लोकतंत्र या ‘दागीतंत्र’? राजनीति का अपराधीकरण और योग्यता विहीन नेतृत्व की मार झेलता देश और राज्य

भारतीय लोकतंत्र दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक उत्सव के रूप में जाना जाता है, लेकिन इसकी चकाचौंध के पीछे एक कड़वी और डरावनी हकीकत छिपी हुई है। एक तरफ देश की सिविल सेवाओं (UPSC), रक्षा सेवाओं, चिकित्सा या इंजीनियरिंग जैसे पेशों में प्रवेश के लिए कठोरतम शैक्षिक योग्यता और कड़े पुलिस वेरिफिकेशन (चरित्र प्रमाण पत्र) की आवश्यकता होती है, यहाँ तक कि एक चतुर्थ श्रेणी (चपरासी) कर्मचारी बनने के लिए भी न्यूनतम दसवीं या बारहवीं पास होना अनिवार्य है,

वहीं दूसरी तरफ इस महान राष्ट्र के भाग्य का फैसला करने वाले, नीतियां बनाने वाले और करोड़ों के बजट को मंजूरी देने वाले ‘माननीयों’ (सांसदों और विधायकों) के लिए भारतीय संविधान में किसी भी शैक्षणिक योग्यता का प्रावधान नहीं रखा गया है। परिणाम यह है कि आज देश और राज्यों की व्यवस्था ऐसे नेतृत्व के हाथों में घिरती जा रही है, जिन पर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं और जिनकी प्रशासनिक समझ शून्य के बराबर है। हाल ही में सितंबर 2024 में पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के जस्टिस महाबीर सिंह सिंधु ने एक मामले की सुनवाई करते हुए इस पर गंभीर चिंता जताई थी। उन्होंने भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के 26 नवंबर 1949 को संविधान सभा में दिए गए उस ऐतिहासिक भाषण को याद किया, जिसमें उन्होंने अफसोस जताया था कि कानून बनाने वालों के लिए कोई शैक्षणिक योग्यता तय नहीं की गई है। अदालत ने टिप्पणी की कि आजादी के 75 से अधिक वर्षों के बाद भी डॉ. राजेंद्र प्रसाद की वह चिंता आज भी जस की तस बनी हुई है।

आंकड़ों का खौफनाक सच: संसद से लेकर विधानसभाओं तक ‘दागियों’ का कब्जा

राजनीति में बढ़ते अपराधीकरण और अज्ञानता को केवल एक भावनात्मक आक्रोश नहीं, बल्कि देश की प्रामाणिक संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) द्वारा जारी हालिया डेटा के माध्यम से समझा जा सकता है।

लोकसभा 2024 के आंकड़े: 2024 के लोकसभा चुनावों के बाद गठित हुई देश की संसद में रिकॉर्ड 46% सांसदों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। इससे भी अधिक चिंताजनक यह है कि इनमें से 31% (170 सांसद) ऐसे हैं जिन पर अत्यंत गंभीर आपराधिक मामले जैसे- हत्या, हत्या का प्रयास, अपहरण, दुष्कर्म और महिलाओं के खिलाफ अपराध दर्ज हैं।

जीतने की संभावना (Winnebility): राजनीति का सबसे काला सच यह है कि अपराधी छवि वाले उम्मीदवारों की जीतने की दर साफ-सुथरी छवि वाले उम्मीदवारों से कहीं अधिक है। ADR की रिपोर्ट के अनुसार, आपराधिक मामलों वाले उम्मीदवारों की जीत की संभावना 15.3% थी, जबकि बिना किसी आपराधिक रिकॉर्ड वाले साफ-सुथरे उम्मीदवारों की जीत की संभावना केवल 4.4% पाई गई। राजनीतिक दल ‘जिताऊ’ (Winnebility) होने के नाम पर अपराधियों को धड़ल्ले से टिकट बांटते हैं।

