नरेंद्र मोदी को भगवान बनाने या मानने में मुझे बहुत खुशी होगी। उनमें भगवान होने के सारे गुण विद्यमान हैं। मैं तो यह कहूंगा, देश में उनके सिवा कोई और इस पद के लिए योग्य नहीं है। आजकल भगवानों के बारे जिस तरह के तथ्य उजागर हो रहे हैं, उनके मुताबिक मोदी जैसा हुए बिना कोई भगवान हो ही नहीं सकता। मैं तो मोदी को सारे भगवानों से श्रेष्ठ मानता हूं। एपस्टीन का किस्सा छोड़ दें, तो मोदी पर बच्चियों या स्त्रियों के उद्धार के ज्यादा दृष्टान्त नहीं मिलते। भगवानों के नारी उद्धार के तो अनगिनत किस्से हैं।

यह वक्तव्य वर्तमान भारतीय राजनीति और जनमानस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि के एक खास पहलू को रेखांकित करता है। लोकतंत्र में किसी राजनेता के प्रति ऐसी अगाध श्रद्धा, व्यक्ति पूजा (Personality Cult) और उसके राजनीतिक व सामाजिक प्रभाव है। “नरेंद्र मोदी को भगवान बनाने या मानने में मुझे बहुत खुशी होगी। उनमें भगवान होने के सारे गुण विद्यमान हैं।” यह किसी एक समर्थक की भावुक अभिव्यक्ति मात्र नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक जनभावना का हिस्सा है जिसने पिछले एक दशक में भारतीय राजनीति की धुरी को बदल कर रख दिया है। भारत जैसे सांस्कृतिक और धार्मिक रूप से समृद्ध देश में नायकों को पूजने की परंपरा सदियों पुरानी है। लेकिन जब यह श्रद्धा समकालीन राजनीति के शीर्ष पुरुष पर केंद्रित होती है, तो यह गहरे राजनीतिक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक विमर्श को जन्म देती है। देश का एक बड़ा वर्ग नरेंद्र मोदी में ‘दैवीय गुण’ देखता है और लोकतांत्रिक चश्मे से इसके क्या मायने हैं। किसी नेता को भगवान का दर्जा देने या उसमें अलौकिक छवि देखने के पीछे ठोस मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कारण होते हैं। नरेंद्र मोदी के प्रशंसकों के पास उन्हें इस ऊंचे पायदान पर बिठाने के अपने तर्क हैं। समर्थकों का मानना है कि चाहे वैश्विक महामारियां हों, आर्थिक चुनौतियां हों या सीमा पर सुरक्षा का संकट, नरेंद्र मोदी ने हमेशा एक ‘रक्षक’ या संकटमोचक की तरह देश को संभाला है।

बिना छुट्टी लिए लगातार काम करना, त्योहारों को सरहद पर सैनिकों के साथ मनाना और व्यक्तिगत भोग-विलास से दूरी बनाना, जनता की नजर में उन्हें एक ‘तपस्वी’ या संत का दर्जा देता है। अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण, काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का पुनरुद्धार और अनुच्छेद 370 की समाप्ति जैसे निर्णयों ने बहुसंख्यक समाज के एक बड़े हिस्से को यह विश्वास दिलाया कि वे किसी सामान्य राजनेता नहीं, बल्कि एक ‘ऐतिहासिक युगांतरकारी पुरुष’ के कालखंड में जी रहे हैं। इस जनभावना को समझने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों से आए उदाहरणों को देखा जा सकता है। भारत के कुछ राज्यों (जैसे उत्तर प्रदेश और गुजरात) में अति-उत्साही प्रशंसकों द्वारा नरेंद्र मोदी की मूर्तियां स्थापित करने या उनके नाम पर छोटे मंदिर बनाने की खबरें सामने आ चुकी हैं। हालांकि स्वयं प्रधानमंत्री ने अतीत में ऐसी प्रवृत्तियों की खुलकर निंदा की है और समर्थकों से व्यक्ति पूजा के बजाय राष्ट्र निर्माण पर ध्यान केंद्रित करने को कहा है, फिर भी लोगों के दिलों में उनके प्रति ‘भगवान’ जैसी