DU में धरातल बचाने आया ABVP, DUSU चुनाव 2026-2027: त्रिकोणीय मुकाबले में वर्चस्व की जंग

जैसे-जैसे 18 सितंबर की तारीख नजदीक आ रही है, दिल्ली विश्वविद्यालय के नॉर्थ और साउथ कैंपस की दीवारों पर पोस्टरों की बाढ़ आ गई है. एबीवीपी के लिए यह चुनाव केवल चार पदों को जीतने का नहीं है, बल्कि देश के सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में अपने वैचारिक गढ़ और धरातल को सुरक्षित रखने की परीक्षा है.

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (DUSU) चुनाव 2026-2027 का बिगुल आधिकारिक तौर पर बज चुका है. कैंपस की राजनीति में इस बार का मुकाबला महज एक चुनावी औपचारिकता नहीं, बल्कि छात्र संगठनों के लिए अपना वजूद और धरातल बचाने की बड़ी लड़ाई बन गया है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने 11 सितंबर 2026 को अपने चार सदस्यीय केंद्रीय पैनल की घोषणा कर दी है, जिसमें अंतरराष्ट्रीय स्तर के टेनिस खिलाड़ी यश डबास को अध्यक्ष पद के लिए मैदान में उतारा गया है. 18 सितंबर 2026 को होने वाले मतदान और 19 सितंबर को आने वाले नतीजों से पहले दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) का नॉर्थ और साउथ कैंपस पूरी तरह राजनीतिक अखाड़े में तब्दील हो चुका है. इस बार का चुनाव इसलिए भी बेहद खास है क्योंकि मैदान में सिर्फ पारंपरिक प्रतिद्वंद्वी नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (NSUI) ही नहीं, बल्कि आम आदमी पार्टी की छात्र इकाई ASAP और लेफ्ट गठबंधन (AISA-SFI) भी पूरी ताकत के साथ एबीवीपी के किले को ढहाने के लिए जमीनी स्तर पर सक्रिय हैं.

पिछले कुछ सालों से डूसू (DUSU) पर अपना मजबूत नियंत्रण रखने वाली ABVP के लिए इस बार राह इतनी आसान नहीं दिख रही है. हाल के दिनों में कैंपस और उसके आस-पास छात्रों की सुरक्षा, बुनियादी सुविधाओं और महंगे होते किराए (आवास) को लेकर छात्रों में भारी असंतोष देखा गया है. विशेष रूप से सत्या निकेतन में हुए हालिया हादसे के बाद से छात्रों के बीच सुरक्षित और किफायती आवास (PG/Hostels) का मुद्दा सबसे ऊपर आ गया है, जिसने विद्यार्थी परिषद को बैकफुट पर धकेलने का काम किया. इसी जमीनी धरातल को वापस पाने और छात्रों के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए ABVP ने इस बार बेहद सधे हुए और डाइवर्स (विविध) बैकग्राउंड वाले चेहरों पर दांव लगाया है।

अध्यक्ष पद (President): विभाग बौद्ध अध्ययन (Buddhist Studies) के पोस्ट-ग्रेजुएट छात्र और अंतरराष्ट्रीय स्तर के टेनिस खिलाड़ी यश डबास.

उपाध्यक्ष पद (Vice President): छात्र राजनीति में लंबे समय से सक्रिय चेहरा ईशु मौर्य.

सचिव पद (Secretary): कानून और अन्य सामाजिक विषयों पर मजबूत पकड़ रखने वाली रिया छावड़ी.

संयुक्त सचिव पद (Joint Secretary): खेल और छात्र विमर्श में अग्रणी भूमिका निभाने वाले लक्ष्यराज सिंह.

एबीवीपी ने डूसू चुनाव के आधिकारिक प्रचार की शुरुआत ‘आख़िर कब तक?’ अभियान और ‘PG to PG’ तथा ‘Class to Class’ आउटरीच के जरिए की है. इस अभियान के तहत संगठन के कार्यकर्ता दिल्ली के विभिन्न छात्र बहुल इलाकों जैसे मुखर्जी नगर, विजय नगर, और सत्या निकेतन में जाकर पेइंग गेस्ट (PG) आवासों का सुरक्षा ऑडिट कर रहे हैं. संगठन के दिल्ली राज्य सचिव सार्थक शर्मा के अनुसार, उनका ध्यान एक ऐसे छात्र संघ के निर्माण पर है जो केवल चुनाव के समय ही नहीं, बल्कि पूरे साल छात्रों के लिए सुलभ और जवाबदेह रहे. एबीवीपी अपने पुराने कामों जैसे- 1,000 से अधिक सीसीटीवी कैमरे लगवाना, स्टूडेंट फैसिलिटी सेंटर, डूसू इंटर्नशिप प्रोग्राम, और यू-बस (U-Bus) सेवाओं की शुरुआत को अपनी बड़ी उपलब्धियों के तौर पर पेश कर छात्रों से दोबारा मौका मांग रही है.

इस बार का चुनाव पूरी तरह से बहुकोणीय हो चुका है, जिससे एबीवीपी के लिए अपना पुराना धरातल बचाना सबसे बड़ी चुनौती है।

पदABVP (विद्यार्थी परिषद)NSUI (कांग्रेस विंग)AISA-SFI / ASAP (अन्य)
अध्यक्षयश डबासविजय शंकर मीणाअनन्या रतूड़ी (AISA-SFI) / अस्मित (ASAP)
उपाध्यक्षईशु मौर्यवीर चतरथ
सचिवरिया छावड़ीनम्रता चौधरीपंकज ढींगरा (ASAP)
संयुक्त सचिवलक्ष्यराज सिंहगोपाल चौधरी

कांग्रेस की छात्र इकाई NSUI ने फीस वृद्धि को रोकने, हॉस्टलों के विस्तार और महिला सुरक्षा को मुख्य एजेंडा बनाते हुए ‘सेंट्रल 4’ पैनल उतारा है. वहीं, आम आदमी पार्टी की छात्र इकाई ASAP ने डूसू के इतिहास में पहली बार एक दृष्टिहीन छात्र पंकज ढींगरा को सचिव पद का उम्मीदवार बनाकर और अपना विशेष घोषणापत्र जारी कर पूरी बहस को नया मोड़ दे दिया है. हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि NSUI के कुछ बागी उम्मीदवारों के स्वतंत्र रूप से मैदान में उतरने के कारण वोटों का बिखराव हो सकता है, जिसका सीधा फायदा अंततः ABVP को मिल सकता है.

जैसे-जैसे 18 सितंबर की तारीख नजदीक आ रही है, दिल्ली विश्वविद्यालय के नॉर्थ और साउथ कैंपस की दीवारों पर पोस्टरों की बाढ़ आ गई है. एबीवीपी के लिए यह चुनाव केवल चार पदों को जीतने का नहीं है, बल्कि देश के सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में अपने वैचारिक गढ़ और धरातल को सुरक्षित रखने की परीक्षा है. क्या यश डबास का खेल जगत का प्रभाव और ‘आख़िर कब तक’ अभियान छात्रों के गुस्से को शांत कर पाएगा, या फिर विरोधी दल इस बार डूसू की सत्ता का पलटाव करने में सफल होंगे? इसका अंतिम फैसला 19 सितंबर को मतगणना के बाद ही साफ होगा.

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