अब शौक़ क्या बाकी….

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह, सहज़, हरदा, मध्य प्रदेश

​अब शौक़ क्या बाकी, क़लम-ए-बे-असर लिखने का, खून ए जिगर से जो लिखा मैंने,उसने पढ़ा ही नहीं।

​किताब-ए-इश्क़ में शामिल था मेरा ज़िक्र भी शायद, उसे इतनी फ़ुर्सत ही कहां सफ़ा वो पलटा ही नहीं।

​सीने में दबी ख़ामोशियाँ वो भी शोर से कम न थीं, उसने कभी ग़ौर से उन लफ़्ज़ों को सुना ही नहीं।

​बिख़र कर रह गए हम आईना-ए-दिल की तरह ऐसे,कोशिश तो की, मगर टूटा जो दिल वो जुड़ा ही नहीं।

हजूम-ए-शहर में गुमनाम हम ऐसे हुए ,’मुश्ताक़’ न हुई ढूँढने की कोशिश और मैं मिला भी नहीं।

Change Language