निष्ठा कम नहीं हुई। ग्रामीण भारत में उज्ज्वला योजना, मुफ्त राशन (प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना) और पक्के मकान (पीएम आवास योजना) का लाभ पाने वाले करोड़ों गरीबों के लिए नरेंद्र मोदी का नाम केवल एक प्रधानमंत्री का नाम नहीं है। कई लाभार्थी अपनी बातचीत में उन्हें “भगवान का भेजा हुआ दूत” कहते हैं, जिसने उनके अंधेरे घरों में रोशनी पहुंचाई। यह सीधे तौर पर शासकीय योजनाओं का भावनात्मक और आध्यात्मिक रूपांतरण है। जहां समर्थकों के लिए यह अगाध प्रेम का प्रतीक है, वहीं समाजशास्त्रियों और राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग इसे लोकतांत्रिक मूल्यों के लिहाज से संशय की नजर से देखता है।
संविधान निर्माता डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने संविधान सभा के अपने अंतिम भाषण में एक गंभीर चेतावनी दी थी। उन्होंने कहा था:
“धर्म में भक्ति आत्मा की मुक्ति का मार्ग हो सकती है। लेकिन राजनीति में भक्ति या व्यक्ति पूजा पतन और अंततः तानाशाही का सीधा रास्ता है।”
आलोचकों का तर्क है कि जब किसी राजनेता को ‘भगवान’ मान लिया जाता है, तो उसकी नीतियां और निर्णय आलोचना से परे हो जाते हैं। लोकतंत्र की आत्मा ‘सवाल पूछने’ में बसती है। यदि जनता किसी नेता को अचूक (Infallible) मान लेगी, तो सरकार की जवाबदेही तय करना मुश्किल हो जाता है। नोटबंदी, बेरोजगारी या महंगाई जैसे मुद्दों पर भी तब तार्किक बहस के बजाय केवल भावनात्मक ढाल सामने आ जाती है। नरेंद्र मोदी को भगवान मानने की इच्छा भारतीय समाज के उस ताने-बाने को दर्शाती है जो अपने नायक में संपूर्णता देखना चाहता है। राजनीति के इस दौर में वे एक ऐसी महागाथा (Mega-narrative) बन चुके हैं, जहां राष्ट्रवाद और अध्यात्म का मिलन होता है। बेशक, उनके गुण जैसे दृढ़ इच्छाशक्ति, संवाद शैली और जन-कल्याण के प्रति समर्पण असाधारण हैं। धर्म राज्य में स्त्रियों के प्रति भगवानों का दृष्टिकोण सवालों से परे है। यह सब देवाधिदेव भगवान शंकर से शुरू होकर दैव श्रेष्ठ श्रीमद् नरेंद्र मोदी पर विराम पाता है। मुझे समझ में नहीं आता, कि जब ऋषि-पत्नियों को खुलेआम अपना लिंग दिखाने वाला पूजा जा सकता है, जब अपनी ही पुत्री से संसर्ग करने वाला पूज्य है, जब किसी योद्धा को जीतने के लिए उसकी पतिव्रता स्त्री का शीलभंग करने वाला स्तुत्य है, तो हमारे मोदीजी में क्या कमी है? झूठ, व्यभिचार या ऐसे तमाम मुद्दों पर वह किसी भी देवता से पटतरे हैं क्या?
द्रविड़ों की मूर्तियां और मंदिर तोड़कर इस बड़े भूभाग पर काबिज हुए हम कथित आर्य अब उन्हीं प्रतीकों पर निर्भर हैं। धर्म, समाज को जीवित रखने का साधन है। क्या आज हम सचमुच धर्म के पाखंडी प्रतीकों पर इतने निर्भर हैं, कि हमें नरेंद्र मोदी में भगवान दिखना चाहिए? यदि हमारे त्रिदेव बिना किसी विश्वसनीय गारंटी के पूजे जा रहे हैं, तो मोदी को देवताओं में सबसे आगे खड़े करने में किसी को कष्ट नहीं होना चाहिए। लेकिन एक परिपक्व लोकतंत्र के रूप में भारत की असली ताकत इसी में है कि हम अपने नेताओं के अच्छे कार्यों की सराहना करें, उनके प्रति सम्मान रखें, परंतु साथ ही नागरिक के तौर पर अपनी तार्किक चेतना और सवाल पूछने के अधिकार को भी जीवित रखें। राजनेता को ‘प्रधान सेवक’ के रूप में देखना ही लोकतांत्रिक मर्यादा के सबसे करीब है।