राज्यों के मंत्रियों की स्थिति (ADR 2025 रिपोर्ट): सितंबर 2025 में जारी ADR की एक विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, देश के 27 राज्यों, 3 केंद्र शासित प्रदेशों और केंद्रीय मंत्रिपरिषद के कुल 643 मंत्रियों के शपथ पत्रों के विश्लेषण से पता चला कि लगभग 47% मंत्रियों पर आपराधिक मामले चल रहे हैं, जिनमें से 174 मंत्रियों पर गंभीर धाराएं हैं।

राज्य विधानसभाओं की बदहाली: राज्य स्तर पर स्थिति और भी भयावह है। मार्च 2025 की एक अन्य ADR रिपोर्ट के अनुसार, देश के लगभग 45% विधायक (MLAs) आपराधिक मामलों का सामना कर रहे हैं। इसमें आंध्र प्रदेश 79% दागी विधायकों के साथ शीर्ष पर था, जबकि केरल और तेलंगाना 69% के साथ इसके ठीक पीछे थे।

राज्यसभा (जून 2026 रिपोर्ट): देश के प्रबुद्ध सदन ‘राज्यसभा’ की स्थिति भी अलग नहीं है। जून 2026 में सामने आई रिपोर्ट के अनुसार, 31% मौजूदा राज्यसभा सांसदों ने अपने ऊपर आपराधिक मामले घोषित किए हैं, जिनमें से 16% गंभीर अपराधों से जुड़े हैं।

    शैक्षिक योग्यता और विधायी प्रदर्शन का सीधा संबंध

    अक्सर तर्क दिया जाता है कि किताबी पढ़ाई से जमीनी नेता नहीं बनते, लेकिन विज्ञान और शोध इस तर्क को खारिज करते हैं। अंतर्राष्ट्रीय जर्नल साइंस डायरेक्ट (ScienceDirect) में 2025 में प्रकाशित एक विस्तृत शोध पत्र (“Do educated leaders perform better?”) में पाया गया कि राजनेताओं की उच्च शिक्षा और संसद/विधानसभाओं में उनके काम के प्रदर्शन के बीच सीधा सकारात्मक संबंध है। इस शोध के अनुसार, जिन सांसदों के पास पोस्ट-ग्रेजुएट (स्नातकोत्तर) या उससे ऊपर की डिग्री होती है, वे अपने कार्यकाल के दौरान गैर-पोस्ट-ग्रेजुएट सांसदों की तुलना में औसतन 126 अधिक सवाल पूछते हैं, 30 अतिरिक्त बहसों में हिस्सा लेते हैं और कम से कम एक प्राइवेट मेंबर बिल ज्यादा पेश करते हैं। यह डेटा साफ दिखाता है कि जब कोई नेता अज्ञानी या अशिक्षित होता है, तो वह विधायी प्रक्रियाओं को समझने में असमर्थ होता है और जनता के मुद्दों को सदन के पटल पर सही ढंग से उठाने में पूरी तरह विफल रहता है।

    आर्थिक और सामाजिक पतन का उदाहरण

    नॉर्थईस्टर्न यूनिवर्सिटी के सार्वजनिक नीति और अर्थशास्त्र के प्रोफेसर निशित प्रकाश के नेतृत्व में अगस्त 2026 में प्रकाशित एक बेहद महत्वपूर्ण अध्ययन में भारत के राज्यों पर अपराधी राजनेताओं के प्रभाव का विश्लेषण किया गया है। इस शोध के अनुसार, जिन राज्यों में गंभीर आपराधिक मामलों वाले राजनेताओं का अनुपात अधिक है, वहां अपराध दर में प्रति वर्ष 5.8% की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। ऐसे क्षेत्रों में आर्थिक गिरावट और विकास परियोजनाओं की गति धीमी पाई गई। बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और ओडिशा जैसे राज्य इस समस्या से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं।

