ब्रिक्स का सफर भारत के लिए सफलताओं और चुनौतियों का मिश्रण रहा है। अंतर्विरोधों के बावजूद, यह संगठन आज के समय में बेहद प्रासंगिक है। वर्ष 2026 में भारत की अध्यक्षता यह साबित करती है कि नई दिल्ली इस मंच को एक रचनात्मक और समाधान-उन्मुख दिशा देने में पूरी तरह सक्षम है, जिससे एक न्यायसंगत और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का निर्माण हो सके।

वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था में एक नए संतुलन के प्रतीक के रूप में ब्रिक्स (BRICS) दुनिया का एक बेहद प्रभावशाली संगठन बनकर उभरा है। वर्ष 2026 में भारत चौथी बार ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहा है, जो इसकी वैश्विक प्रासंगिकता और भारत के बढ़ते कद को रेखांकित करता है। इस संगठन का सफर, भारत के लिए इसकी उपयोगिता और इसकी चुनौतियाँ अंतरराष्ट्रीय संबंधों का एक महत्वपूर्ण अध्याय हैं। ‘ब्रिक’ (BRIC) शब्द की उत्पत्ति 2001 में गोल्डमैन सैक्स के अर्थशास्त्री जिम ओ’नील ने की थी, जिन्होंने ब्राजील, रूस, भारत और चीन को भविष्य की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के रूप में चिन्हित किया था। इस अवधारणा को कूटनीतिक रूप देते हुए 2006 में न्यूयॉर्क में इन देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक हुई। इसके बाद, 2009 में रूस के येकातेरिनबर्ग में पहला आधिकारिक शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया। वर्ष 2010 में दक्षिण अफ्रीका के जुड़ने से यह ‘ब्रिक्स’ (BRICS) बना। समय के साथ इसका दायरा बढ़ता गया।

2024 में मिस्र, इथियोपिया, ईरान और यूएई इसके पूर्ण सदस्य बने, जबकि 2025 में इंडोनेशिया के शामिल होने से इसकी ताकत और बढ़ गई। आज यह ग्यारह देशों का एक मजबूत समूह (BRICS+) बन चुका है, जो दुनिया की लगभग 49.5% आबादी और 40% वैश्विक जीडीपी का प्रतिनिधित्व करता है. अब सवाल उठता है कि भारत को ब्रिक्स की आवश्यकता क्यों है ? भारत के लिए ब्रिक्स केवल एक आर्थिक मंच नहीं, बल्कि रणनीतिक जरूरत है। भारत खुद को विकासशील देशों (ग्लोबल साउथ) के नेता के रूप में देखता है। ब्रिक्स भारत को पश्चिमी प्रभुत्व वाले वित्तीय संस्थानों (जैसे IMF और वर्ल्ड बैंक) में सुधारों की वकालत करने के लिए एक मजबूत मंच देता है। भारत जहां एक तरफ ‘क्वाड’ (Quad) जैसे संगठनों के जरिए अमेरिका के करीब है, वहीं दूसरी तरफ ब्रिक्स के माध्यम से रूस और चीन जैसे देशों के साथ संवाद बनाए रखता है। यह भारत की स्वतंत्र विदेश नीति के लिए जरूरी है। यूएई और ईरान जैसे ऊर्जा-समृद्ध देशों के आने से भारत की तेल व गैस की रणनीतिक जरूरतें पूरी करने में मदद मिलती है। भू-राजनीति की ‘दुनियादारी’ में भारत ब्रिक्स का उपयोग संतुलन साधने के लिए करता है। चीन और रूस अक्सर ब्रिक्स को अमेरिका या पश्चिमी देशों के विरोधी (Anti-Western) गुट के रूप में पेश करना चाहते हैं। लेकिन भारत की ‘दुनियादारी’ यह है कि वह ब्रिक्स को ‘गैर-पश्चिमी’ (Non-Western) मंच मानता है, विरोधी नहीं।

भारत स्पष्ट करता है कि वह किसी एक गुट का हिस्सा बनने की बजाय वैश्विक व्यवस्था को बहुध्रुवीय (Multipolar) बनाना चाहता है। चीन के ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (BRI) जैसी विस्तारवादी नीतियों के बीच, भारत ब्रिक्स के भीतर रहकर चीन के बढ़ते दबदबे को नियंत्रित करने का प्रयास करता है। ब्रिक्स ने पिछले दो दशकों में कई ठोस सफलताएं हासिल की हैं। 2014 में स्थापित यह बैंक ब्रिक्स की सबसे बड़ी सफलता है। शंघाई में मुख्यालय वाले इस बैंक ने पश्चिमी देशों की कठिन शर्तों के बिना विकासशील देशों को बुनियादी ढांचे (Infrastructure) के लिए अरबों डॉलर का कर्ज दिया है। वैश्विक वित्तीय संकट या भुगतान संतुलन बिगड़ने की स्थिति में सदस्य देशों की मदद के लिए 100 अरब डॉलर का यह कोष बनाया गया है। डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए आपसी व्यापार को राष्ट्रीय मुद्राओं (जैसे रुपये, रूबल, युआन) में करने की दिशा में बड़ी प्रगति हुई है, जो वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में बड़ा बदलाव है। तमाम सफलताओं के बावजूद, ब्रिक्स के भीतर गहरी दरारें भी हैं. ब्रिक्स की सबसे बड़ी कमजोरी इसके दो प्रमुख सदस्यों भारत और चीन के बीच का तनाव है। सीमा पर झड़पों (जैसे लद्दाख गतिरोध) और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के कारण दोनों देशों में अविश्वास है, जिससे कई बड़े फैसले रुक जाते हैं। संगठन में शामिल नए देशों के बीच भी आपसी मतभेद हैं (जैसे ईरान और सऊदी अरब, या मिस्र और इथियोपिया)। इतने अलग-अलग राजनीतिक हितों वाले देशों में सर्वसम्मति बनाना बेहद कठिन होता जा रहा है। ब्रिक्स की आर्थिक ताकत में चीन का हिस्सा सबसे बड़ा है। भारत के लिए चिंता यह है कि चीन इस मंच का उपयोग अपने निजी वैश्विक एजेंडे और मुद्रा (युआन) को चमकाने के लिए न करने लगे। ब्रिक्स का सफर भारत के लिए सफलताओं और चुनौतियों का मिश्रण रहा है। अंतर्विरोधों के बावजूद, यह संगठन आज के समय में बेहद प्रासंगिक है। वर्ष 2026 में भारत की अध्यक्षता यह साबित करती है कि नई दिल्ली इस मंच को एक रचनात्मक और समाधान-उन्मुख दिशा देने में पूरी तरह सक्षम है, जिससे एक न्यायसंगत और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का निर्माण हो सके।




