सरकार से सवाल, दिल्ली पुलिस की फ्री सेवा , खान का मतलब आतंकवादी नहीं..

यदि भारत को एक मजबूत लोकतंत्र बने रहना है, तो देश की अदालतों और सरकार के शीर्ष अधिकारियों को इस घटना का स्वतः संज्ञान लेना चाहिए। दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक और कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए ताकि समाज में यह संदेश जाए कि खाकी वर्दी किसी को नफरत फैलाने या कानून हाथ में लेने का लाइसेंस नहीं देती।

भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में, जहाँ संविधान प्रत्येक नागरिक को बोलने और असहमति जताने का अधिकार देता है, वहाँ देश की राजधानी से आई एक हालिया घटना ने पूरी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या सरकार या राजनेताओं से जनता और पत्रकारों द्वारा सवाल पूछने पर दिल्ली पुलिस सुरक्षा देने के बजाय डंडे बरसाएगी? और सबसे बड़ा सवाल क्या किसी के नाम में ‘खान’ होना ही उसे कटघरे में खड़ा करने या उसे संदिग्ध मानने के लिए काफी है? हाल ही में दिल्ली में रिपोर्टिंग के दौरान महिला पत्रकार शाहीन खान और उनकी सहयोगी नफीसा के साथ हुई कथित बदसलूकी और मारपीट ने देश के बुद्धिजीवियों, मीडिया जगत और आम नागरिकों को झकझोर कर रख दिया है। इस घटना ने एक बार फिर कानून के रखवालों की निष्पक्षता और सत्ता के दबाव में काम करने वाली पुलिसिया कार्यशैली को बेनकाब किया है। खबरों के मुताबिक, पत्रकार शाहीन खान दिल्ली की मुख्यमंत्री और देश के गृहमंत्री से जुड़े मुद्दों पर ग्राउंड रिपोर्टिंग कर रही थीं और उनसे तीखे सवाल पूछने का प्रयास कर रही थीं।

लोकतंत्र में चौथे स्तंभ का काम ही यही है कि वह सत्ता में बैठे लोगों से जवाबदेही मांगे। लेकिन इसके बदले उन्हें जो मिला, वह बेहद शर्मनाक था। पीड़ित पत्रकार का आरोप है कि दिल्ली पुलिस के अधिकारियों ने उनके साथ न केवल मानसिक और शारीरिक दुर्व्यवहार किया, बल्कि जब उन्होंने अपना नाम ‘खान’ बताया, तो पुलिस का रवैया और भी हिंसक हो गया। शाहीन खान ने सोशल मीडिया पर अपने घाव दिखाते हुए दर्दनाक बयान दिया, “पूरा टॉर्चर करने के बाद मुझसे मेरा नाम पूछा गया। मैंने बताया कि मेरा नाम खान है, मैं मुसलमान हूँ, और शायद इसीलिए दिल्ली पुलिस के अफसरों ने मुझ पर डंडे बरसाए और थप्पड़ जड़े।” यह बयान किसी भी सभ्य समाज के लिए एक बड़ा कलंक है। सवाल यह है कि क्या पुलिस अब अपराधियों को उनके अपराध से नहीं, बल्कि उनके सरनेम (उपनाम) या मजहब से आंकेगी? भारत का इतिहास गवाह है कि इस देश की मिट्टी को सींचने में ‘खान’ और मुस्लिम समुदाय का उतना ही खून शामिल है, जितना किसी अन्य नागरिक का। वीर अब्दुल हमीद से लेकर देश के मिसाइल मैन डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम तक, और सिनेमा जगत से लेकर पत्रकारिता तक, इस देश के विकास में इस सरनेम वाले लोगों ने अतुलनीय योगदान दिया है।

