस्था में जोखिम किसका है, मुनाफा किसका है और नुकसान आखिर किसकी जेब से जाता है? अगर इसका जवाब बार-बार बैंक की बैलेंस शीट में मिलता है, तो अंततः उसका बोझ किसी न किसी रूप में जनता पर ही पड़ता है। यही वजह है कि सुभाष चंद्रा प्रकरण को केवल एक कारोबारी की दिवाला प्रक्रिया मानकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं होगा। यह भारत की उस कर्ज संस्कृति का आईना है, जहां छोटे कर्जदार के लिए एक लाख रुपये भी भारी हो सकते हैं, लेकिन बड़े कारोबारी के मामले में हजारों करोड़ रुपये कानूनी प्रक्रियाओं के भीतर अलग-अलग रूप धारण करते दिखाई देते हैं। कानून का लाभ सबको मिलना चाहिए, लेकिन जनता का पैसा बचाने की जिम्मेदारी भी सबकी समान होनी चाहिए। वरना सवाल उठता रहेगा—22,006 करोड़ रुपये के दावे और 6.5 करोड़ रुपये के समाधान के बीच आखिर वह 22 हजार करोड़ रुपये का अंतर गया कहां?

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