दिल्ली का जंतर-मंतर इस बात का गवाह है कि जब देश का युवा जागता है, तो इतिहास बदल जाता है। राहुल गांधी का राजनीतिक नेतृत्व, अभिजीत दीपके का निस्वार्थ जमीनी संघर्ष और नेहा बोरा की बेबाक वैचारिक क्रांति—इन तीनों के संगम ने एक ऐसी त्रिवेणी का निर्माण किया है, जिसे दबा पाना अब नामुमकिन नजर आता है। वर्तमान सत्ता चाहे जितनी कोशिश कर ले, लेकिन युवाओं के आंसुओं और उनके हकों की यह आवाज अब दबने वाली नहीं है। यह सचमुच एक बदलते, जागते और अपनी संप्रभुता के लिए लड़ते हुए ‘बुलंद भारत की सबसे बुलंद और ऐतिहासिक आवाज’ है।

देश की राजधानी का ऐतिहासिक धरना स्थल जंतर-मंतर इस समय एक अभूतपूर्व युवा क्रांति का गवाह बना हुआ है। राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगी परीक्षाओं (जैसे NEET) में कथित अनियमितताओं, पेपर लीक और देश की चरमराती शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ लाखों युवाओं ने मोर्चा खोल दिया है। इस जनांदोलन ने सत्ता के गलियारों को हिलाकर रख दिया है। इस पूरे आंदोलन को धार देने और युवाओं के हक के लिए संसद से लेकर सड़क तक हुंकार भरने वाले तीन प्रमुख चेहरे लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके और आइसा (AISA) की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा आज देश के करोड़ों शोषित और आक्रोशित युवाओं के लिए ‘बुलंद भारत की बुलंद आवाज’ बनकर उभरे हैं।
इस आंदोलन की जमीनी शुरुआत पुणे से लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर तक युवाओं को एकजुट करने वाले अभिजीत दीपके ने की। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के माध्यम से डिजिटल और ऑन-ग्राउंड स्पेस में एक बड़ी लकीर खींचने वाले अभिजीत दीपके ने छात्रों की मांगों को लेकर जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की। जब प्रशासन द्वारा पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक को जबरन धरना स्थल से हटाया गया, तब अभिजीत दीपके भावुक जरूर हुए, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और आंदोलन को और अधिक आक्रामक बना दिया। अभिजीत का साफ कहना है कि देश में संस्थागत जवाबदेही पूरी तरह से खत्म हो चुकी है और जब तक केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान अपने पद से इस्तीफा नहीं देते, यह छात्र सत्याग्रह रुकने वाला नहीं है। हाल ही में सीजेपी (CJP) द्वारा देशव्यापी युवा संपर्क अभियान ‘क्या बोलती पब्लिक’ की शुरुआत की गई है, जो बेरोजगारी और शिक्षा के बढ़ते व्यवसायीकरण के खिलाफ युवाओं को एक वैचारिक मंच प्रदान कर रहा है।

अभिजीत दीपके के इस जमीनी संघर्ष को वैचारिक और संगठनात्मक रूप से मजबूती देने का काम नेहा बोरा कर रही हैं। ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की कमान संभाल रहीं नेहा बोरा इस पूरे आंदोलन के दौरान दिल्ली पुलिस की बर्बरता और दमनकारी नीतियों के खिलाफ ढाल बनकर खड़ी रहीं। जंतर-मंतर पर छात्रों पर हुए लाठीचार्ज और पुलिसिया कार्रवाई के बाद उन्होंने दिल्ली पुलिस कमिश्नर के इस्तीफे तक की मांग कर डाली। एक मीडिया इंटरव्यू में नेहा बोरा ने अभिजीत दीपके की सराहना करते हुए उन्हें बेहद विनम्र और राजनीतिक समझ रखने वाला सच्चा छात्र हितैषी साथी बताया। नेहा बोरा की सबसे बड़ी ताकत उनकी बेबाकी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका संघर्ष किसी एक राजनीतिक दल को फायदा पहुंचाना नहीं, बल्कि व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई है। उन्होंने खुलकर कहा कि यदि भविष्य में राहुल गांधी या विपक्ष भी युवाओं के असली मुद्दों से भटकेगा, तो वे उनसे भी इसी तीखेपन के साथ सवाल पूछने से पीछे नहीं हटेंगी।