लेकिन हाल के वर्षों में निर्मित हुए नफरत और ध्रुवीकरण के माहौल ने समाज के एक बड़े हिस्से की मानसिकता को दूषित कर दिया है। सोशल मीडिया पर ‘बघीरा’ नामक एक हैंडल ने इस घटना पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए एक्स (X) पर लिखा: “Her name is Khan… Shaheen Khan. And she is not a terrorist.. She is a journalist.. Ok Delhi Police” यह ट्वीट देश के करोड़ों लोगों के उस दर्द को बयां करता है, जो हर रोज अपनी देशभक्ति और अपनी पहचान को लेकर बिना वजह सफाई देने पर मजबूर किए जाते हैं। किसी एक व्यक्ति के गलत होने से पूरा समुदाय या एक सरनेम संदिग्ध नहीं हो जाता। आतंकवाद और अपराध का कोई धर्म या जाति नहीं होती। जब कानून के रखवाले ही पूर्वाग्रह (Bias) से ग्रसित होकर किसी नागरिक के नाम के आधार पर अपनी ‘फ्रस्ट्रेशन’ या नफरत निकालने लगें, तो न्याय की उम्मीद किससे की जाए? यह कोई पहली घटना नहीं है जब दिल्ली पुलिस पर सत्ता के इशारे पर काम करने या किसी खास समुदाय को निशाना बनाने के आरोप लगे हों। इससे पहले भी कई छात्र प्रदर्शनों, नागरिक आंदोलनों और विपक्षी नेताओं के शांतिपूर्ण मार्च के दौरान पुलिस के क्रूर रवैये की तस्वीरें देश देख चुका है। विपक्ष के नेताओं, जैसे नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने भी संसद और सड़कों पर दिल्ली पुलिस की इस बढ़ती बर्बरता के खिलाफ आवाज उठाई है। छात्रों पर लाठीचार्ज और आंसू गैस के दमनकारी इस्तेमाल के बाद अब पत्रकारों को निशाना बनाना यह दर्शाता है कि व्यवस्था अब आलोचना या सीधे सवालों को बर्दाश्त करने की क्षमता खो चुकी है।

संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत देश के हर नागरिक को सम्मान के साथ जीने और स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है। पुलिस का मुख्य कार्य कानून व्यवस्था बनाए रखना और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है, न कि शांतिपूर्वक सवाल पूछने वाले पत्रकारों को अधमरा करना। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की प्रेस स्वतंत्रता रैंकिंग में लगातार आ रही गिरावट ऐसे ही वाकयों का परिणाम है। जब महिला पत्रकारों को सड़क पर सरेआम घसीटा जाएगा, उनके नाम के कारण उन पर अतिरिक्त लाठियां भांजी जाएंगी, तो फील्ड में काम करने वाले पत्रकारों का मनोबल पूरी तरह टूट जाएगा। शाहीन खान और नफीसा ने इस मामले में एम्स (AIIMS) जाकर अपना मेडिकल परीक्षण (MLC) करवाया है और कानूनी लड़ाई लड़ने का एलान किया है। देश के हर सजग नागरिक, प्रेस क्लब और मानवाधिकार संगठनों को इस लड़ाई में उनके साथ खड़ा होना चाहिए। क्योंकि आज सवाल सिर्फ शाहीन खान का नहीं है, बल्कि देश के उस हर नागरिक का है जो कल सरकार की किसी नीति पर सवाल उठाने की हिम्मत करेगा।

यदि भारत को एक मजबूत लोकतंत्र बने रहना है, तो देश की अदालतों और सरकार के शीर्ष अधिकारियों को इस घटना का स्वतः संज्ञान लेना चाहिए। दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक और कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए ताकि समाज में यह संदेश जाए कि खाकी वर्दी किसी को नफरत फैलाने या कानून हाथ में लेने का लाइसेंस नहीं देती। सरकार से सवाल पूछना देशद्रोह या आतंकवाद नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र को जीवित रखने की पहली शर्त है। और ‘खान’ कोई संदिग्ध शब्द नहीं, बल्कि इस महान देश के नागरिकों की एक गौरवशाली पहचान का हिस्सा है।

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