    उदाहरण के रूप में उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूलों की स्थिति को देखा जा सकता है: अगस्त 2026 में सोशल मीडिया और विभिन्न स्वतंत्र पत्रकारों द्वारा राज्य के कई प्राथमिक स्कूलों की बदहाली, बुनियादी सुविधाओं के अभाव (जैसे शौचालय और बिजली की कमी) और शिक्षकों की अनुपस्थिति को उजागर किया गया था। दुःखद पहलू यह रहा कि व्यवस्था को सुधारने के बजाय प्रशासन ने बदहाली दिखाने वाले यूट्यूबर्स और कंटेंट क्रिएटर्स पर ही एफआईआर (FIR) दर्ज कर दी। जब नीतियां बनाने और लागू करने वाले लोग अज्ञानी या आपराधिक प्रवृत्ति के होते हैं, तो वे सच का सामना करने के बजाय सत्ता के बल पर आवाज दबाने का प्रयास करते हैं, जिसका सीधा असर देश के भविष्य यानी बच्चों की शिक्षा पर पड़ता है।

    मलबे में पड़ा देश का भविष्य और समाधान की राह

    जब देश की नीतियां ऐसे लोगों द्वारा बनाई जाती हैं जिनके पास न तो कोई शैक्षिक दूरदर्शिता होती है और न ही नैतिक चरित्र, तो देश का भविष्य वास्तव में अंधकारमय होने लगता है। प्रशासनिक पदों पर बैठे आईएएस और आईपीएस अधिकारी, जो वर्षों की तपस्या और योग्यता के बाद वहां पहुंचते हैं, उन्हें इन दागी और अज्ञानी राजनेताओं के सामने नतमस्तक होना पड़ता है। इससे देश में भ्रष्टाचार संस्थागत रूप ले लेता है, नीतियां जनहित के बजाय व्यक्तिगत लाभ के लिए बनती हैं और युवाओं को बेरोजगारी तथा लाठियों का सामना करना पड़ता है।

    इस गंभीर संकट से निपटने के लिए निम्नलिखित कदम उठाना अत्यंत अनिवार्य हो चुका है:

    न्यायालयों द्वारा त्वरित सुनवाई: वर्तमान में राजनेताओं पर वर्षों तक मामले लंबित रहते हैं, जिससे वे अपनी अवधि पूरी कर लेते हैं। देश में लंबित पड़े 4,000 से अधिक आपराधिक मामलों के निपटारे के लिए विशेष फास्ट-ट्रैक कोर्ट को और अधिक सशक्त बनाना होगा।

    कानूनी प्रतिबंध: लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम (Representation of the People Act, 1951) में संशोधन कर यह प्रावधान किया जाना चाहिए कि यदि किसी व्यक्ति पर अदालत द्वारा संगीन अपराधों (जैसे हत्या, बलात्कार, डकैती) में आरोप तय (Charges Frame) कर दिए जाते हैं, तो उसके चुनाव लड़ने पर तब तक रोक लगाई जाए जब तक वह बरी नहीं हो जाता।

    न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता: ग्राम पंचायतों और स्थानीय निकायों के चुनावों में राजस्थान और हरियाणा जैसे राज्यों ने न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता (जैसे 8वीं या 10वीं पास) लागू करने का सफल प्रयोग किया है। समय आ गया है कि देश के सांसदों और विधायकों के लिए भी कम से कम स्नातक (Graduation) या बारहवीं पास की अनिवार्य सीमा तय की जाए, जैसा कि समय-समय पर नागरिक समाज और कानूनी विशेषज्ञों द्वारा मांग की जाती रही है।

    मतदाताओं की जागरूकता: अंतिम और सबसे बड़ा हथियार जनता के हाथ में है। जब तक मतदाता जाति, धर्म, मुफ्त के उपहारों (Freebies) या बाहुबल के प्रभाव से ऊपर उठकर उम्मीदवार की योग्यता, शिक्षा और चरित्र को देखकर वोट नहीं करेंगे, तब तक लोकतंत्र को इस ‘दागीतंत्र’ के मलबे से बाहर निकाल पाना असंभव होगा।

    अब समय आ गया है कि देश का पढ़ा-लिखा युवा और प्रबुद्ध वर्ग राजनीति के इस शुद्धिकरण के लिए आवाज उठाए, ताकि भारत का भविष्य चंद अज्ञानी और अपराधी तत्वों के हाथों तबाह होने से बचाया जा सके।

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