सड़क पर सुलग रही इस चिंगारी को संसद के भीतर और राष्ट्रीय पटल पर दावानल बनाने का काम कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने किया है। राहुल गांधी ने हाल ही में एआईएसए (AISA) अध्यक्ष नेहा बोरा के साथ एक ऐतिहासिक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में विपक्ष के नेता ने मोदी सरकार को सीधे शब्दों में ‘फाइनल अल्टीमेटम’ देते हुए छात्रों की तीन प्रमुख मांगें सामने रखीं और कहा कि देश के युवाओं के भविष्य के साथ कोई समझौता नहीं किया जाएगा। राहुल गांधी ने केवल संसद के मानसून सत्र में सरकार को नहीं घेरा, बल्कि जंतर-मंतर पर पुलिसिया लाठीचार्ज में घायल हुए एक छात्र को खुद मीडिया के सामने लाकर सरकार की क्रूरता का सजीव प्रमाण दिया। पुणे में आयोजित ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम के दौरान भी उन्होंने देश के युवाओं और महिलाओं से संवाद स्थापित किया और उनके अधिकारों की बात की। आज देश के युवाओं में राहुल गांधी की छवि एक ऐसे संजीदा नेता के रूप में स्थापित हुई है, जो जेनरेशन जेड (Gen Z) और नए भारत की उम्मीदों को सीधे संसद के पटल पर रखता है।
आज के दौर में जब मुख्यधारा की राजनीति अक्सर जरूरी मुद्दों से ध्यान भटकाने का प्रयास करती है, तब ये तीन चेहरे देश के सबसे बुनियादी मुद्दों को केंद्र में ले आए हैं। इनके इस त्रिकोणीय समन्वय ने भारतीय छात्र राजनीति और मुख्यधारा की राजनीति को एक नया मोड़ दे दिया है। अभिजीत दीपके और नेहा बोरा जहां जमीन पर छात्रों के गुस्से और उनकी मांगों को संगठित कर रहे हैं, वहीं राहुल गांधी उस आवाज को देश की सबसे बड़ी पंचायत (संसद) में गूंजने की ताकत दे रहे हैं। लाठीचार्ज, नजरबंदी और पुलिस के खौफ के बावजूद जंतर-मंतर से इन युवाओं का न हटना और राहुल गांधी का इनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होना सरकार की तानाशाही नीतियों के खिलाफ एक सशक्त प्रतिरोध है। यह लड़ाई सिर्फ परीक्षा दोबारा कराने की नहीं है, बल्कि देश के शैक्षणिक संस्थानों की स्वायत्तता और विश्वसनीयता को बहाल करने की मांग है, जिस पर आज जनता का भरोसा उठ चुका है।
दिल्ली का जंतर-मंतर इस बात का गवाह है कि जब देश का युवा जागता है, तो इतिहास बदल जाता है। राहुल गांधी का राजनीतिक नेतृत्व, अभिजीत दीपके का निस्वार्थ जमीनी संघर्ष और नेहा बोरा की बेबाक वैचारिक क्रांति—इन तीनों के संगम ने एक ऐसी त्रिवेणी का निर्माण किया है, जिसे दबा पाना अब नामुमकिन नजर आता है। वर्तमान सत्ता चाहे जितनी कोशिश कर ले, लेकिन युवाओं के आंसुओं और उनके हकों की यह आवाज अब दबने वाली नहीं है। यह सचमुच एक बदलते, जागते और अपनी संप्रभुता के लिए लड़ते हुए ‘बुलंद भारत की सबसे बुलंद और ऐतिहासिक आवाज’ है।



